जोधपुर। शहर की पहचान बन चुके धींगा गवर मेले में इस बार भी आस्था और वैभव का भव्य दृश्य देखने को मिलेगा। पांच अप्रेल की रात आयोजित होने वाले इस पारंपरिक उत्सव में शहर के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित 15 गवर माता की प्रतिमाओं का श्रृंगार 50 किलो से अधिक स्वर्ण आभूषणों से किया जाएगा। मां पार्वती के प्रतीक गवर पूजन में तीजणियों की श्रद्धा, लोक परंपराओं की गरिमा और सोने की चमक मिलकर एक अद्वितीय वातावरण निर्मित करती है। मेले को लेकर शहरवासियों में जबरदस्त उत्साह है।
आभूषणों के लेन-देन में पूरी पारदर्शिता
गवर माता के श्रृंगार में उपयोग होने वाले आभूषण पूरी तरह श्रद्धालुओं के विश्वास पर दिए जाते हैं। गवर मेला समिति के सदस्य कृपाराम सोनी के अनुसार, सभी आभूषणों का पारदर्शी तरीके से डायरी में लेखा-जोखा रखा जाता है और अगले दिन ‘मोई’ प्रसादी के साथ सुरक्षित लौटा दिया जाता है। हर वर्ष गवर माता की वेशभूषा भी नई तैयार की जाती है, जो परंपरा का अहम हिस्सा है।
सजाने में लगते हैं तीन से सात घंटे
भीतरी शहर के विभिन्न मोहल्लों में विराजित गवर प्रतिमाओं के दर्शन को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह रहता है। प्रत्येक प्रतिमा को सजाने में 3 से 7 घंटे का समय लगता है, जिसमें पारंपरिक आभूषण-मुकुट, रखड़ी, शीशफूल, नथ, हार, बाजूबंद, कंगन और पाटला का विशेष महत्व होता है। सुनारों की घाटी स्थित उद्गम स्थल पर सजी गवर प्रतिमा आकर्षण का केंद्र रहती है, जहां लगभग 15 किलो स्वर्ण आभूषणों से नख-शिख श्रृंगार किया जाएगा।
आभूषणों पर तीजणियों का पहरा
इतनी बड़ी मात्रा में स्वर्ण आभूषणों को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था भी सुदृढ़ की गई है। पुलिस प्रशासन के साथ गवर मेला समितियां और स्वयं तीजणियां भी रातभर पहरा देकर आयोजन को सुरक्षित बनाती हैं।
कहां कितने आभूषणों से होगा श्रृंगार
| सुनारों की घाटी | 15 किलो |
| आड़ा बाजार कुम्हारिया कुआं | 21 किलो |
| कबूतरों का चौक | 11 किलो |
| हटड़ियों का चौक | 5 किलो |
| चाचा की गली | 4 किलो |
| सिटी पुलिस क्षेत्र | 1.25 किलो |
| जालप मोहल्ला | 1 किलो |
| हाथी चौक | 1 किलो |
| खांडा फलसा | 1 किलो |
| पुरा मोहल्ला | 1 किलो |
| कुम्हारिया कुआं | 1 किलो |
| नवचौकिया | 50 तोला |
| ब्रह्मपुरी | 50 तोला |
| आसोप की पोल | 50 तोला |
| नायों का बड़ | 50 तोला |
मेले का आकर्षण
मेले की विशेषता यह है कि देर शाम के बाद स्वांग रचकर सजी-धजी तीजणियां हाथों में बेंत लिए गवर माता के दर्शन के लिए निकलती हैं। परंपरा के अनुसार, मार्ग में बाधा बनने वालों को पूजन छड़ी से हल्का स्पर्श कर हटाया जाता है, जो इस उत्सव की विशिष्ट पहचान है।


