जयपुर। वक्त बीत गया, मौसम बदल गए, लेकिन नाहरगढ़ की तलहटी में बसी ‘पर्वतीय कॉलोनी’ के एक छोटे से घर की घड़ी 1 सितंबर 2024 के उस मनहूस दिन पर ठहर गई है। यहां की दीवारें आज भी उस सन्नाटे को चीरती हैं, जो राहुल के लापता होने के बाद पसरा था।
बीस महीने बीत चुके हैं, लेकिन मां सीता शर्मा के कान आज भी दरवाजे पर होने वाली हर ‘आहट’ को पहचानते हैं। उन्हें लगता है कि शायद इस बार कुंडी खुलेगी और उनका राहुल मुस्कुराते हुए कहेगा-‘मां, मैं आ गया!’

दरवाजे पर ठहरी मां की उम्मीद
जब भी घर की घंटी बजती है, मां सीता शर्मा का दिल जोर से धड़कने लगता है। वह लड़खड़ाते कदमों से दरवाजे की ओर दौड़ती हैं। यह उम्मीद नहीं, एक मां का अटूट विश्वास है जो पुलिस की फाइलों और पहाड़ियों की धूल में कहीं गुम नहीं हुआ। लेकिन हर बार दरवाजा खुलने पर सामने बेटे की जगह सिर्फ ‘खालीपन’ खड़ा होता है। उनकी पथराई आंखें अब बस यही पूछती हैं- ‘क्या कोई मेरे बेटे को ढूंढ़ लाएगा?’
एक भाई की मौत, दूसरा रहस्यमयी लापता
वह काली सुबह आज भी परिवार के जहन में ताजा है। एक सितंबर को राहुल और आशीष दोनों भाई नाहरगढ़ की पहाड़ियों पर चरण मंदिर गए थे। सुबह 11 बजे तक सब ठीक था, फिर आशीष का घबराया हुआ फोन आया- ‘राहुल नहीं मिल रहा!’ परिवार संभल पाता, उससे पहले ही सब कुछ बिखर गया। आशीष की लाश मिली और राहुल का आज तक कोई सुराग नहीं। पुलिस की लंबी चौड़ी तफ्तीश नाहरगढ़ की पहाड़ियों की उलझी गुत्थियों में कहीं दफन होकर रह गई है।
टूटी आर्थिक रीढ़: कर्ज का बोझ और कांजी-बड़े का बेबस ठेला
बीमारी और बेबसी: पिता सुरेश शर्मा कांजी-बड़े का ठेला लगाकर घर चलाते थे। अब उम्र और पैरों के दर्द ने साथ छोड़ दिया है। दो दिन काम करते हैं, तो तीन दिन बिस्तर पर गुजारने पड़ते हैं। पहले दोनों बेटे भी साथ देते थे।
कर्ज का फंदा: मकान बनाने के लिए रिश्तेदारों से लिया कर्ज अब गले की फांस बन गया है। 500-600 रुपए की अनिश्चित कमाई में घर का राशन देखें, दवाइयां लाएं या कर्ज चुकाएं?
‘पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और मन की शांति तो राहुल के साथ ही चली गई। क्या गरीब के बेटे को ढूंढना प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं है?’ – सुरेश शर्मा, पीड़ित पिता


