Iran Economic War: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने अब खाड़ी देशों के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है। तेहरान ने साफ संकेत दिया है कि अगर कोई पड़ोसी देश अमेरिका की आर्थिक कार्रवाई में उसके खिलाफ खड़ा होता है, तो उसे तटस्थ नहीं माना जाएगा। ईरान की यह चेतावनी ऐसे वक्त आई है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य, इजरायल-ईरान टकराव और लेबनान-सिरिया में जारी सैन्य गतिविधियों ने पूरे क्षेत्र में तनाव को और गहरा कर दिया है।
Iran Warning Gulf Countries: खाड़ी देशों को ईरान का सख्त संदेश
ईरान के सुरक्षा प्रमुख मोहसेन रेजाई ने खाड़ी देशों को बेहद कड़ा संदेश दिया है। उनका कहना है कि जो भी देश अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध या दूसरी आर्थिक कार्रवाई में शामिल होगा, उसे ईरान दुश्मन की श्रेणी में रखेगा।
रेजाई ने संकेत दिया कि ऐसे देशों के हितों को जवाबी कार्रवाई का निशाना बनाया जा सकता है। इस बयान ने खाड़ी क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।
दरअसल, ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। आर्थिक प्रतिबंध, तेल निर्यात, समुद्री मार्ग और क्षेत्रीय सहयोगी ये सभी अब इस टकराव के अहम हिस्से बन चुके हैं।
होर्मुज पर ट्रंप का बड़ा बयान
इस पूरे विवाद के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बेहद सख्त रुख दिखाया है। उन्होंने कहा है कि वह फिलहाल Strait of Hormuz को अमेरिकी क्षेत्र के तौर पर देखते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से की आवाजाही इसी रास्ते से होती है। इसलिए यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकता है।
यही वजह है कि ईरान की खाड़ी देशों को दी गई चेतावनी को केवल राजनीतिक बयान नहीं माना जा रहा।
ईरान की रणनीति में क्यों आया बदलाव?
ईरान पर नजर रखने वाले क्लिंगेंडेल इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता हमीदरेजा अजीजी के मुताबिक, तेहरान की सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है।
उनका आकलन है कि ईरान की पुरानी प्रतिरोध रणनीति अमेरिका और इजरायल के हमलों को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं रही। इसके बाद ईरान अब ऐसी रणनीति की ओर बढ़ रहा है, जिसमें संभावित खतरे के पूरी तरह सामने आने का इंतजार करने के बजाय पहले ही प्रतिक्रिया देने का संकेत दिया जा रहा है।
इसे ईरान की अर्ली डिटरेंस यानी शुरुआती स्तर पर खतरे को रोकने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
दो मोर्चों पर काम कर सकता है नया ‘ऑफेंसिव डॉक्ट्रिन’
अजीजी के मुताबिक ईरान की उभरती रणनीति में दो प्रमुख तत्व दिखाई दे रहे हैं।
पहला है प्री-एम्पशन यानी किसी संभावित खतरे के वास्तविक हमले में बदलने से पहले ही उसे रोकने की कोशिश।
दूसरा है असमानुपातिक जवाब यानी अगर हमला होता है तो जवाब इतना महंगा बनाया जाए कि भविष्य में विरोधी दोबारा ऐसा कदम उठाने से पहले कई बार सोचे।
अगर यह आकलन सही साबित होता है तो ईरान की नीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा। इसका मतलब यह होगा कि तेहरान अब केवल हमले का जवाब देने के बजाय संभावित हमले की तैयारी को भी खतरे के रूप में देख सकता है।
खाड़ी देशों के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
ईरान की ताजा चेतावनी का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि इसमें सीधे खाड़ी देशों के आर्थिक और रणनीतिक हितों का जिक्र है।
क्षेत्र के कई देश अमेरिका के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं और उनकी सुरक्षा व्यवस्था काफी हद तक अमेरिकी साझेदारी पर निर्भर करती है। दूसरी ओर, ईरान के साथ उनके भौगोलिक और आर्थिक संबंध भी हैं।
ऐसे में अगर अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाता है और खाड़ी देश उसमें सक्रिय भूमिका लेते हैं, तो वे तेहरान की जवाबी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
यानी इन देशों के सामने अब एक बेहद मुश्किल संतुलन है। अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखना या ईरान के साथ सीधे टकराव से बचना।
क्या बड़े टकराव की तैयारी हो रही है?
ईरान की ताजा चेतावनी को लेकर अजीजी का आकलन बेहद महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, ईरान का सैन्य-सुरक्षा प्रतिष्ठान एक और दौर के तनाव के लिए खुद को तैयार करता दिख रहा है।
अगर तेहरान सचमुच अपनी नई रणनीति के तहत संभावित खतरे को पहले ही निशाना बनाने की नीति अपनाता है, तो आने वाले समय में छोटी-सी सैन्य या आर्थिक कार्रवाई भी तेजी से बड़े संकट में बदल सकती है।


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