Iran Crisis: क्या अमेरिका की ‘जिद’ के कारण और ज्यादा तेजी से फिर भड़केगी ईरान के साथ जंग की आग ?

Iran Crisis: क्या अमेरिका की ‘जिद’ के कारण और ज्यादा तेजी से फिर भड़केगी ईरान के साथ जंग की आग ?

Negotiation: ईरान और अमेरिका के बीच भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गया है। दोनों देशों के बीच शांति बहाली को लेकर जारी बातचीत फिलहाल किसी ठोस और अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। इस बीच पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि बुधवार को दोनों देशों के बीच लागू मौजूदा संघर्ष विराम समाप्त हो रहा है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या दुनिया एक बार फिर भयानक युद्ध की गवाह बनेगी? हालात इतने नाजुक हो गए हैं कि वैश्विक व्यापार के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम ‘होर्मुज जलडमरूमध्य‘ के बंद होने की खबरें आ रही हैं।

बातचीत में प्रगति, लेकिन समझौता अभी दूर

ईरान के मुख्य वार्ताकार और उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने हालिया स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ आमने-सामने की बातचीत के अगले दौर के लिए अभी तक कोई नई तारीख तय नहीं की गई है। उनका यह बयान उन वैश्विक उम्मीदों पर पानी फेरता नजर आ रहा है, जिनमें कहा जा रहा था कि जल्द ही दोनों देशों के बीच कोई शांति समझौता हो सकता है। उप विदेश मंत्री ने यह जरूर माना कि पर्दे के पीछे चल रही बातचीत में कुछ हद तक प्रगति हुई है, लेकिन दोनों देश अभी भी एक अंतिम समझौते से मीलों दूर खड़े हैं।

अमेरिका की ‘अधिकतम’ मांगों पर अटका पेच

इस बढ़ते तनाव और कूटनीतिक गतिरोध की मुख्य वजह अमेरिका द्वारा रखी गई कड़ी शर्तें हैं। ईरानी वार्ताकार ने वाशिंगटन के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि अमेरिका अपनी “अधिकतम” (Maximalist) मांगों को छोड़ने से पूरी तरह इनकार कर रहा है। ईरान का स्पष्ट रुख है कि जब तक अमेरिका अपनी अड़ियल विदेश नीति और एकतरफा दबाव बनाने की रणनीति से पीछे नहीं हटता, तब तक कोई भी स्थायी शांति समझौता मेज पर नहीं आ सकता।

बुधवार का दिन है बेहद अहम

इस कूटनीतिक विफलता का सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शांति पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य वह अहम समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपना कच्चा तेल और गैस का व्यापार करता है। अगर बुधवार के बाद कोई नया समझौता नहीं होता है और फिर से युद्ध की चिंगारी भड़कती है, तो यह मार्ग पूरी तरह से बाधित हो सकता है। सीजफायर खत्म होने की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति युद्ध को टाल पाएगी या मिडिल ईस्ट फिर से बारूद के ढेर पर बैठ जाएगा।

सीधे आम आदमी की जेब पर भारी पड़ेगी जंग

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान ने कूटनीतिक लचीलापन नहीं दिखाया, तो यह गतिरोध तीसरे विश्व युद्ध की आहट बन सकता है। होर्मुज के बंद होने का सीधा मतलब है वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लगना, जो सीधे आम आदमी की जेब पर भारी पड़ेगा।

बड़ा पहलू भारत और अन्य एशियाई देशों के तेल आयात से जुड़ा

अब सबकी नजरें इस बात पर होंगी कि क्या बुधवार से पहले संयुक्त राष्ट्र या कोई अन्य मध्यस्थ देश हस्तक्षेप करके सीजफायर की अवधि को आगे बढ़वा पाएगा। साथ ही यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति भवन (व्हाइट हाउस) ईरान के इस ताजा बयान पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है। इस पूरे विवाद का एक बड़ा पहलू भारत और अन्य एशियाई देशों के तेल आयात से जुड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से सप्लाई चेन टूट सकती है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक भारी उछाल आ सकता है।

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