राजधानी पटना में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर खामी सामने आई है। शहर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (यूपीएचसी) कागजों पर आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश केंद्रों में आज भी 24×7 इमरजेंसी सेवा शुरू नहीं हो सकी है। इन केंद्रों पर नए भवन बन चुके हैं, करोड़ों की मशीनें लगाई गई हैं और डॉक्टरों तथा नर्सों की तैनाती भी की गई है। इसके बावजूद, मरीजों को चौबीसों घंटे इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आपात स्थिति में भी मरीज भटकने को मजबूर मामूली सड़क हादसे, अचानक तबीयत बिगड़ने, तेज बुखार, सांस फूलने, ब्लड प्रेशर बढ़ने या गर्भवती महिलाओं की आपात स्थिति में भी मरीजों को सीधे पीएमसीएच, एनएमसीएच, गर्दनीबाग अस्पताल या निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे बड़े अस्पतालों की इमरजेंसी पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, जबकि मोहल्ला स्तर पर बने सरकारी अस्पताल केवल ओपीडी तक सीमित रह गए हैं। ओपीडी तक सीमित रह गए मोहल्ला अस्पताल राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन की गाइडलाइन के अनुसार, हर सीएचसी और यूपीएचसी में प्राथमिक इमरजेंसी प्रबंधन की सुविधा अनिवार्य है। इसमें ऑक्सीजन, नेबुलाइजेशन, प्राथमिक उपचार, जरूरी दवाएं और मरीज को स्थिर कर रेफर करने की व्यवस्था शामिल है। इसके लिए प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्स और तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता भी आवश्यक मानी गई है। दोपहर बाद ओपीडी बंद, स्टॉफ भी नदारद राजधानी के अधिकांश केंद्रों में स्थिति बिल्कुल अलग है। सुबह ओपीडी में मरीजों की लंबी कतारें लगती हैं, लेकिन दोपहर बाद स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप हो जाती हैं। कई केंद्रों में शाम ढलते ही डॉक्टर और स्टाफ तक उपलब्ध नहीं रहते। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार ने मोहल्ला स्तर पर अस्पताल तो बनाए, लेकिन उनमें जीवनरक्षक सेवाएं शुरू नहीं हो सकीं, जिससे उन्हें अब भी बड़े अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। राजेंद्र नगर सीएचसी बना बदहाल व्यवस्था की मिसाल राजेंद्र नगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र राजधानी की बदहाल व्यवस्था का बड़ा उदाहरण बन गया है। यहां 30 बेड का आधुनिक भवन, लेबर रूम, ऑपरेशन थिएटर और एक्स-रे मशीन जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन न प्रसव सेवा शुरू हो सकी है और न इमरजेंसी इलाज। स्थिति यह है कि एनेस्थीसिया विशेषज्ञ होने के बावजूद केवल ओटी असिस्टेंट नहीं होने से ऑपरेशन नहीं हो पा रहे। वहीं एक्स-रे मशीन डेढ़ साल से बंद पड़ी है, क्योंकि यहां एक्स-रे टेक्नीशियन की नियुक्ति नहीं हुई है। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है। सरकारी अस्पताल में मुफ्त जांच नहीं मिलने से लोगों को निजी जांच केंद्रों में 300 से 500 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। डॉक्टर हैं, लेकिन इमरजेंसी टीम अधूरी स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि कई अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती कर दी गई है, लेकिन केवल डॉक्टरों की मौजूदगी से इमरजेंसी सेवा संचालित नहीं हो सकती। इसके लिए नर्स, टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट, वार्ड बॉय और अन्य तकनीकी कर्मियों की भी जरूरत होती है। राजेंद्र नगर सीएचसी में फिलहाल छह डॉक्टर और 12 नर्स मौजूद हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। कहीं एक्स-रे टेक्नीशियन नहीं हैं, तो कहीं ओटी असिस्टेंट का अभाव है। कई अस्पतालों में लैब कर्मियों की भी कमी बनी हुई है। नतीजा, करोड़ों रुपये की मशीनें धूल फांक रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानव संसाधन की पूरी व्यवस्था नहीं की गई तो सरकार की स्वास्थ्य योजनाएं केवल भवन और उद्घाटन तक सीमित रह जाएंगी। मामूली समस्याओं वाले मरीज भी पहुंच रहे PMCH, NMCH प्राथमिक स्तर पर इमरजेंसी सेवा नहीं मिलने का सीधा असर मेडिकल कॉलेजों और जिला स्तरीय अस्पतालों पर दिखाई दे रहा है। मामूली समस्याओं वाले मरीज भी पीएमसीएच और एनएमसीएच की इमरजेंसी में पहुंच रहे हैं। इससे वहां गंभीर मरीजों के इलाज पर असर पड़ रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे कई मरीज रोज इमरजेंसी में पहुंचते हैं, जिनका इलाज स्थानीय सीएचसी या यूपीएचसी में आसानी से हो सकता था। लेकिन मोहल्ला स्तर पर सुविधा नहीं होने के कारण सभी मरीज बड़े अस्पतालों की ओर भाग रहे हैं।
इससे अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है और स्वास्थ्यकर्मियों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है। गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की बढ़ी परेशानी इमरजेंसी सेवाओं की कमी का सबसे ज्यादा असर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को हो रही है। रात में प्रसव पीड़ा होने पर महिलाओं को कई किलोमीटर दूर बड़े अस्पताल ले जाना पड़ता है। ट्रैफिक और देरी कई बार जोखिम बढ़ा देती है। इसी तरह सांस की तकलीफ, हाई ब्लड प्रेशर, शुगर या तेज बुखार वाले मरीजों को भी स्थानीय स्तर पर तुरंत इलाज नहीं मिल पाता। लोगों का कहना है कि यदि मोहल्ला स्तर के अस्पतालों में 24 घंटे डॉक्टर, ऑक्सीजन और प्राथमिक इमरजेंसी सुविधा उपलब्ध हो जाए तो हजारों मरीजों को राहत मिल सकती है। विभाग का दावा- जल्द शुरू होगी 24 घंटे सेवा राजेंद्र नगर अस्पताल प्रभारी डॉ. विनय ठाकुर ने बताया कि, अस्पताल में प्रतिदिन 150 से अधिक मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। पहले डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण इमरजेंसी और ओटी सेवा शुरू नहीं हो पा रही थी, लेकिन अब स्थिति में सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा शुरू करने की प्रक्रिया चल रही है और विभाग को प्रस्ताव भेजा गया है। उम्मीद है कि जून तक यहां इमरजेंसी सुविधा शुरू हो जाएगी। पटना के सिविल सर्जन ने दावा किया कि अगले माह तक राजधानी के अधिकांश सीएचसी और यूपीएचसी में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा बहाल कर दी जाएगी। बड़ा सवाल: जमीनी हकीकत कब बदलेगी? सरकार ने राजधानी में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश किया है, लेकिन अधूरी तैयारियों और कर्मचारियों की कमी ने पूरी व्यवस्था की रफ्तार रोक दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मोहल्ला स्तर के सरकारी अस्पतालों में वास्तविक इमरजेंसी सेवा कब शुरू होगी? क्योंकि जब तक स्थानीय स्तर पर इलाज की मजबूत व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक बड़े अस्पतालों की भीड़ कम होना मुश्किल है। राजधानी पटना में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर खामी सामने आई है। शहर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (यूपीएचसी) कागजों पर आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश केंद्रों में आज भी 24×7 इमरजेंसी सेवा शुरू नहीं हो सकी है। इन केंद्रों पर नए भवन बन चुके हैं, करोड़ों की मशीनें लगाई गई हैं और डॉक्टरों तथा नर्सों की तैनाती भी की गई है। इसके बावजूद, मरीजों को चौबीसों घंटे इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आपात स्थिति में भी मरीज भटकने को मजबूर मामूली सड़क हादसे, अचानक तबीयत बिगड़ने, तेज बुखार, सांस फूलने, ब्लड प्रेशर बढ़ने या गर्भवती महिलाओं की आपात स्थिति में भी मरीजों को सीधे पीएमसीएच, एनएमसीएच, गर्दनीबाग अस्पताल या निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे बड़े अस्पतालों की इमरजेंसी पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, जबकि मोहल्ला स्तर पर बने सरकारी अस्पताल केवल ओपीडी तक सीमित रह गए हैं। ओपीडी तक सीमित रह गए मोहल्ला अस्पताल राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन की गाइडलाइन के अनुसार, हर सीएचसी और यूपीएचसी में प्राथमिक इमरजेंसी प्रबंधन की सुविधा अनिवार्य है। इसमें ऑक्सीजन, नेबुलाइजेशन, प्राथमिक उपचार, जरूरी दवाएं और मरीज को स्थिर कर रेफर करने की व्यवस्था शामिल है। इसके लिए प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्स और तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता भी आवश्यक मानी गई है। दोपहर बाद ओपीडी बंद, स्टॉफ भी नदारद राजधानी के अधिकांश केंद्रों में स्थिति बिल्कुल अलग है। सुबह ओपीडी में मरीजों की लंबी कतारें लगती हैं, लेकिन दोपहर बाद स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप हो जाती हैं। कई केंद्रों में शाम ढलते ही डॉक्टर और स्टाफ तक उपलब्ध नहीं रहते। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार ने मोहल्ला स्तर पर अस्पताल तो बनाए, लेकिन उनमें जीवनरक्षक सेवाएं शुरू नहीं हो सकीं, जिससे उन्हें अब भी बड़े अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। राजेंद्र नगर सीएचसी बना बदहाल व्यवस्था की मिसाल राजेंद्र नगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र राजधानी की बदहाल व्यवस्था का बड़ा उदाहरण बन गया है। यहां 30 बेड का आधुनिक भवन, लेबर रूम, ऑपरेशन थिएटर और एक्स-रे मशीन जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन न प्रसव सेवा शुरू हो सकी है और न इमरजेंसी इलाज। स्थिति यह है कि एनेस्थीसिया विशेषज्ञ होने के बावजूद केवल ओटी असिस्टेंट नहीं होने से ऑपरेशन नहीं हो पा रहे। वहीं एक्स-रे मशीन डेढ़ साल से बंद पड़ी है, क्योंकि यहां एक्स-रे टेक्नीशियन की नियुक्ति नहीं हुई है। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है। सरकारी अस्पताल में मुफ्त जांच नहीं मिलने से लोगों को निजी जांच केंद्रों में 300 से 500 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। डॉक्टर हैं, लेकिन इमरजेंसी टीम अधूरी स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि कई अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती कर दी गई है, लेकिन केवल डॉक्टरों की मौजूदगी से इमरजेंसी सेवा संचालित नहीं हो सकती। इसके लिए नर्स, टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट, वार्ड बॉय और अन्य तकनीकी कर्मियों की भी जरूरत होती है। राजेंद्र नगर सीएचसी में फिलहाल छह डॉक्टर और 12 नर्स मौजूद हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। कहीं एक्स-रे टेक्नीशियन नहीं हैं, तो कहीं ओटी असिस्टेंट का अभाव है। कई अस्पतालों में लैब कर्मियों की भी कमी बनी हुई है। नतीजा, करोड़ों रुपये की मशीनें धूल फांक रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानव संसाधन की पूरी व्यवस्था नहीं की गई तो सरकार की स्वास्थ्य योजनाएं केवल भवन और उद्घाटन तक सीमित रह जाएंगी। मामूली समस्याओं वाले मरीज भी पहुंच रहे PMCH, NMCH प्राथमिक स्तर पर इमरजेंसी सेवा नहीं मिलने का सीधा असर मेडिकल कॉलेजों और जिला स्तरीय अस्पतालों पर दिखाई दे रहा है। मामूली समस्याओं वाले मरीज भी पीएमसीएच और एनएमसीएच की इमरजेंसी में पहुंच रहे हैं। इससे वहां गंभीर मरीजों के इलाज पर असर पड़ रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे कई मरीज रोज इमरजेंसी में पहुंचते हैं, जिनका इलाज स्थानीय सीएचसी या यूपीएचसी में आसानी से हो सकता था। लेकिन मोहल्ला स्तर पर सुविधा नहीं होने के कारण सभी मरीज बड़े अस्पतालों की ओर भाग रहे हैं।
इससे अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है और स्वास्थ्यकर्मियों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है। गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की बढ़ी परेशानी इमरजेंसी सेवाओं की कमी का सबसे ज्यादा असर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को हो रही है। रात में प्रसव पीड़ा होने पर महिलाओं को कई किलोमीटर दूर बड़े अस्पताल ले जाना पड़ता है। ट्रैफिक और देरी कई बार जोखिम बढ़ा देती है। इसी तरह सांस की तकलीफ, हाई ब्लड प्रेशर, शुगर या तेज बुखार वाले मरीजों को भी स्थानीय स्तर पर तुरंत इलाज नहीं मिल पाता। लोगों का कहना है कि यदि मोहल्ला स्तर के अस्पतालों में 24 घंटे डॉक्टर, ऑक्सीजन और प्राथमिक इमरजेंसी सुविधा उपलब्ध हो जाए तो हजारों मरीजों को राहत मिल सकती है। विभाग का दावा- जल्द शुरू होगी 24 घंटे सेवा राजेंद्र नगर अस्पताल प्रभारी डॉ. विनय ठाकुर ने बताया कि, अस्पताल में प्रतिदिन 150 से अधिक मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। पहले डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण इमरजेंसी और ओटी सेवा शुरू नहीं हो पा रही थी, लेकिन अब स्थिति में सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा शुरू करने की प्रक्रिया चल रही है और विभाग को प्रस्ताव भेजा गया है। उम्मीद है कि जून तक यहां इमरजेंसी सुविधा शुरू हो जाएगी। पटना के सिविल सर्जन ने दावा किया कि अगले माह तक राजधानी के अधिकांश सीएचसी और यूपीएचसी में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा बहाल कर दी जाएगी। बड़ा सवाल: जमीनी हकीकत कब बदलेगी? सरकार ने राजधानी में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश किया है, लेकिन अधूरी तैयारियों और कर्मचारियों की कमी ने पूरी व्यवस्था की रफ्तार रोक दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मोहल्ला स्तर के सरकारी अस्पतालों में वास्तविक इमरजेंसी सेवा कब शुरू होगी? क्योंकि जब तक स्थानीय स्तर पर इलाज की मजबूत व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक बड़े अस्पतालों की भीड़ कम होना मुश्किल है।


