मप्र हाई कोर्ट ने शासन की याचिका स्वीकार कर ली है, जिसमें दंदरौआ मंदिर के पास स्थित लगभग 55.43 हेक्टेयर जमीन के स्वामित्व से जुड़े मामले को फिर से सुनवाई पर लेने की अनुमति मांगी गई थी। हाई कोर्ट ने दो लाख कॉस्ट जमा करने की शर्त पर याचिका री-स्टोर करने का आदेश दिया। राशि रेडक्रॉस सोसायटी, ग्वालियर के खाते में जमा करानी होगी। कोर्ट ने शासन से कहा कि वह चाहें तो कॉस्ट की वसूली दोषी अधिकारियों से कर सकता है। 24 जुलाई 2007 को पौधारोपण के लिए जमीन दंदरौआ सरकार पब्लिक ट्रस्ट को दी गई थी। ये आवंटन कलेक्टर भिंड ने 25 अप्रैल 2011 को निरस्त किया। इसके खिलाफ अपील की गई। 15 जनवरी 2015 को राजस्व मंडल ने कलेक्टर का आदेश पलट दिया। इस आदेश के खिलाफ मप्र शासन ने लगभग 6 साल बाद 2021 में याचिका पेश की। 13 फरवरी 2024 को उसमें नोटिस जारी किए गए। 29 मई 2024 को प्रोसेस फीस जमा नहीं होने के कारण शासन की याचिका को खारिज कर दिया गया। उस याचिका को फिर से सुनवाई पर लेने के लिए एक और याचिका पेश की गई, जिसे पेश करने में 341 दिन का विलंब हुआ। प्रोसेस फीस जमा नहीं करने और 341 दिन की देरी पर कोर्ट ने दो लाख की कॉस्ट लगाई। अब राजस्व मंडल के फैसले के खिलाफ शासन की याचिका पर फिर से सुनवाई होगी। शासन भी अधिकारियों के बुरे कर्मों का शिकार! इस मामले में राजस्व रिकॉर्ड में निजी पक्षकार का नाम डालने पर तत्कालीन तहसीलदार राजनारायण खरे के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। कोर्ट ने इस कार्रवाई के साथ ही भिंड कलेक्टर के खिलाफ मप्र के मुख्य सचिव द्वारा की गई कार्रवाई का भी आदेश में हवाला दिया। शासन की ओर से दलील दी गई कि उसे भी अपने अधिकारियों के माध्यम से ही काम करवाना होता है। कभी-कभी शासन स्वयं भी अधिकारियों के बुरे कर्मों का शिकार हो जाता है।


