अररिया में हिंदी साहित्य के महान कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। यह आयोजन अररिया शहर के रेणु कुंज में स्थानीय अधिवक्ताओं और समाजसेवियों द्वारा किया गया। उपस्थित लोगों ने रेणु जी की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया। सभा में रेणु जी की स्मृति को अमर रखते हुए उनकी साहित्यिक देन पर विस्तृत चर्चा की गई। प्रतिमा पर माल्यार्पण करने वालों में देवनारायण सेन, जितेंद्र नाथ राय, कृपानंद मंडल, कश्यप कौशल, सब्यसाची सेन, दिव्या ज्योति सेन, अजीमुद्दीन सहित कई गणमान्य नागरिक शामिल थे। शोषण, दमन और सामाजिक अन्याय के खिलाफ सशक्त आवाज उठाई सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि रेणु जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से बिहार के ग्रामीण जीवन, उसकी मिट्टी, संस्कृति और आम आदमी की पीड़ा को विश्व पटल पर स्थापित किया। उनकी अमर कृति ‘मैला आंचल’ ने आंचलिक साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। रेणु जी ने अपनी रचनाओं में शोषण, दमन और सामाजिक अन्याय के खिलाफ सशक्त आवाज उठाई। देवनारायण सेन ने कहा कि रेणु जी ने अपनी कलम से इस माटी को विश्व पटल पर पहचान दिलाई। उनका साहित्य न सिर्फ मनोरंजन करता है, बल्कि समाज को आईना भी दिखाता है। जितेंद्र नाथ राय ने रेणु जी के संघर्षशील जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक न्याय तक हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। कृपानंद मंडल ने नई पीढ़ी को रेणु साहित्य से जुड़ने का आग्रह किया, क्योंकि इसमें जीवन की सच्ची शिक्षा निहित है। निधन 11 अप्रैल 1977 को पटना में हुआ रेणु कुंज में आयोजित यह श्रद्धांजलि सभा भावुक माहौल में संपन्न हुई। सभी उपस्थित लोगों ने रेणु जी के आदर्शों और साहित्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। स्थानीय लोगों ने मांग की कि रेणु कुंज को और बेहतर बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी यहां से प्रेरणा ले सके। फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को अररिया जिले के औराही हिंगना गांव में हुआ था। उनका निधन 11 अप्रैल 1977 को पटना में हुआ। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘मैला आंचल’, ‘परती परिकथा’, ‘कितने चौराहे’ आदि शामिल हैं। रेणु साहित्य आज भी बिहार की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अररिया में हिंदी साहित्य के महान कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। यह आयोजन अररिया शहर के रेणु कुंज में स्थानीय अधिवक्ताओं और समाजसेवियों द्वारा किया गया। उपस्थित लोगों ने रेणु जी की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया। सभा में रेणु जी की स्मृति को अमर रखते हुए उनकी साहित्यिक देन पर विस्तृत चर्चा की गई। प्रतिमा पर माल्यार्पण करने वालों में देवनारायण सेन, जितेंद्र नाथ राय, कृपानंद मंडल, कश्यप कौशल, सब्यसाची सेन, दिव्या ज्योति सेन, अजीमुद्दीन सहित कई गणमान्य नागरिक शामिल थे। शोषण, दमन और सामाजिक अन्याय के खिलाफ सशक्त आवाज उठाई सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि रेणु जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से बिहार के ग्रामीण जीवन, उसकी मिट्टी, संस्कृति और आम आदमी की पीड़ा को विश्व पटल पर स्थापित किया। उनकी अमर कृति ‘मैला आंचल’ ने आंचलिक साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। रेणु जी ने अपनी रचनाओं में शोषण, दमन और सामाजिक अन्याय के खिलाफ सशक्त आवाज उठाई। देवनारायण सेन ने कहा कि रेणु जी ने अपनी कलम से इस माटी को विश्व पटल पर पहचान दिलाई। उनका साहित्य न सिर्फ मनोरंजन करता है, बल्कि समाज को आईना भी दिखाता है। जितेंद्र नाथ राय ने रेणु जी के संघर्षशील जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे स्वतंत्रता संग्राम से लेकर सामाजिक न्याय तक हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। कृपानंद मंडल ने नई पीढ़ी को रेणु साहित्य से जुड़ने का आग्रह किया, क्योंकि इसमें जीवन की सच्ची शिक्षा निहित है। निधन 11 अप्रैल 1977 को पटना में हुआ रेणु कुंज में आयोजित यह श्रद्धांजलि सभा भावुक माहौल में संपन्न हुई। सभी उपस्थित लोगों ने रेणु जी के आदर्शों और साहित्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। स्थानीय लोगों ने मांग की कि रेणु कुंज को और बेहतर बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी यहां से प्रेरणा ले सके। फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को अररिया जिले के औराही हिंगना गांव में हुआ था। उनका निधन 11 अप्रैल 1977 को पटना में हुआ। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘मैला आंचल’, ‘परती परिकथा’, ‘कितने चौराहे’ आदि शामिल हैं। रेणु साहित्य आज भी बिहार की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


