Corporate Bond Investment Tips: जब शेयर बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और सोने-चांदी की कीमतें भी एक दायरे में घूम रही हैं, तो रेगुलर इनकम के लिए कॉरपोरेट बॉन्ड एक आकर्षक विकल्प बन सकते हैं। इन पर आमतौर पर 6 से 8 फीसदी तक ब्याज मिल सकता है, जो कई पारंपरिक फिक्स्ड इनकम विकल्पों से बेहतर नजर आता है। लेकिन यहां एक बात ध्यान रखनी होगी। सिर्फ ज्यादा ब्याज देखकर कॉरपोरेट बॉन्ड खरीदना समझदारी नहीं है। ज्यादा रिटर्न के साथ जोखिम भी बढ़ सकता है। कंपनी के डिफॉल्ट करने से लेकर बॉन्ड को समय से पहले बेचने में परेशानी तक, निवेशकों को कई पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। आइए विस्तार से जानते हैं।
कॉरपोरेट बॉन्ड आखिर होता क्या है?
जब किसी कंपनी को कारोबार बढ़ाने या दूसरी जरूरतों के लिए पैसे चाहिए होते हैं, तो वह निवेशकों से पैसा उधार ले सकती है। इसके बदले कंपनी तय ब्याज देती है और एक निश्चित अवधि पूरी होने पर मूल रकम लौटाने का वादा करती है। इसी तरह के निवेश को कॉरपोरेट बॉन्ड कहा जाता है। बॉन्ड पर मिलने वाले ब्याज को कूपन कहा जाता है। यह एफडी से थोड़ा अलग है। एफडी में बैंक से मिलने वाली रकम और ब्याज की शर्तें तय होती हैं, जबकि कॉरपोरेट बॉन्ड शेयरों की तरह सेकेंडरी मार्केट में खरीदे और बेचे जा सकते हैं। यानी आप चाहें तो मैच्योरिटी से पहले बॉन्ड बेच सकते हैं। लेकिन यहां पेंच यह है कि जब आपको बेचने की जरूरत हो, उस समय खरीदार मिले ही, यह जरूरी नहीं है। बाजार में उतार-चढ़ाव के समय बॉन्ड किसी पोर्टफोलियो को कुछ स्थिरता देने में मदद कर सकते हैं।
सबसे पहले तय करें, पैसा कब चाहिए?
सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार डॉ रवि सिंह के अनुसार, बॉन्ड में पैसा लगाने से पहले यह तय करना ज्यादा जरूरी है कि आपको उस पैसे की जरूरत कब पड़ेगी। मान लीजिए आपको किसी लक्ष्य के लिए एक साल बाद पैसे चाहिए। दूसरे लक्ष्य के लिए तीन साल बाद और तीसरे लक्ष्य के लिए पांच साल बाद रकम की जरूरत है। ऐसी स्थिति में अलग-अलग अवधि वाले बॉन्ड चुने जा सकते हैं। इसे बॉन्ड लैडरिंग कहा जाता है। इस रणनीति में अलग-अलग मैच्योरिटी वाले बॉन्ड रखे जाते हैं, जिससे जरूरत के हिसाब से समय-समय पर पैसा मिलता रहे। निवेशक अलग-अलग कंपनियों के बॉन्ड भी ले सकते हैं।
ज्यादा ब्याज देखकर कहीं फंस न जाएं
डॉ रवि के अनुसार, कॉरपोरेट बॉन्ड चुनते समय सबसे बड़ा लालच ब्याज दर का होता है। कोई बॉन्ड 9 फीसदी या 10 फीसदी का रिटर्न दे रहा हो, तो वह पहली नजर में आकर्षक लग सकता है। लेकिन सवाल यह होना चाहिए कि कंपनी इतना ज्यादा ब्याज क्यों दे रही है? आमतौर पर ज्यादा रिटर्न का मतलब ज्यादा जोखिम भी हो सकता है। सिंह के मुताबिक निवेशकों को यह देखना चाहिए कि बॉन्ड सिक्योर्ड है या अनसिक्योर्ड। इसके साथ ही कंपनी की क्रेडिट रेटिंग पर भी ध्यान देना चाहिए। आम तौर पर बेहतर रेटिंग वाले, खासकर AA+ या उससे ऊपर के बॉन्ड को प्राथमिकता देने पर विचार किया जा सकता है।
रेटिंग के साथ कंपनी की आर्थिक स्थिति भी देखनी चाहिए। कंपनी पर कितना कर्ज है, उसका डेट टू इक्विटी रेश्यो क्या है और पिछले कुछ सालों में उसका प्रदर्शन कैसा रहा है, इन बातों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
कॉरपोरेट बॉन्ड में होती हैं कई तरह की क्रेडिट रेटिंग
| रेटिंग | सुरक्षा का स्तर | जोखिम स्तर |
|---|---|---|
| AAA | सबसे उच्च स्तर की सुरक्षा, डिफॉल्ट का जोखिम बहुत कम | बहुत कम |
| AA | सुरक्षा का उच्च स्तर, डिफॉल्ट का जोखिम कम | कम |
| A | पर्याप्त सुरक्षा, लेकिन कारोबारी परिस्थितियों में बदलाव का ज्यादा असर | मध्यम |
| BBB | मध्यम सुरक्षा, A रेटिंग वाले बॉन्ड की तुलना में ज्यादा जोखिम | मध्यम से ज्यादा |
| BB | डिफॉल्ट का जोखिम अधिक, भुगतान करने की क्षमता कमजोर | ज्यादा |
| B | डिफॉल्ट का काफी जोखिम | बहुत ज्यादा |
| C | बेहद ज्यादा जोखिम, जारीकर्ता के भुगतान को लेकर गंभीर चिंता | अत्यधिक |
| D | डिफॉल्ट हो चुका है या डिफॉल्ट की आशंका है | डिफॉल्ट |
Coupon और YTM में क्या अंतर है?
बॉन्ड में निवेश करते समय दो शब्द अक्सर सामने आते हैं- कूपन और यील्ड टू मैच्यरिटी ( YTM)। कूपन रेट वह ब्याज दर है जो बॉन्ड के साथ तय होती है। वहीं YTM यह समझने में मदद करता है कि मौजूदा कीमत पर बॉन्ड को मैच्योरिटी तक रखने पर निवेशक को तय शर्तों के आधार पर वास्तविक तौर पर कितना रिटर्न मिल सकता है। खासकर सेकेंडरी मार्केट से बॉन्ड खरीदते समय YTM काफी काम की जानकारी देता है।
बॉन्ड में लिक्विडिटी भी बड़ा जोखिम
डॉ रवि के अनुसार, शेयरों की तरह हर कॉरपोरेट बॉन्ड में लगातार खरीद-बिक्री नहीं होती। कुछ बॉन्ड में कारोबार बहुत कम हो सकता है। मान लीजिए आपको अचानक पैसों की जरूरत पड़ गई और आपने मैच्योरिटी से पहले बॉन्ड बेचने का फैसला किया। लेकिन उस समय खरीदार नहीं मिला तो पैसा निकालना आसान नहीं होगा। रिटेल निवेशकों के लिए यह जोखिम खास तौर पर महत्वपूर्ण है। अगर आपका इरादा बॉन्ड को मैच्योरिटी तक रखने का है तो लिक्विडिटी की चिंता कुछ कम हो सकती है। लेकिन अगर आप बीच में खरीद-बिक्री करना चाहते हैं, तो सेकेंडरी मार्केट में उस बॉन्ड की ट्रेडिंग और खरीदारों की उपलब्धता को जरूर देखना चाहिए।
सिर्फ शेयर बाजार की गिरावट देखकर बॉन्ड में पैसा न डालें
शेयर बाजार कमजोर चल रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरा पैसा निकालकर कॉरपोरेट बॉन्ड में लगा दिया जाए। सिंह के अनुसार, निवेश का फैसला आपकी उम्र, वित्तीय लक्ष्य और जोखिम उठाने की क्षमता के हिसाब से होना चाहिए। पोर्टफोलियो में इक्विटी, फिक्स्ड इनकम और दूसरे निवेश विकल्पों का सही संतुलन रखना जरूरी है। समय-समय पर इस एसेट एलोकेशन की समीक्षा भी करनी चाहिए। जो निवेशक कम जोखिम लेना चाहते हैं और उन्हें नियमित कैश फ्लो की जरूरत है, उनके लिए कॉरपोरेट बॉन्ड डायवर्सिफाइड फिक्स्ड इनकम पोर्टफोलियो का एक हिस्सा हो सकते हैं।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। कॉर्पोरेट बॉन्ड एक जोखिमभरा निवेश विकल्प है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)

