इंदौर के भागीरथपुरा में पीड़ित परिवारों की ‘बेरंग’ होली:35 मौतों वालों घरों के आंगन सूने, किसी ने जीवनसाथी गंवाया तो किसी ने बेटा

इंदौर के भागीरथपुरा में पीड़ित परिवारों की ‘बेरंग’ होली:35 मौतों वालों घरों के आंगन सूने, किसी ने जीवनसाथी गंवाया तो किसी ने बेटा

रंगों का त्योहार होली हर साल अपने साथ खुशियों की बौछार, रिश्तों की नई गर्माहट और जीवन के उल्लास का संदेश लेकर आता है। मगर, इस बार की होली इंदौर के भागीरथपुरा के लिए फीकी और बेरंग है। यहां की गलियों में एक खामोश उदासी छाई है। जिन आंगनों में कभी ठहाके गूंजते थे, वहां अब सिसकियां और तस्वीरें रह गई हैं। भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से 35 लोगों की मौत हो गई। ये उनके परिवार वालों के लिए पहली होली है। जिन हाथों से गुलाल उड़ता था, वे अब तस्वीरों पर फूल चढ़ा रहे हैं। दैनिक भास्कर ने जब पीड़ित परिवारों से बात की तो दर्द शब्दों में ढलता चला गया। कहीं जीवनसाथी की अचानक विदाई, तो कहीं अधूरी रह गई तीर्थयात्रा की इच्छा। 6 महीने के मासूम अव्यान की मौत के सदमे से मां अभी तक उबर नहीं पाई है। पढ़िए, रिपोर्ट… केस 1: हम तो सीहोर जाने वाले थे, ये पहले ही चले गए
भागीरथपुरा की एक संकरी गली में रहने वाली 80 वर्षीय जशोदा बाई की कांपती आवाज में आज भी वह मनहूस सुबह अटकी हुई है, जिसने उनकी दुनिया उजाड़ दी। उनके पति जीवन सिंह, अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी यादें और एक अधूरी तीर्थयात्रा का सपना ही अब जशोदा बाई का सहारा है। वे बताती हैं, ‘हम तो एक तारीख को सीहोर जाने वाले थे। गाड़ी भी कर ली थी। प्रदीप मिश्रा जी के दर्शन करने कुबेरेश्वर धाम जाना था। नए साल की शुरुआत थी और दोनों ने सोचा था कि भगवान के दर पर माथा टेककर आशीर्वाद लेंगे, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। उस रात अचानक जीवन सिंह की तबीयत बिगड़ने लगी। उल्टी दो-तीन बार ही हुई, लेकिन दस्त बहुत ज्यादा लगे। मैं रातभर उनके कपड़े बदलती रही। हम दोनों ही तो थे घर में, बहू-बेटा अलग रहते हैं।’ उस रात उन्होंने अकेले ही अपने पति की सेवा की, इस उम्मीद में कि सुबह तक सब ठीक हो जाएगा। सुबह करीब सवा सात बजे, जब नर्मदा का पानी भरने का समय हुआ तो वे पानी भरने गईं। लेकिन मन में एक अजीब सी घबराहट थी। वे आधा पानी भरकर ही पति को देखने के लिए दौड़ीं। उम्र ज्यादा थी, मगर कोई बीमारी नहीं थी
ठीक साढ़े सात बजे जीवन सिंह ने अंतिम सांस ली। जशोदा बाई कहती हैं, ‘उम्र तो 80 साल की थी, पर ऐसे लगते थे जैसे अभी और अच्छे से चल सकते थे। कोई बीमारी नहीं थी उन्हें।’ विडंबना देखिए, जिस नर्मदा के पानी ने उनके पति की जान ली, उसी नर्मदा का नल उस दिन के बाद से उनके घर में सूख गया। वह अपनी बेबसी बयां करते हुए कहती हैं, ‘जिस दिन वो गए, उसी दिन के बाद से नल बंद है। दो महीने हो गए, पानी आता ही नहीं। अब तो RO का पानी खरीदकर पीते हैं।’ सरकारी मदद के सवाल पर वे बस इतना कहती हैं, ‘वही मिले हैं, जो आप बता रहे हो।’ उनकी आंखों में सवाल नहीं, बल्कि एक गहरी निराशा है, जो शायद अब कभी खत्म नहीं होगी। केस 2: चाय भी छोड़ दी…अब मंदिर में खाना खाता हूं
उसी इलाके के एक दूसरे घर में दिगंबर वाढ़े अपनी पत्नी मंजुला वाढ़े की तस्वीर को निहारते हुए रो पड़ते हैं। उनका हर आंसू उस अकेलेपन की कहानी कहता है, जो उनकी पत्नी के जाने के बाद उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। दिगंबर कहते हैं- उसकी याद मेरे से भुलाई ही नहीं जाती। वो मेरा सब कुछ करती थी। अब मैं बिल्कुल अकेला हो गया हूं। पत्नी के जाने का असर उनके जीवन पर इतना गहरा पड़ा है कि उन्होंने अपनी सबसे पसंदीदा चीज चाय तक पीना छोड़ दिया। वे कहते हैं- पहले वो बनाकर देती थी। अब चाय भी अपने हाथ से बनाकर पीनी पड़ती है। इसलिए अब चाय भी नहीं पीता हूं। खाना बनाने में बहुत परेशानी होती है। वो बहुत अच्छा खाना बनाती थी। अब तो एक समय साईं बाबा मंदिर जाकर खाना खा लेता हूं और शाम के लिए टिफिन लगा रखा है। मेरी पांच बेटियां हैं, लेकिन कोई बेटा नहीं है। मेरी लड़कियां ही मेरा सहारा हैं। उन्होंने मुझे कभी अकेला नहीं रहने दिया। आज भी अपने पास बुलाती हैं, लेकिन सबका अपना घर-परिवार है। मेरी दिनचर्या भी अलग है। मैं सवेरे तीन बजे उठकर भगवान का स्मरण करता हूं। 29 को तबीयत बिगड़ी, अस्पताल ले जाते वक्त दम तोड़ा
उस आखिरी रात को याद करते हुए दिगंबर वाढ़े बताते हैं- 29 दिसंबर की रात 11 बजे अचानक मंजुला की तबीयत बिगड़ी। 28 तारीख को मेरी औरंगाबाद वाली बेटी यहां आई थी। 29 को रात साढ़े दस बजे तक वो फोन पर सबसे बात करती रहीं- कैसे हो, पहुंचे कि नहीं। इसके तुरंत बाद उल्टी-दस्त का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह रुका ही नहीं। इतने ज्यादा दस्त हुए कि मैं परेशान हो गया। रात में किसी को बुला भी नहीं पाया। मैंने उसके कपड़े धोए, सब संभाला। सुबह जब मदद के लिए बाहर निकला, तो नगर निगम की टीम गली में सर्वे कर रही थी। डॉक्टरों ने देखते ही कहा कि हालत बहुत सीरियस है, इन्हें तुरंत MY अस्पताल पहुंचा दो। मंजुला को एम्बुलेंस से अस्पताल ले जाया गया, लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसे फिर से उल्टी-दस्त हुई और रास्ते में ही वो खत्म हो गई। दिगंबर की आवाज भर्रा जाती है। महाराजा यशवंतराव अस्पताल (MY अस्पताल) पहुंचने पर डॉक्टरों ने दो बार ECG किया। फिर बोले – बाबा, अब ये खत्म हो गई हैं। जब उन्होंने अपनी पत्नी का शव मांगा, तो पोस्टमार्टम की बात कही गई। दिगंबर नहीं चाहते थे कि पत्नी के शरीर के साथ कोई छेड़छाड़ हो। लेकिन अस्पताल वाले बोले कि हमें यह देखना है कि मृत्यु पानी से हुई है या किसी और वजह से। केस 3: मां बोली- उसकी कुंडली में राजयोग लिखा था
इस पूरी त्रासदी का सबसे दर्दनाक अध्याय अव्यान की कहानी है। छह महीने का एक मासूम, जिसकी किलकारियां अब उसकी मां साधना के कानों में एक गूंज बनकर रह गई हैं। दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन साधना की आंखों के सामने से अपने बेटे का चेहरा एक पल के लिए भी नहीं हटता। साधना की आवाज में एक गहरी थकान है। वे कहती हैं, ‘जब से बच्चा गया है, तब से मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती। खराब ही रहती है।’ भगवान गणेश पर रखा था अव्यान का नाम
अव्यान का नाम यूं ही नहीं रखा गया था। इसके पीछे एक बहन की ख्वाहिश और माता-पिता के सपने थे। साधना बताती हैं, “मेरी बेटी किंजल 5वीं क्लास में है। वो हमेशा कहती थी कि सबके यहां राखी बांधने के लिए भैया होते हैं, अपना भी होना चाहिए। मैंने साल भर पहले से ही सोच रखा था कि अगर बेटा हुआ, तो उसका नाम अव्यान रखूंगी। यह भगवान गणेश का एक नाम है- विघ्नहर्ता। पूरे परिवार ने मिलकर यह नाम तय किया था। अव्यान की कुंडली भी बनवाई गई थी। साधना उसे याद करते हुए कहती हैं, ‘पंडितजी ने बहुत अच्छा बताया था। 27 दिन का मूल था और कुंडली में ‘राजयोग’ था। उसमें अल्पायु जैसी कोई बात नहीं थी। लिखा था कि उसका भविष्य बहुत अच्छा होगा, वह एक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति बनेगा और सब उसकी बात सुनेंगे। प्रेग्नेंसी के दौरान मैं सिर्फ अच्छी चीजें पढ़ती और देखती थी। न्याय की लड़ाई और अफवाहों का सामना
अपने असहनीय दुख के बावजूद, साधना ने हिम्मत नहीं हारी है। वे अपने बेटे और अन्य पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं। आज वे उसी बेटे के दस्तावेज लेकर आयोग और कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं, जिसके लिए उन्होंने कभी संस्कारवान भविष्य के सपने देखे थे। इस दौरान उन्हें अफवाहों का भी सामना करना पड़ा। जब राहुल गांधी इंदौर आए, तो यह अफवाह उड़ी कि साधना का परिवार घर पर ताला लगाकर कहीं चला गया है। वे इस पर सफाई देती हैं, “हम सिर्फ दो घंटे के लिए बाहर गए थे। क्या कोई बिना ताला लगाए घर छोड़कर जाएगा? मीडिया ने इसे मुद्दा बना दिया। हम रात तक घर वापस आ गए थे।” पीड़ित परिवार बोले- क्षतिपूर्ति नहीं, न्याय चाहिए
भागीरथपुरा मामले की जांच के लिए बने आयोग ने पीड़ित परिवारों से दस्तावेज मांगे हैं। साधना ने डेथ सर्टिफिकेट, जन्म प्रमाणपत्र, टीकाकरण रिकॉर्ड और अस्पताल के कागजात सहित सभी दस्तावेज जमा कर दिए हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे कोर्ट केस करना चाहेंगी, तो उन्होंने बिना झिझक कहा, “हां, हम करना चाहेंगे।” वह कहती हैं कि जो खोया है, उसकी क्षतिपूर्ति तो हो नहीं सकती। अगर, मैं कुछ मांगूंगी तो लोग कहेंगे कि पैसा मांग रही है, लेकिन अगर हम मांग नहीं करेंगे, तो समाज में गलत होता रहेगा। जो भी जिम्मेदार हैं, उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। सभी पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा और एक स्थायी सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए। अगर हम चुप बैठ गए, तो वे सोचेंगे कि ये लोग बेवकूफ हैं, इनके साथ जो चाहो कर लो। मुआवजे को लेकर उड़ी अफवाहों पर वे कहती हैं, ‘अगर हम लालची होते, तो रेड क्रॉस सोसाइटी की तरफ से मिला 2 लाख का चेक लौटाते नहीं। बार-बार कहने पर हमने वह मदद ली। इसके अलावा हमने कोई सहायता नहीं ली है। अधिकारियों की तरफ से एक प्राइवेट स्कूल में 10-12 हजार की नौकरी का ऑफर भी आया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। सूनी होली, भारी मन और अनसुलझे सवाल
दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन भागीरथपुरा के कई घरों में आज भी नियमित पानी की सप्लाई नहीं है। लोग अब भी RO या बोतलबंद पानी पर निर्भर हैं। जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनके लिए मुआवजे से ज्यादा जरूरी भरोसे की बहाली है। इस बार यहां गुलाल कम उड़ेगा, लेकिन सवाल ज्यादा उठेंगे। क्या साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरत भी अब भरोसे के साथ नहीं मिल पाएगी? इस त्रासदी के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या दोषियों को सजा मिलेगी? भागीरथपुरा की यह पहली ‘बैरंग’ होली सिर्फ एक त्योहार का फीकापन नहीं है, बल्कि यह उस त्रासदी की एक दर्दनाक याद है जिसने 35 जिंदगियां छीन लीं। रंगों से पहले ही यहां कई सपने धुल गए।

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