पंजाबी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जा रहा छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘भूलन कांदा’, फिल्म बनने के बाद बढ़ी प्रसिद्धि

पंजाबी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जा रहा छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘भूलन कांदा’, फिल्म बनने के बाद बढ़ी प्रसिद्धि

CG News: हिंदी साहित्य के चर्चित उपन्यास ‘भूलन कांदा’ ने एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली है। ( Bhulan kanda ) यह उपन्यास अब पंजाब के प्रतिष्ठित पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के सिलेबस में शामिल कर लिया गया है। खास बात यह है कि पंजाब में हिंदी भाषा में लिखा गया भूलन कांदा विद्यार्थियों को पढ़ाया जा रहा है, जो हिंदी साहित्य के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। भूलन कांदा के लेखक संजीव बख्शी ने विद्यार्थियों से संवाद के लिए हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया।

CG News: उपन्यास हिंदी विभाग के सिलेबस का हिस्सा

हिंदी के लोकप्रिय उपन्यास ‘भूलन कांदा’ की लोकप्रियता उस पर बनी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘भूलन द मेज’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद अकादमिक जगत में भी साफ नजर आने लगी है। लेखक संजीव बख्शी को हाल ही में जानकारी मिली कि पंजाब के पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में यह उपन्यास हिंदी विभाग के सिलेबस का हिस्सा है। इससे पहले इसी कृति पर जस्पाल कौर द्वारा एमफिल का शोध कार्य भी किया जा चुका है। शोध के दौरान संपर्क में आने पर यह तथ्य सामने आया कि भूलन कांदा हिंदी संस्करण के रूप में विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है।

Bhulan kanda

रविवि और छत्तीसगढ़ कॉलेज में भी हो रही पढ़ाई

रविवि में छत्तीसगढ़ी अनुवाद पढ़ाया जा रहा है जबकि छत्तीसगढ़ कॉलेज में बीए में हिंदी और एमए में अंग्रेजी वाला भूलन कांदा पढ़ाया जा रहा है। ‘भूलन कांदा’ का अनुवाद अब अंग्रेजी, उडिय़ा, मराठी, पंजाबी, 36 गढ़ी और कन्नड़ जैसी कई भाषाओं में हो चुका है।

तीन नए उपन्यास प्रकाशित

बख्शी ने बताया, मेरे तीन नए उपन्यास भी हाल ही में प्रकाशित हुए हैं। इनमें ‘ढालचंद हाजिर हो’, ‘गांवखेड़ा मौहा भाठा’ और ‘तारा’ शामिल हैं। ‘तारा’ उपन्यास बस्तर और कांकेर क्षेत्र की पृष्ठभूमि में लिखा गया एक संवेदनशील संदेशात्मक उपन्यास है।

सिलेबस की प्रति मंगवाई

भूलन कांदा, लेखक संजीव बख्शी ने पत्रिका से बातीचीत में कहा कि मैंने विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष से संपर्क कर सिलेबस की प्रति मंगवाई और विद्यार्थियों से संवाद के लिए हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया। अक्सर लेखकों को यह जानकारी ही नहीं मिल पाती कि उनकी रचनाएं किन-किन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं।

भूलन पौधे की कहानी

इसी भूलन कांदा पर ‘भूलन द मेज’ फिल्म बनी है। जिसके जरिये आज के सामाजिक, इंसानी, सरकारी व्यवस्था में आए भटकाव को दिखाया गया है। ‘भूलन दा मेज’ फिल्म ‘भूलन कांदा’ उपन्यास पर आधारित है। इसके लेखक संजीव बख्शी हैं। उनकी मानें तो नौकरी के दौरान वे बस्तर और गरियाबंद जैसे इलाकों में पदस्थ थे। उसी दौरान उन्होंने आदिवासियों से भूलन पौधे की बात सुनी थी। उन्हें ये काफी रोचक लगा। इसके बाद उन्होंने इस पर लिखना शुरू किया, जिस पर काम करते हुए 3 से 4 साल में उन्होंने भूलन कांदा उपन्यास लिखा। इसी उपन्यास को ‘भूलन द मेज’ फिल्म के रूप में बनाया गया। जिसे 67वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा के दौरान बेस्ट छत्तीसगढ़ी फिल्म का अवॉर्ड दिया गया।

भूलन कांदा क्या?

छत्तीसगढ़ की लोककथाओं में भूलन कांदा एक ऐसा रहस्यमय कांटा/कंद/घास माना जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि- अगर यह किसी के पैर में चुभ जाए, तो इंसान सब कुछ भूल जाता है। अपना नाम, रास्ता, घर-परिवार… यहां तक कि अपनी पहचान भी। यह गरीबी, शोषण, डर और व्यवस्था की मार का रूपक है। जब इंसान बहुत ज्यादा दब जाता है, तो वह अपने हक, अपने सपने और अपनी आवाज़ तक भूलने लगता है-इसी को “भूलन कांदा पैर में लगना” कहा गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *