Batwara 1947 Review: दर्द-पीड़ा के जज्बातों से भरी हिंदू-मुस्लिम की नफरतों को मिटाती फिल्म, सनी-प्रीति पर भारी पड़ीं शबाना आजमी

Batwara 1947 Review: दर्द-पीड़ा के जज्बातों से भरी हिंदू-मुस्लिम की नफरतों को मिटाती फिल्म, सनी-प्रीति पर भारी पड़ीं शबाना आजमी

Batwara 1947 Movie Review: मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, बस इसी पुराने पाठ को सिखाने के ही रास्ते पर ये फिल्म भी चलती रहती है। विभाजन का दर्द, पीड़ा को अपने अंदर समेटे हुए ये फिल्म पल-पल ये सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने-अपने धर्मों की आड़ में कब इंसानियत और मानवता के गुनहगार बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता। इस फिल्म में भी सीख तो वही पुरानी है कि सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए, धर्म से ऊपर हमेशा जज्बातों और ईमान को रखना चाहिए, लेकिन दिखाने का तरीका राजकुमार संतोषी ने थोड़ा अलग चुना है। कैसी है सनी देओल, प्रीति जिंटा और शबाना आजमी की फिल्म ‘बंटवारा 1947’, चलिए पढ़ते है इसका रिव्यू।

जज्बातों से भरी फिल्म की कहानी

सबसे पहले फिल्म की कहानी की बात करते हैं या यूं कहें जज्बातों के सैलाब की शुरुआत कहां से होती है उसके बारे में आपको बताते हैं। अब विभाजन के ऊपर कहानी है तो जाहिर है फिल्म में इमोशन्स और दर्द को तो दिखाया ही गया होगा। इस फिल्म में भी वैसा ही कुछ देखने को मिलता है। कहानी शुरू होती है सिकंदर मिर्जा यानी सनी देओल से, जो विभाजन से पहले के हिंदुस्तान की तरफ अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी का किरदार निभा रहीं प्रीति जिंटा और दो बच्चे शमिल हैं। हालांकि हिंदू-मुस्लिम सब साथ-साथ रहते हैं लेकिन जैसे ही मुल्कों के बंटवारे की खबर आती है वैसे ही हर तरफ दंगे और फसाद शुरू हो जाते हैं।

.यहीं से शुरू होती है फिल्म की असली कहानी, जहां सनी देओल उर्फ सिकंदर को अपने पूरे परिवार के साथ हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान में आए लाहौर की तरफ जाना पड़ता है। लाहौर में जैसे तैसे उसे तमाम तरह की जद्दोजहद के बाद रहने के लिए एक हवेली मिलती है, जो कि एक हिंदू परिवार की होती है। हिंदू परिवार तो विभाजन के दंगों में ही वहां से भाग जाता है लेकिन हवेली में एक बूढ़ी मां अपने बेटे के इंतजार में बैठी रहती है। इसके बाद सिकंदर और उसका परिवार उस बूढ़ी मां को हिंदुस्तान जाने के लिए मनाने की कोशिश करता हुआ नजर आता है। इसके बाद क्या कैसे होता है, इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

फिल्म का निर्देशन

राजकुमार संतोषी ने इस फिल्म को दर्द और जज्बातों से तो भर दिया है और हिंदू-मुस्लिम की नफरतों को मिटाने का प्रयास भी किया गया है लेकिन कहीं ना कहीं फिल्म को देखकर कुछ चीजों से रिलेट नहीं कर पाएंगे। फिल्म के डायरेक्शन की खास बात ये है कि कहीं पर भी बैलेंस बनाने की कोशिश नहीं की गई। फिल्म को भावनाओं और बदलते जज्बातों के मुताबिक की दिखाया गया है। हालांकि जो पाठ इस फिल्म में दिखाया गया है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है, वो हम काफी फिल्मों में अब तक देखते आए हैं, इसलिए उसमें कुछ भी नया नहीं था।

फिल्म में किरदारों का अभिनय

कहने को फिल्म के सबसे बड़े पोस्टर बॉय सनी देओल ही हैं लेकिन प्रीति जिंटा, करण देओल, अली फैजल समेत तमाम सितारों पर भारी पड़ती हैं शबाना आजमी। बूढ़ी मां के किरदार में शबाना ने बेहतरीन तरीके से अपने आप को पेश किया है। उनका एक-एक सीन काफी इम्पैक्ट छोड़ जाता है। सनी पाजी भी अपने किरदार से जस्टिस करते हुए नजर आते हैं लेकिन कहीं ना कहीं प्रीति जिंटा का कमबैक थोड़ा सा फीका रहा। इसके अलावा टीम की स्टारकास्ट ने काफी बढ़िया काम किया है।

फिल्म के गाने

फिल्म के गानों की बात करें तो ऐसा कोई भी गाना नहीं है जो फिल्म को देखने के बाद जुबान पर चढ़ जाए। कोई भी गाना यादगार नहीं लगता है हालांकि गानों में इमोशन्स हैं, हर एक गाने को उसकी फील और जज्बातों के अनुसार ही सही समय पर इस्तेमाल किया गया है।

फिल्म देखें या फिर नहीं देखें?

अगर आप इमोशन्स और फैमिली ड्रामा फिल्मों के शौकीन हैं तो आपको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए। हालांकि अगर आप वही चीजें देखना पसंद करते हैं जिनसे आप रिलेट कर सकें तो ये फिल्म आपको थोड़ा निराश कर सकती है।

फिल्म को 5 में से 3 स्टार्स

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