Sawai Madhopur: जिले में चारे की कमी और महंगाई से पशुपालक परेशान, दूध उत्पादन पर मंडराया संकट

Sawai Madhopur: जिले में चारे की कमी और महंगाई से पशुपालक परेशान, दूध उत्पादन पर मंडराया संकट

सवाईमाधोपुर। गर्मी का असर अब पशुपालकों पर भारी पड़ रहा है। सूखे चारे के दाम अचानक आसमान छूने और हरे चारे की कमी से पशुओं की देखभाल मुश्किल हो रही है। इसका सीधा सा असर दुध उत्पादन पर भी पड़ रहा है। इससे पशुपालक चिंतित नजर आ रहे है। एक माह पहले सात सौ रुपए क्विंटल में सूखा चारा मिल रहा था, वहीं अब यही चारा ग्यारह सौ रुपए तक पहुंच गया है। मौसम की मार और बढ़ते परिवहन खर्च ने पशुधन की देखभाल को कठिन बना दिया है। महंगाई की इस तपिश ने ग्रामीण पशुपालकों की चिंता और बढ़ा दी है।

दूध उत्पादन पर पड़ रहा असर

पिछले एक महीने सवाईमाधोपुर में सूखे चारे की कीमतों में चार गुना बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी केवल कीमतों का मामला नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रही है। गांवों में छोटे किसान और पशुपालक अब मवेशियों को पर्याप्त चारा देने में असमर्थ हो रहे हैं। कई लोग बताते है कि खर्च इतना बढ़ गया है कि पशुधन संभालना मुश्किल हो गया है। दूध उत्पादन घटने की आशंका है और पशुपालक मजबूरी में मवेशियों की संख्या कम करने पर विचार कर रहे हैं।

पशुधन देखभाल बनी चुनौती

गर्मी में मवेशियों को चारा और पानी देना जरूरी है, लेकिन महंगाई ने यह काम कठिन बना दिया है। पशुपालक अब वैकल्पिक उपायों की तलाश में हैं। कुछ लोग हरे चारे की खेती पर जोर दे रहे हैं, तो कुछ पशुधन घटाने पर मजबूर हैं। पशुधन की देखभाल अब केवल मेहनत का नहीं, बल्कि आर्थिक संघर्ष का सवाल बन गई है। यदि यही हाल रहा तो दूध उत्पादन पर असर पड़ेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा। पशुपालकों की आय घटेगी और ग्रामीण परिवारों की आजीविका संकट में पड़ सकती है।

गर्मी में पशुओं का विशेष ध्यान रखने की जरूरत

दूध उत्पादन सीधे चारे की उपलब्धता और गुणवत्ता पर निर्भर करता है। जब पशुपालक महंगे दामों पर चारा खरीदने में असमर्थ होते हैं, तो मवेशियों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इससे दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं। इस समय पशुपालकों को वैकल्पिक चारे जैसे हरे चारे की खेती, रिजका, कृषि अवशेषों का उपयोग और संतुलित आहार पर ध्यान देना चाहिए। गर्मी के मौसम में पशुओं की विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

-डॉ. बीएल मीना, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्र, करमोदा।

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