एएमयू छात्रसंघ चुनाव में प्रत्याशियों की अंतिम सूची जारी होने के बाद कैंपस में प्रचार ने जोर पकड़ लिया है। इसी के साथ विश्वविद्यालय की एक ऐसी अनूठी रवायत भी इन दिनों चर्चा में है, जो देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में देखने को नहीं मिलती। यह है प्रत्याशियों की शेरवानी पोशी की परंपरा। कल से ही एएमयू में सभी प्रत्याशियों के खेमों में इस रस्म को निभाने का सिलसिला जारी है। चाय पार्टी जैसे आयोजनों में सीनियर और पूर्व छात्र अपने प्रत्याशी को शेरवानी पहनाकर खेमे के नेता के रूप में स्वीकार करते हैं।
यह परंपरा चुनावी राजनीति का महज एक आयोजन नहीं, बल्कि कैंपस की छात्र राजनीति में नेतृत्व सौंपने और सीनियरों के सम्मान से जुड़ी रस्म है। प्रत्याशी के समर्थक अपने खेमे की ओर से चाय पार्टी जैसा कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इसमें वर्तमान छात्रों के साथ पूर्व छात्र और कैंपस के सीनियर भी आमंत्रित किए जाते हैं। सभी की मौजूदगी में प्रत्याशी को शेरवानी पहनाई जाती है और उसे अपने खेमे का नेता घोषित किया जाता है।
सात बटन और कॉलर का आखिरी हुक, सीनियर के हाथों पूरी होती है रस्म
शेरवानी पोशी में शेरवानी पहनाना ही काफी नहीं होता। इसके अंदर और बाहर के सभी सात बटन लगाए जाते हैं। इसके बाद कॉलर पर लगने वाला आखिरी हुक और शेरवानी के साथ पहनी जाने वाली विशेष टोपी खेमे के सबसे वरिष्ठ छात्र या पूर्व छात्र अपने हाथों से पहनाते हैं। इन छोटी-छोटी रस्मों का भी अपना महत्व है। इन्हें सम्मान और जिम्मेदारी सौंपने का प्रतीक माना जाता है।
इससे पहले कार्यक्रम में मौजूद सीनियरों और समर्थकों के सामने प्रस्ताव रखा जाता है। बताया जाता है कि संबंधित खेमा किन मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रहा है और किस पद के लिए किस प्रत्याशी को अपना नेता चुन रहा है। प्रस्ताव के बाद सभी की सहमति और समर्थन के बीच शेरवानी पोशी होती है। इस दौरान समर्थक नारे लगाकर अपने प्रत्याशी के प्रति समर्थन जाहिर करते हैं।
शेरवानी पहनकर प्रत्याशी देता है जिम्मेदारी निभाने का भरोसा
पूरी रस्म के बाद प्रत्याशी अपने समर्थकों और सीनियरों को संबोधित करता है। वह भरोसा दिलाता है कि जिस विश्वास के साथ उसे जिम्मेदारी सौंपी गई है, उस पर खरा उतरने का प्रयास करेगा। इस तरह शेरवानी पोशी के साथ प्रत्याशी को औपचारिक रूप से खेमे का नेतृत्व सौंपने की प्रक्रिया पूरी होती है। इन कार्यक्रमों में प्रत्याशी के साथ उसके खेमे की ताकत और समर्थन भी नजर आता है।
शेरवानी पोशी के बाद प्रत्याशी का पहनावा भी उसकी पहचान बन जाता है। चुनाव प्रचार से लेकर कैंपस की विभिन्न गतिविधियों और छात्रसंघ से जुड़े कार्यक्रमों तक शेरवानी पहनने का चलन रहता है। यही वजह है कि शेरवानी पोशी के बाद संबंधित छात्रनेता कम ही मौकों पर बिना शेरवानी के दिखाई देते हैं। इस परंपरा के जरिए पूर्व और वर्तमान छात्र अपने सीनियरों का सम्मान भी जाहिर करते हैं।
पूर्व उपाध्यक्ष बोले- छात्रसंघ के पद और ड्रेस कोड के सम्मान की परंपरा
छात्रसंघ के पूर्व उपाध्यक्ष सैयद माजिद जैदी बताते हैं कि शेरवानी पोशी की परंपरा छात्रसंघ की शुरुआत से ही चली आ रही है। इसे हर प्रत्याशी के लिए निभाना जरूरी माना जाता है। इसके पीछे उद्देश्य छात्रसंघ के ड्रेस कोड और उसके पद की गरिमा को बनाए रखना है। यह केवल कपड़े पहनाने की रस्म नहीं, बल्कि छात्रसंघ की परंपरा और जिम्मेदारी का सम्मान है।
उनका कहना है कि शेरवानी पोशी के लिए कोई एक निश्चित समय तय नहीं है। यह जरूरी नहीं कि प्रत्याशी बनने से पहले ही यह रस्म हो या अंतिम सूची जारी होने के बाद ही निभाई जाए। जब कोई छात्र चुनाव लड़ने का मन बना लेता है, तभी से इस प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है।
चुनावी रंग में रंगा एएमयू, कैंपस के बाहर से संभल रहा मैनेजमेंट
प्रचार में उतरे परिवार और पुराने सीनियर, एएमयू में चुनावी माहौल त्योहार जैसा
अलीगढ़। एएमयू छात्रसंघ चुनाव में प्रत्याशियों की अंतिम सूची जारी होते ही कैंपस का माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में रंग गया है। प्रचार में प्रत्याशियों के स्थानीय समर्थकों के साथ उनके घर-परिवार के लोग और पुराने सीनियर भी सक्रिय हो गए हैं। कई प्रत्याशियों के समर्थन में उनके परिजन और पूर्व छात्र एएमयू पहुंच चुके हैं। ये लोग कैंपस के बाहर रहकर चुनाव का मैनेजमेंट संभाल रहे हैं।
कैंपस के अंदर समर्थकों की टोलियां, प्रत्याशियों के पक्ष में नारेबाजी और मुलाकातों का दौर चल रहा है। वहीं बाहर रहकर पुराने सीनियर और परिजन प्रचार की रणनीति बनाने से लेकर समर्थकों के बीच समन्वय बनाने में जुटे हैं। प्रत्याशियों के समर्थकों में खासा उत्साह नजर आ रहा है। चाय पार्टियों, शेरवानी पोशी और चुनावी बैठकों ने इस माहौल को और रंगीन बना दिया है। फिलहाल एएमयू में चुनाव सिर्फ प्रचार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा कैंपस किसी उत्सव और त्योहार की तरह चुनावी रंग में नजर आ रहा है।

