बॉलीवुड अभिनेता गोविंदा शनिवार को भोपाल के इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल के वार्षिक समारोह में शामिल होने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों, अभिभावकों और मीडिया से बातचीत की। समसामयिक मुद्दों पर सवालों के जवाब देते हुए गोविंदा ने जेन-जी के विरोध प्रदर्शनों, सोशल मीडिया के जरिए युवाओं की अभिव्यक्ति, वेब सीरीज के कंटेंट, राजनीति और भारतीय सिनेमा पर अपनी बात रखी। जेन-जी के विरोध प्रदर्शनों को लेकर पूछे गए सवाल पर गोविंदा ने कहा कि युवाओं को यह समझना जरूरी है कि वे जो कर रहे हैं, उसके पीछे किसकी सोच और प्रेरणा है। उन्होंने कहा, ‘जिस उम्र में आप हैं, वहां अपनी मां से पूछिए कि मैं जो कर रहा हूं, क्या वह सही है। जिस बच्चे में पढ़ने-लिखने के बावजूद यह समझने की क्षमता है कि वह जो कर रहा है, वह सही है या नहीं, उसे यह भी समझना जरूरी है कि यह राजनीति है। जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या वे जेन-जी के विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करते हैं, तो उन्होंने किसी एक शब्द में जवाब देने से परहेज किया। गोविंदा बोले- मुझे एक सवाल में मत अटकाइए। मैं यह कह रहा हूं कि ये बच्चे जहां भी हैं और जो कर रहे हैं, उन्हें उसके पीछे की परिस्थितियों को भी समझना चाहिए। इस दौरान सवाल-जवाब में कई बार तीखी नोकझोंक भी हुई। जेन जी शब्द को लेकर भी गोविंदा खुश नहीं थे, गोविंदा ने पत्रकारों से पूछ लिया कि क्या आपको जेन-जी शब्द पसंद है, ये कहां से प्रकट हुआ है? बॉलीवुड शब्द ही पसंद नहीं, देश से वर्ल्ड लेवल का सिनेमा बनना चाहिए भारतीय सिनेमा की पहचान और बॉलीवुड शब्द को लेकर गोविंदा ने कहा कि उन्हें बॉलीवुड शब्द पसंद नहीं है। उन्होंने अमिताभ बच्चन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें भी यह शब्द पसंद नहीं है। गोविंदा के मुताबिक, भारतीय सिनेमा को सिर्फ बॉलीवुड शब्द तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। देश से विश्वस्तरीय सिनेमा बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी चित्रपट और सिनेमा जैसे शब्द हमारी अपनी पहचान को बेहतर तरीके से दर्शाते हैं। सिनेमा की रूपरेखा तैयार करते समय उसे किसी एक शब्द या सीमित दायरे में बांधने के बजाय व्यापक दृष्टिकोण रखना चाहिए। जो नहीं देख सकते, वे वेब सीरीज न देखें वेब सीरीज में बढ़ते बोल्ड और आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर पूछे गए सवाल पर गोविंदा ने कहा कि हर तरह के दर्शकों के लिए अलग-अलग तरह का कंटेंट बनता है। यदि किसी को कोई कंटेंट पसंद नहीं है या वह परिवार के साथ बैठकर नहीं देख सकता, तो उसे नहीं देखना चाहिए। उन्होंने कहा- जो नहीं देख सकते, वो नहीं देखें। राजनीति मुझे रास नहीं आई, इस शब्द से दूरी रही राजनीति में अपनी पारी और सांसद रहने के अनुभव पर गोविंदा ने कहा कि राजनीति उन्हें रास नहीं आई। उन्होंने कहा कि वे राजनीति से बियॉन्ड रहे हैं और उन्हें राजनीति शब्द ही अच्छा नहीं लगता। इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या राजनीति अच्छा शब्द नहीं है, तो उन्होंने जवाब दिया कि संविधान भी इसी व्यवस्था से चलता है। गोविंदा के मुताबिक, किसी विषय में अपनी भूमिका और दखल की भी एक सीमा होती है। जब वे उस मुकाम पर नहीं थे कि उनकी बात को लोग समझ सकें, तो वे उस विषय में अनावश्यक दखल क्यों देते? मां की सलाह पर 7 साल तक की गायत्री साधना बातचीत के दौरान गोविंदा ने अपने शुरुआती संघर्ष और मां के साथ जुड़ा एक लंबा किस्सा भी सुनाया। उन्होंने बताया कि 14 साल की उम्र में वे फिल्मों में काम पाने के लिए अलग-अलग प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाया करते थे। एक बार इसी कोशिश में पुलिस चौकी तक पहुंच गए थे। गोविंदा ने बताया कि उस समय उनकी मां ने उन्हें समझाया और परिवार की परिस्थितियों के बीच उनके संघर्ष को लेकर भावुक बातचीत हुई। गोविंदा के मुताबिक, उनकी मां ने उन्हें 14 से 21 साल की उम्र तक 24 लाख गायत्री मंत्रों का जाप करने की सलाह दी थी। उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्होंने नियमित रूप से गायत्री साधना की। गोविंदा ने कहा कि उसी दौरान उनकी तबीयत में सुधार हुआ और लोग उन्हें हीरो कहकर बुलाने लगे। इसके बाद उनका पूजा-पाठ और आध्यात्मिकता की ओर झुकाव बढ़ा। उन्होंने बताया कि उनके घर पर अलग-अलग धर्मों और समुदायों के साधु-संत, पीर-फकीर भी आते रहे, जिनसे उन्हें जीवन के अलग-अलग पहलुओं को समझने का अवसर मिला। परंपरा से प्रगति तक’ थी कार्यक्रम की थीम स्कूल के वार्षिक समारोह की थीम ‘परंपरा से प्रगति तक’ थी। इस पर गोविंदा ने कहा कि भारत की संस्कृति में विश्व कल्याण की भावना रही है। उन्होंने कहा कि धर्म की विजय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो- यह विचार हमारी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। उनके मुताबिक, बच्चों को अपनी जड़ों और संस्कारों से जोड़ने में मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चे अपनी मां की बातों और सीख से जीवन के मूल्यों को समझ सकते हैं।

