Bombay High Court Verdict: महाराष्ट्र के पुणे में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही 37 साल की महिला की आत्महत्या के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में 30 साल के न्यूरोसर्जन के खिलाफ दर्ज एफआईआर और दाखिल चार्जशीट रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में ऐसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि डॉक्टर ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया था।
न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव की पीठ ने 22 अक्टूबर को दिए फैसले में कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित करने के लिए आरोपी की सक्रिय भूमिका दिखाने वाला कोई ठोस कृत्य होना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया।
दो शादियां टूटने के बाद लिव-इन में रहने लगी थी
महाराष्ट्र टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मृतक महिला मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुकी थी और एक कंपनी में काम करती थी। वहीं, 30 वर्षीय डॉक्टर एक प्रतिष्ठित अस्पताल में कार्यरत था और न्यूरोसर्जरी में विशेष प्रशिक्षण के चौथे वर्ष में था। महिला की साल 2014 और 2017 में दो शादियां हुई थीं, लेकिन दोनों विवाह तलाक पर खत्म हो गए। इसके बाद उसकी मुलाकात डॉक्टर से हुई और दोनों के बीच संबंध बन गए। मौत वाली रात दोनों के बीच इस बात को लेकर विवाद हुआ था कि डॉक्टर का बेंगलुरु में रहने वाला परिवार उसके लिए दूसरी लड़की तलाश रहा है। विवाद के बाद महिला डॉक्टर के फ्लैट से निकलकर अपने घर चली गई थी।
बेडरूम में फंदे से लटका मिला था महिला का शव
24 सितंबर 2024 की सुबह करीब 8:45 बजे महिला अपने बेडरूम में फंदे से लटकी हुई मिली। पुलिस को घटनास्थल से उसका लिखा एक सुसाइड नोट भी मिला था। इसमें महिला ने आरोप लगाया था कि डॉक्टर उसे परेशान करता था। उसने नोट में यह भी लिखा था कि डॉक्टर को माफ नहीं किया जाना चाहिए।
मां की शिकायत पर डॉक्टर के खिलाफ दर्ज हुआ था केस
घटना के 22 दिन बाद, 16 अक्टूबर को महिला की मां की शिकायत के आधार पर पुलिस ने डॉक्टर के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया था। डॉक्टर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हर्षद निंबालकर ने अदालत में दलील दी कि आरोपों से न तो डॉक्टर की कोई सक्रिय भूमिका साबित होती है और न ही जानबूझकर उकसाने या आत्महत्या के लिए मजबूर करने का कोई ठोस आधार मिलता है।
हाईकोर्ट ने कहा- सक्रिय भूमिका का सबूत नहीं
हाईकोर्ट ने सुसाइड नोट का जिक्र करते हुए कहा कि महिला ने उसमें केवल इतना लिखा था कि वह आरोपी की ओर से मिलने वाली परेशानी से तंग आ चुकी थी। अदालत के मुताबिक, रिकॉर्ड पर ऐसी कोई घटना सामने नहीं आई, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि दोनों के रिश्ते किन कारणों से तनावपूर्ण थे या डॉक्टर ने वास्तव में उसे किस तरह परेशान किया था। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट रद्द कर दी।

