UP में सरकारी नौकरी के नियम सख्त होते ही CM Yogi पर बरसा विपक्ष, पूछा- क्या अंग्रेजों का शासनकाल चल रहा है?

UP में सरकारी नौकरी के नियम सख्त होते ही CM Yogi पर बरसा विपक्ष, पूछा- क्या अंग्रेजों का शासनकाल चल रहा है?

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी को लेकर योगी सरकार ने चरित्र सत्यापन के नियमों को सख्त करने का फैसला किया है। योगी सरकार के नए आदेश के मुताबिक, सत्ता परिवर्तन के नाम पर हिंसक गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी से वंचित किया जा सकता है। यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान ‘व्यवस्था परिवर्तन’ और ‘सत्ता परिवर्तन’ जैसे नारों को लेकर सियासी टकराव तेज है। हालांकि, योगी सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी अभ्यर्थी की राजनीतिक विचारधारा मात्र के आधार पर उसे नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

हम आपको बता दें कि योगी सरकार के आदेश में राजनीतिक विचारों और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। किसी अभ्यर्थी के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने को सरकारी नौकरी से वंचित करने का स्वतः आधार नहीं बनाया जाएगा। अधिकारियों को मामले की परिस्थितियों, आरोपों की प्रकृति और संबंधित अभ्यर्थी की वास्तविक भूमिका का आकलन करना होगा। इसका सीधा अर्थ है कि सरकारी नौकरी के लिए चरित्र सत्यापन अब केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अभ्यर्थी के आचरण और संबंधित मामले की परिस्थितियों की जांच से जुड़ा विषय होगा। हालांकि, अंतिम निर्णय निर्धारित नियमों और मामले के तथ्यों के आधार पर ही लिया जाएगा।

इसे भी पढ़ें: Mission 2027 से पहले UP BJP की चुनावी रणनीति तय करेंगे Amit Shah, सीट शेयरिंग पर मंथन

देखा जाये तो उत्तर प्रदेश में यह फैसला ऐसे समय आया है, जब विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के जरिए मतदाता सूचियों के संशोधन को लेकर भाजपा सरकार और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ा हुआ है। कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के अन्य दलों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए निर्वाचन आयोग से जवाबदेही तय करने की मांग की है।

12 अक्टूबर को राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया था। अब विपक्षी गठबंधन एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली करने जा रहा है। इस रैली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर कार्रवाई की मांग उठाए जाने की बात कही गई है।

इस तरह, एक ओर विपक्ष मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर केंद्र और निर्वाचन आयोग पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्ती के लिए चरित्र सत्यापन के नियमों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि संबंधित अधिकारी नए निर्देशों को किस तरह लागू करते हैं और अभ्यर्थियों के मामलों में परिस्थितियों के आधार पर किस प्रकार निर्णय लेते हैं। फिलहाल तो यह मामला राजनीतिक रूप से तूल पकड़ चुका है।

दूसरी ओर, योगी सरकार के इस फैसले पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जताई है। सपा प्रवक्ता उदयवीर ने नए आदेश की तुलना अंग्रेजों के शासनकाल की व्यवस्था से करते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत में विरोध-प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है और सरकारें बदलने का फैसला चुनावों के जरिए होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का रवैया डर पैदा करने वाला है। वहीं, कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भी आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे मामलों में फैसला करने का अधिकार सरकार को है या अदालतों को? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार Gen-Z के विरोध-प्रदर्शनों को लेकर चिंतित है। इस तरह, जहां सरकार का आदेश हिंसक गतिविधियों और राजनीतिक विचारधारा के बीच अंतर स्पष्ट करता है, वहीं विपक्ष इसे विरोध की आवाज पर अंकुश लगाने की आशंका से जोड़कर देख रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *