आज का एक्सप्लेनर:नेतन्याहू सर्वे में पिछड़ रहे, क्या फिर भी प्रधानमंत्री बन जाएंगे; इजराइल में वोटिंग कल, भारत से कितने अलग होते हैं चुनाव

आज का एक्सप्लेनर:नेतन्याहू सर्वे में पिछड़ रहे, क्या फिर भी प्रधानमंत्री बन जाएंगे; इजराइल में वोटिंग कल, भारत से कितने अलग होते हैं चुनाव

इजराइल में कल, यानी 27 अक्टूबर को वोट पड़ेंगे। सर्वे में मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी विपक्षी आइजनकोट से पिछड़ रही है। इसके बावजूद नेतन्याहू के 7वीं बार प्रधानमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होगा। इसकी वजह है इजराइल का अनोखा चुनावी सिस्टम। इसे ही डिकोड करेंगे आज के एक्सप्लेनर में… साल- 1907, ब्रिटेन का एक यहूदी केमिस्ट चाइम वाइजमैन पहली बार फिलिस्तीन पहुंचा और जाफा इलाके में एक कंपनी खोली। धीरे-धीरे दुनियाभर से सताए हुए यहूदी फिलिस्तीन पहुंचने लगे। वो यहां जमीनें खरीदते, खेती और व्यापार करते। आबादी बढ़ती गई। 1948 में इजराइल नया देश बना। तब तक यहां 70 से ज्यादा देशों से यहूदी आकर बस चुके थे। जमीनी सीमाएं तय नहीं थीं। हर समूह की भाषा, संस्कृति और राजनीति अलग थी। सभी को प्रतिनिधित्व देना जरूरी था। ऐसे में पूरा देश एक निर्वाचन क्षेत्र मानकर प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन सिस्टम अपनाया गया, यानी जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। इजराइल के इसी अनोखे इलेक्शन सिस्टम को आसानी से समझने के लिए 7 पॉइंट्स से गुजर जाइए… 1. पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र 2. वोट पार्टी को मिलते हैं, किसी एक उम्मीदवार को नहीं 3. वोट शेयर के हिसाब से सीटों का बंटवारा 4. सीट पाने के लिए कम से कम 3.25% वोट जरूरी 5. नेसेट की सीटों का बंटवारा 6. प्रधानमंत्री कौन बनेगा? 7. अगर कोई गठबंधन न बने तो? 1949 से लेकर आज तक इजराइल में किसी भी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला है। इसकी 3 वजहें हैं… 1. वोट शेयर के हिसाब से सीटों का बंटवारा: नेसेट में सीटें पार्टी को मिले वोट शेयर के अनुपात में बंटती हैं। ऐसे में बहुमत की 61 सीटें पाने के लिए किसी भी पार्टी को कम से कम 51% की जरूरत है, जो बहुत मुश्किल है। जबकि भारत में अमूमन 35-40% वोट पर लोकसभा में आधी सीटें मिल सकती हैं। 1969 में गोल्डा मायर के अलाइनमेंट (लेबर अलायंस) बहुमत के सबसे नजदीक पहुंचा। उसे 46.2% वोट और 56 सीटें मिली थीं। 2. कई खेमों में बंटा समाज: इजराइली थिंकटैंक ‘इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट’ के सीनियर फेलो प्रो. गिदोन राहत के मुताबिक, इजराइल का समाज कई हिस्सों में बंटा हुआ है। जैसे- सेकुलर यहूदी बनाम अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स, अशकेनाजी बनाम मिजराही, यहूदी बनाम अरब। हर समूह की अपनी अलग पार्टी है, इसलिए वोट बिखर जाते हैं। जैसे- सेकुलर यहूदी येश अतीत, अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स शास, राष्ट्रीय-दक्षिणंपथी लिकुड और अरब-इजराइली रा’आम को अमूमन वोट देते हैं। 3. कम इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड: शुरुआत में 1% वोट पाने वाली पार्टियों को भी नेसेट में जगह मिल जाती थी। फिर इसे बढ़ाकर 1.5%, 2% और अब 3.25% किया गया, ताकि छोटी पार्टियां कम हों। इसके बावजूद औसतन 11-12 पार्टियां इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड पार कर लेती हैं। औसतन 3 पार्टियां ही 10 से ज्यादा सीटें हासिल कर पाती हैं। वहीं औसतन 5-6 छोटी पार्टियों को 4-6 सीटें मिल जाती हैं। क्या चुनाव के बाद नेतन्याहू फिर से सरकार बना पाएंगे? ऐसा 38 साल बाद हो रहा है कि नेसेट के पूरे 4 साल के कार्यकाल के बाद चुनाव हो रहा है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस बार के चुनाव में ये छोटे गुट ‘किंगमेकर’ बन सकते हैं, खासतौर पर अरब पार्टियां। दरअसल, इजराइल के 3 बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म्स- चैनल 12, चैनल 13 और कान 11 के फाइनल पोल में किसी भी अलायंस को बहुमत नहीं मिला। ज्यादातर पोल में पूर्व आर्मी चीफ गादी आइजनकोट की पार्टी ‘याशर’ को बढ़त है। याशर को 22 से 23 सीटें मिल सकती हैं, जबकि 19 साल पीएम रहे नेतन्याहू की लिकुड को 19 से 21 सीटें। माना जा रहा है कि अगर अरब पार्टियों ने 10 सीटें भी हासिल कर लीं, तो वही तय करेंगी कि सत्ता कौन संभालेगा? इजराइली मीडिया में इस चुनाव को अक्टूबर 2023 में शुरू हुई जंग के बाद का पहला चुनाव और नेतन्याहू की लीडरशिप पर जनमत जैसा बता रही हैं। नेतन्याहू पर जंग की आड़ में अपनी सरकार बचाने के आरोप लगे हैं। उन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा भी चल रहा है। ‘फ्लाई एंड वोट’ नाम की एक मुहिम भी चल रही है, जिसके तहत विदेशों में रह रहे इजराइली वोटर्स देश आकर वोट डाल रहे हैं। यहूदी मीडिया वेबसाइट ‘फॉरवर्ड’ के मुताबिक, करीब 5 लाख इजराइली वोटर्स विदेशों में रहते हैं, जिनमें से करीब 53 हजार वोटर वोट डालने के लिए इजराइल जा रहे हैं और ये 67 हजार तक हो सकते हैं। अमेरिका के लॉस एंजिल्स में रहने वाले एडम पाइंस वोट डालने के लिए इजराइल के तेल अवीव पहुंच गए हैं। वे मानते हैं कि इजराइल ने अपनी नैतिक दिशा खो दी है। नेतन्याहू इजराइल की हिफाजत करने में नाकाम रहे हैं। उनकी कार्रवाइयों से दुनियाभर के यहूदियों और इजराइलियों पर असर पड़ा है। विदेशों से लौट रहे ज्यादातर वोटर नेतन्याहू के खिलाफ हैं। इसी के चलते लिकुड पार्टी ने केंद्रीय चुनाव समिति से ‘फ्लाई एंड वोट’ मुहिम रोकने की मांग की है। ———— ये खबर भी पढ़िए… क्या पाकिस्तानी पायलट भी प्लेन भारत ला सकते हैं; इजराइल की फ्लाइट में कैसे पहुंचा ओमानी अल-हमामी, असली इरादा क्या था कैप्टन स्मित मच्छर पर चाकू से नहीं, क्रैश एक्स से हमला हुआ था। कॉकपिट में रखी इस कुल्हाड़ी का इस्तेमाल इमरजेंसी में विंडो वगैरह तोड़ने में होता है। इसे चलाने वाले हमलावर को-पायलट हमाम अल-हमामी की कहानी भी खुल गई है। पूरी खबर पढ़िए…

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