हमारे फलिया में स्कूल ही नहीं है। हमने तो ब्लैकबोर्ड और टीचर देखे ही नहीं। सुबह होते ही गाय-भैंस चराने निकल जाते हैं। यह दर्द है झाबुआ जिले के मोरझरिया गांव के उकाला फलिया के भैरू का। यहां करीब 70 घर हैं, लेकिन 50 से ज्यादा बच्चों के लिए स्कूल नहीं है। पढ़ने-लिखने की उम्र में बच्चे मवेशी चराने और खेतों में काम करने को मजबूर हैं। सबसे नजदीकी स्कूल 5 किलोमीटर दूर है। वहां पहुंचने के लिए कच्चे रास्ते से गुजरना पड़ता है, जिसके बीच में एक तालाब भी है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने से डरते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत की थी। लेकिन स्कूल खुलवाने के बजाय अधिकारी उन पर शिकायत वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। इस मामले की पड़ताल के लिए दैनिक भास्कर की टीम उकाला फलिया पहुंची। यहां डाइस कोड नहीं होने के कारण 50 से ज्यादा बच्चे पिछले 8 साल से स्कूल में दाखिला नहीं ले पाए हैं। आखिर इन बच्चों की पढ़ाई क्यों अटकी है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… तालाब और पहाड़ी के पार बस्ती, 5 किमी दूर है स्कूल मोरझरिया गांव के उकाला फलिया से एकीकृत माध्यमिक विद्यालय मोरझरिया करीब 5 किलोमीटर दूर है। दोनों स्थानों के बीच लगभग 2 किलोमीटर क्षेत्र में फैला तालाब पड़ता है। इस कारण छोटे बच्चों के लिए रोज स्कूल पहुंचना मुश्किल है। बारिश में रास्ता और कठिन हो जाता है। ग्रामीणों को डर है कि तालाब पार करके स्कूल आने-जाने में बच्चों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। बस्ती में करीब 70 घर हैं और ग्रामीणों के अनुसार, यहां के 50-60 बच्चे पढ़ाई से वंचित हैं। कई बच्चे सुबह मवेशी चराने जाते हैं। कुछ छोटे भाई-बहनों की देखभाल करते हैं, तो कुछ खेतों में काम करते हैं। दूर स्कूल होने के कारण कई बच्चे नियमित पढ़ाई नहीं कर पाते। फलिया में गुलाब इकलौते पढ़े-लिखे, गांव को उन्हीं का सहारा 700 की आबादी वाले इस फलिया में गुलाब सिंह सिंगाड़ इकलौते पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं। वे मोरझरिया में अतिथि शिक्षक के रूप में पदस्थ हैं। वर्ष 2017-18 में उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था के तहत फलिया में नियुक्त किया गया था, लेकिन बाद में दूसरे स्कूल में भेज दिया गया। अब वे ग्रामीणों तक विकास योजनाओं की जानकारी पहुंचाने में भी मदद करते हैं। सचिव से मिलने वाली जानकारी ग्रामीणों तक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और गुलाबसिंह पहुंचाते हैं। फलिया में कोई शासकीय भवन नहीं है। आंगनबाड़ी भी किराये के मकान में चल रही है। ऐसे में शिक्षा और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने के लिए ग्रामीण कुछ ही लोगों पर निर्भर हैं। 2017 में शुरू हुआ स्कूल, दो साल बाद बंद हो गया उकाला फलिया में स्कूल शुरू कराने के लिए तत्कालीन एसडीएम, पेटलावद ने 22 नवंबर 2017 को आदेश जारी किया था। इसके दो दिन बाद, 24 नवंबर 2017 को यहां प्राथमिक शाला शुरू हुई। उस समय शासकीय प्राथमिक विद्यालय मोरझरिया में पदस्थ शिक्षक दलसिंह गुनिया को अगले आदेश तक यहां स्कूल चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसकी लिखित सूचना बीआरसी कार्यालय, पेटलावद को भी भेजी गई थी। ग्रामीणों के मुताबिक, करीब दो साल बाद यह व्यवस्था बंद हो गई। संस्था का डाइस कोड जारी नहीं हुआ। अतिथि शिक्षक के वेतन और भवन के किराये से जुड़ी समस्याएं भी आईं। इसके बाद बच्चों की पढ़ाई के लिए स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकी। स्कूल बंद होने से उस समय पढ़ने की उम्र के बच्चों के साथ-साथ बाद में स्कूल जाने की उम्र तक पहुंचे बच्चे भी प्रभावित हुए। कुछ बच्चे दूर स्थित स्कूल या छात्रावास तक पहुंच पाते हैं, लेकिन सभी परिवारों के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। 2018 में 54 बच्चों का सर्वे, डाइस कोड के लिए भेजा था प्रस्ताव सत्र 2018-19 में जनपद शिक्षा केंद्र, पेटलावद ने जिला परियोजना समन्वयक, जिला शिक्षा केंद्र, झाबुआ को पत्र भेजा था। इसमें उकाला फलिया की प्राथमिक शाला के लिए नया डाइस कोड जारी करने और अतिथि शिक्षक की व्यवस्था करने का प्रस्ताव दिया गया था। पत्र के मुताबिक, वीईआर सर्वे में यहां 54 बच्चे दर्ज थे। इनमें 24 नए और 30 नवीनीकरण वाले बच्चे शामिल थे। पत्र में बच्चों को तालाब पार करके मोरझरिया स्कूल जाने की परेशानी का भी जिक्र किया गया था। इसके बावजूद स्कूल की स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकी। सरकारी रिकॉर्ड में बच्चों की संख्या दर्ज होने और प्रस्ताव भेजे जाने के बाद भी उनकी नियमित पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई। ग्रामीणों की मांग- स्कूल स्थायी रूप से चले जनपद सदस्य वीरू सिंह भाभर ने बताया कि वे जनपद की बैठकों में लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं। सीएम हेल्पलाइन-181 पर शिकायत के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। मोहनकोट के प्राचार्य रामलाल कटारा, जनशिक्षक शंकरलाल मेहसन और मोरझरिया के माध्यमिक शिक्षक सुरेश पाटीदार ने ग्रामीणों से बातचीत की। ग्रामीणों का आरोप है कि उनसे शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया गया। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीण चाहते हैं कि स्कूल को स्थायी मंजूरी मिले और डाइस कोड जारी हो, ताकि स्कूल दोबारा बंद न हो। उनका कहना है कि किराये के भवन में स्कूल शुरू होने से बच्चों को दूर जाने की मजबूरी से राहत मिल सकती है। इसके लिए नियमित शिक्षक और लगातार स्कूल संचालन भी जरूरी है। ग्रामीण इमरू बोले- 50-60 बच्चे पढ़ाई से वंचित ग्रामीण इमरु खराड़ी का कहना है कि फलिया के करीब 50-60 बच्चे पढ़ाई से वंचित हैं। दो साल पढ़ाई चलने के बाद स्कूल बंद हो गया। अब बच्चे मवेशी चराने जाते हैं। हमने शिकायत की है, ताकि प्रशासन ध्यान दे और बच्चों को पढ़ने का मौका मिले। डानिए डाइस कोड क्या है और ये जरूरी क्यों है? डाइस कोड (DISE Code) स्कूल की पहचान के लिए दिया जाने वाला एक यूनिक नंबर होता है। इसे स्कूल का ‘आधार नंबर’ भी कह सकते हैं। DISE का पूरा नाम District Information System for Education है। अब स्कूलों का डेटा UDISE+ (Unified District Information System for Education Plus) के तहत दर्ज किया जाता है। उकाला फलिया के मामले में इसका क्या मतलब है? रिपोर्ट के अनुसार, वहां स्कूल शुरू किया गया था, लेकिन उसका डाइस कोड जारी नहीं हुआ। इसका मतलब है कि स्कूल की पहचान और जानकारी शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। यह स्कूल के संचालन और प्रशासनिक व्यवस्था में बाधा बना हो सकता है।

