पूर्व सैन्य अधिकारी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार प्रशासनिक विफलता बताया:दासगुप्ता बोले- सैन्य हस्तक्षेप जरूरी था, बोफोर्स तोप सही, सौदे की प्रक्रिया में गड़बड़ी थी

पूर्व सैन्य अधिकारी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार प्रशासनिक विफलता बताया:दासगुप्ता बोले- सैन्य हस्तक्षेप जरूरी था, बोफोर्स तोप सही, सौदे की प्रक्रिया में गड़बड़ी थी

खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे व अंतिम दिन रविवार को पूर्व सैन्य अधिकारी प्रबल दासगुप्ता ने ऑपरेशन ब्लू स्टार का जिक्र करते हुए इसे बड़ी प्रशासनिक विफलता बताया। उन्होंने कहा कि उस समय सेना, राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल नहीं था। फैसले लेने की प्रक्रिया में कमी के गंभीर परिणाम सामने आए। ‘जनरल सुंदरजी: सेलिब्रेटेड ऑर डिबेटेड?’ सत्र में वरिष्ठ पत्रकार सुनेत्रा चौधरी से बातचीत के दौरान दासगुप्ता ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल के सुंदरजी के कामकाज पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि सुंदरजी रणनीतिक सोच में अपने समय से आगे थे, लेकिन वे महत्वाकांक्षी थे और कई बार जल्दबाजी में फैसले लेते थे। उनके कुछ फैसले विवादों में भी रहे। दासगुप्ता के अनुसार, ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान तत्कालीन डिवीजन कमांडर मेजर जनरल ब्रार ने स्वर्ण मंदिर परिसर की घेराबंदी करने का सुझाव दिया था, लेकिन जनरल सुंदरजी ने दूसरी रणनीति अपनाई। उन्होंने यह भी कहा कि सुंदरजी ने सैन्य प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सीधे बातचीत की। इस पूरे घटनाक्रम में अलग-अलग संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी एक अहम मुद्दा रही। बोफोर्स तोप अच्छी थी, लेकिन सौदे पर सवाल दासगुप्ता ने बोफोर्स तोप सौदे का जिक्र करते हुए कहा कि तोप की गुणवत्ता और उसे खरीदने के सौदे को अलग-अलग देखना चाहिए। उनके अनुसार, जनरल सुंदरजी ने तोप खरीदने का समर्थन किया था। इस संदर्भ में उनका आकलन था कि तोप अच्छी थी, लेकिन सौदे की प्रक्रिया में गड़बड़ी थी। चर्चा में कथित कमीशन और जवाबदेही के मुद्दे भी उठे। ऑपरेशन ब्रासटैक्स पर उन्होंने बताया कि बड़े स्तर पर सैन्य तैनाती का उद्देश्य पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को परखना था, लेकिन इससे दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया। उन्होंने उस दौर में पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई का अवसर गंवाने की बात भी कही। पिता की हत्या के बाद संभाली लैब, बनाया बड़ा कारोबार महोत्सव में पद्मश्री सम्मानित डॉ. अरविंद लाल ने अपनी जिंदगी के उस दौर के बारे में बताया, जब एक पारिवारिक त्रासदी ने उनका भविष्य बदल दिया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1977 में पिता की हत्या के बाद उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़कर परिवार का कारोबार संभालने के लिए दिल्ली लौटना पड़ा। उस समय वह पुणे के आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी की पढ़ाई कर रहे थे और नौसेना में फाइटर पायलट बनना चाहते थे। उनके पिता ने वर्ष 1949 में एक डायग्नोस्टिक लैब शुरू की थी। पिता की मौत के बाद डॉ. लाल ने इसकी जिम्मेदारी संभाली और आधुनिक तकनीक व नई जांच सुविधाएं जोड़कर कारोबार का विस्तार किया। यही कारोबार आगे चलकर डॉ. लाल पैथलैब्स के रूप में विकसित हुआ। सेरेना जैकब के साथ बातचीत में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कॉरपोरेट योगी’ के संदर्भ में बताया कि कारोबारी जिम्मेदारियों के साथ आध्यात्मिक खोज और जीवन में संतुलन बनाना भी जरूरी है।

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