नीतीश को सिक्कों से तौलने वाले अनंत JDU से OUT:जेल में रहकर चुनाव जीता, जानिए मोकामा के ‘छोटे सरकार’ की पूरी कहानी

नीतीश को सिक्कों से तौलने वाले अनंत JDU से OUT:जेल में रहकर चुनाव जीता, जानिए मोकामा के ‘छोटे सरकार’ की पूरी कहानी

मोकामा से जदयू विधायक अनंत सिंह पर पार्टी लाइन से अलग हटकर काम करने पर एक्शन हुआ है। अनंत सिंह को JDU से 6 साल से निष्काषित कर दिया गया है। अनंत सिंह पटना स्नातक सीट पर जदयू के कैंडिडेट नीरज कुमार का लगातार विरोध कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा था कि वो नीरज कुमार की जमानत जब्त करवा देंगे। अनंत सिंह पीके के कैंडिडेट अनुज सिंह के पक्ष में कई रोड शो भी किया था। 23 अक्टूबर को एमएलसी चुनाव के वोटिंग के दिन भी अनंत सिंह ने अपने बयान पर कायम थे। आज यानी शनिवार को अनंत सिंह अपने आवास पर लगभग 1 लाख लोगों के लिए रसगुल्ले बनवा रहे थे। उनका कहना है कि उनका कैंडिडेट ही जीतेगा। इस बीच दिल्ली से ललन सिंह पटना पहुंचे। नीतीश कुमार से मुलाकात की उसके बाद अनंत सिंह को पार्टी से बाहर करने का लेटर जारी कर दिया गया है। ये वही अनंत सिंह हैं जिन्होंने साल 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान मो नीतीश कुमार को एक जनसभा में चांदी के सिक्कों से तौला था। आखिर कौन हैं अनंत सिंह…. जिसने 9 साल की उम्र में साधु बनने के लिए घर छोड़ा, मगर भाई की हत्‍या ने उसे बना दिया इलाके का सबसे बड़ा बाहुबली। जानेंगे इस स्‍टोरी में… साल 1990 का वक्‍त। पटना में तैनात डिस्ट्रिक्ट जज किसी काम से पटना जिले के बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव जा रहे थे। बाढ़ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरे, जहां पहले से ही सरकारी गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। जज साहब गाड़ी में बैठ गए और नदवां की ओर चल पड़े। गाड़ी नदवां पहुंचने ही वाली थी कि ड्राइवर ने कहा, ‘जज साहब, गाड़ी का शीशा नीचे कर लीजिए…आगे चेकिंग होगा।’ जज साहब सोच में पड़ गए और बोले, ‘डिस्ट्रिक्ट जज की तलाशी कौन ले सकता है।’ ड्राइवर ने कहा, ‘नदवां अनंत सिंह का गांव है सरजी। मुहाने पर हथियारों से लैस उसके लोग 24 घंटा बैठे रहते हैं। अनंत सिंह की सिक्‍योरिटी खातिर हर आने-जाने वाले की चेकिंग करते हैं।’ जज साहब को यकीन ही नहीं हुआ। गाड़ी जब नदवां पहुंची तो उन्‍होंने देखा, लकड़ी के बड़े से लट्ठे से फाटक बनाया गया था। 12-13 आदमी बंदूकें लिए वहां खड़े हुए थे और सभी गाड़ियों की तलाशी ले रहे थे। जज साहब ने चुपचाप अपनी गाड़ी की तलाशी दी और नदवां में दाखिल हुए। साधु बनने के लिए 9 साल की उम्र में घर छोड़ा 5 जनवरी 1967, बिहार का पटना जिला। बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव में चंद्रदीप सिंह के घर अनंत सिंह का जन्म हुआ। चार भाइयों में वो सबसे छोटा था। उनका मन पढ़ाई-लिखाई में कतई नहीं लगता था। इसलिए चौथी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी। मन पूजा-पाठ, धर्म और आध्यात्मिकता में ज्यादा लगता था, सो 9 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। वो हरिद्वार जाकर साधुओं के बीच रहने लगे। साधुओं की सेवा करना और दिनभर पूजा-पाठ में लीन रहना, उनका बस यही काम था। एक दिन कुछ साधु आपस में झगड़ा करने लगे। नौबत मारपीट तक पहुंच गई। अनंत ये देखकर दंग रह गए और वैराग्य की जिंदगी से उनका मोह भंग हो गया। इसके बाद वो अपने गांव लौट गए। भाई की हत्‍या हुई तो कहा- खुद इंसाफ करूंगा गर्मी की एक दोपहर वो अपने घर में बैठकर खाना खा रहे थे। तभी एक नौकर हांफता हुआ उनके पास पहुंचा और बोला, ‘सरकार, बिराची सिंह जी मार दिए गए हैं….।’ अनंत के बड़े भाई बिराची सिंह को किसी ने गांव के चौक पर ही गोली मार दी थी। अनंत फौरन ही भाई को देखने दौड़ गए। वहां पहुंचते ही बोले, ‘ये जिसका भी काम है, उसे मैं छोड़ूंगा नहीं…’ अनंत सिंह का परिवार इलाके के बड़े जमींदारों में आता था। उस वक्त बिहार में माओवादी संगठनों का आतंक था। आए दिन उनका संघर्ष जमींदारों के साथ होता। घटना के बाद अनंत सिंह ने पूरे गांव में पूछताछ की। हर घर में जाकर पूछा। पता चला माओवादी संगठन के सरगना ने बिराची सिंह की हत्या की है। किसी ने बताया, ‘वो ढूंढकर बड़े जमींदारों की हत्या करता है। कहता है कि सदियों पुराना हिसाब कर रहा है…।’ राजेश सिंह अपनी किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्‍स में लिखते हैं, कि अनंत आग-बबूला हो गए। उनके सिर पर धुन सवार हो गई कि भाई के हत्यारे को ठिकाने लगाना है, लेकिन परिवार ने समझाया, ‘पुलिस हमारा न्याय करेगी, तुम चिंता मत करो…।’ महीनों बीत गए, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। फिर अनंत ने फैसला किया कि अब वो खुद ही इंसाफ करेंगे। एक दिन उनके मुखबिर ने आकर बताया, ‘सरकार, आपके गांव के पास से जो गंगा बहती है, उसी के पार डेरा डाला है वो… बहन को ससुराल छोड़ कर लौटा है। सुने हैं, संगी-साथी भी कम ही हैं।’ अनंत फौरन नदी किनारे पहुंचे। एक साथी ने कहा, ‘सरकार अभी कोई हथियार वगैरह तो है नहीं। नदी पार करना भी मुश्‍किल लग रहा है। किसी और दिन हिसाब कीजिएगा…।’ वो बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अनंत ने नदी में छलांग लगा दी। वो तैरकर ही नदी पार करने लगे। साथी घबराकर वहीं रुक गए। पानी में घंटों हाथ-पैर मारने के बाद अनंत आखिरकार नदी के दूसरी ओर पहुंचे। घने जंगल के बीच वो अपने भाई के हत्यारे को ढूंढने लगे। वो नदी पार कर थक चुके थे, लेकिन बदले की धुन सवार थी। आखिरकार उनका सामना अपने भाई के हत्यारे से हुआ। कोई हथियार नहीं था तो पत्‍थर हाथ में उठा लिया। उन्‍होंने पत्‍थर सिर पर मारकर पहले अपने दुश्‍मन को बेहोश कर दिया और फिर एक बड़े पत्‍थर से उसका सिर कुचल डाला। वो खून से सने हाथ लिए नदी पार कर वापस नदवां लौट गए। इस घटना के बारे में एक इंटरव्‍यू में अनंत सिंह ने कहा था, ‘इंसाफ होना जरूरी था।’ बिहार के पत्रकार ज्ञानेश्‍वर बताते हैं कि इस घटना के बाद गांव और आस-पास के दूसरे जमींदार भी उसके पास सुरक्षा के लिए आने लगे, लेकिन पुलिस-प्रशासन ने कभी उसकी ओर आंख तक नहीं उठाई। वजह थे उनके बड़े भाई दिलीप सिंह। दिलीप सिंह 1990 से 1995 के बीच जनता दल से मोकामा के विधायक थे। आगे जाकर वो लालू यादव-राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी बने। जब भी अनंत सिंह के खिलाफ मुकदमे कोर्ट पहुंचते, तो वहां से भी उन्‍हें आसानी से जमानत मिल जाती। पड़ोसी ने किया जानलेवा हमला, बहनोई मारे गए नदवां गांव में विवेका पहलवान और अनंत सिंह पड़ोसी थे, जिनके घर की दीवार एक ही थी। दोनों परिवार की रंजिश बहुत पुरानी थी। चूंकि गांव में अनंत सिंह का दबदबा ज्यादा रहा, इसलिए विवेका पहलवान ने गांव छोड़ दिया था। बाहर जाकर वो अनंत सिंह के दुश्मनों से मिला और उन्हें इकट्ठा करने लगा। एक बार सभी रात में गांव में घुस आए और अनंत सिंह पर हमला कर दिया। अनंत सतर्क थे, सो उन्‍होंने भी जवाबी हमला किया। दोनों ओर से हजारों राउंड गोलियां चलीं। अनंत के बहनोई भूषण सिंह इस हमले में मारे गए। इसके बाद ये दुश्मनी और खूनी हो गई। 1990 में मोकामा का चुनाव अनंत के बड़े भाई दिलीप सिंह जीत गए। दोनों भाई चाहते थे कि बाढ़ पर भी उन्हीं का कब्जा हो, सो वहां से उन्होंने अपने तीसरे भाई सच्चिदानंद सिंह उर्फ फाजो सिंह को निर्दलीय चुनाव लड़ाया, लेकिन बाढ़ से जीत लालू यादव की पार्टी के विजयकिशन की हुई। किडनैप व्‍यापारी को छुड़ाने के लिए पूरे गांव पर धावा बोला इसी दौरान बाढ़ से एक बनिया जाति के एक व्यापारी का अपहरण कर लिया गया। पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पा रही थी। ऐसे में लोग शिकायत लेकर नदवां गांव अनंत सिंह के पास पहुंचे। अनंत सिंह ने छानबीन कराई तो पता चला कि भावनचक के बच्चू सिंह ने अपहरण किया है। अनंत अपने दलबल के साथ सीधे बच्चू सिंह के गांव में घुस गए। घंटों गोलीबारी हुई और व्यापारी को छुड़ा लिया गया। बच्‍चू सिंह इस बात से भड़क गया और इलाके में मारकाट शुरू हो गई। इस लड़ाई में सभी राजपूत बच्चू सिंह की तरफ और सभी भूमिहार अनंत सिंह की तरफ हो गए थे। दोनों ओर से लाशें गिरने लगीं। आखिरकार साल 2000 में एक गैंगवार में बच्‍चू सिंह मारा गया। पुलिस रिपोर्ट में हत्‍या के मुख्‍य आरोपी अनंत सिंह ही थे। पूरे गांव को बनाया अपना किला पत्रकार ज्ञानेश्‍वर बताते हैं, अनंत सिंह का सुरक्षा का इंतजाम बेहद मजबूत था। उन्‍होंने पूरे गांव को अपना अभेद्य किला बना रखा था। किला ऐसा जहां पुलिस-प्रशासन के लोग तक बिना इजाजत घुस नहीं सकते थे। उनके पास 100 से ज्यादा घोड़े और टम-टम थे, जिन्हें उन्‍होंने गांव के जरूरतमंदों को बांट रखा था। ये लोग दिन में टम-टम चलाकर कमाई करते और रात में अनंत सिंह के घर के आसपास सभी टम-टम पार्क कर देते। पास ही घोड़ों को भी बांध देते। अनंत समय-समय पर गांव के लोगों की मदद भी करते रहते थे। इससे उन्‍होंने लोगों का भरोसा जीत लिया। सालों तक उन्‍होंने गांव के लिए जाने वाली सड़क को पक्की नहीं होने दिया, ताकि कोई गांव तक गाड़ी दौड़ाता हुआ ना आ सके। एक बार बाढ़ के ASP अनंत सिंह को अरेस्ट करने नदवां गांव पहुंच गए। वो बिना फोर्स के ही गांव में दाखिल हो गए। हमेशा की तरह अनंत तक इसकी खबर पहुंच गई। हवेली तक पहुंचते ही ASP को बंधक बना लिया गया। कई दूसरे अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ASP को छोड़ा गया। हिंदी फिल्मों के बैड-मैन वाली छवि बनाई सफेद रंग के कपड़े, आंखों पर काला चश्मा, माथे पर लंबा तिलक, रौबदार मूछें, जिसे वो समय-समय पर घुमाते रहते और मुंह में दबी सिगरेट- ये अनंत सिंह के सिग्नेचर स्टाइल बन गए। उन्‍होंने अपने घर में एक अजगर और एक हाथ मिलाने वाला हाथी भी पाला हुआ था। वो अक्सर अपने घर पर डांस पार्टियों का आयोजन करने लगे। ऐसी ही एक पार्टी का वीडियो खूब चर्चा में रहा जिसमें अनंत सिंह किसी डांसर के साथ हाथ में AK-47 लेकर झूमते नजर आ रहे थे। हालांकि, इस वीडियो के बारे में मीडिया में जब सवाल पूछा गया तो उन्‍होंने कहा, ‘वीडियो नकली है, मेरे विरोधियों की साजिश है।’ उनकी छवि इलाके में रॉबिनहुड जैसी थी। वो कभी साड़ियां बांटते, तो कभी जरूरतमंदों के लिए भोज का आयोजन करते। रमजान के महीने में इफ्तार करवाते और सावन में भंडारे। भूमिहार जाति का पूरा सपोर्ट उनके पास था। सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्वर के मुताबिक वो जब भी किसी पर हमला करने जाते तो सोने का मुकुट पहनकर जाते। लोग उन्हें छोटे सरकार कहकर बुलाने लगे थे। नीतीश का साथ मिला और चुनाव जीतते गए लालू यादव से अलग होने के बाद नीतीश कुमार पर राजनीतिक संकट मंडराता नजर आ रहा था। राजेश सिंह की किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्‍स के अनुसार, 1996 के लोकसभा चुनाव में बाढ़ लोकसभा से गाड़ी पार करना नीतीश कुमार को चुनौती जैसा लग रहा था। ऐसे में उनकी नजर अनंत सिंह पर पड़ी। अनंत सिंह ने नीतीश से हाथ मिला लिया। अनंत सिंह की ही बदौलत नीतीश कुमार 1996, 1998 और 1999 में लोकसभा चुनाव जीते और अटल सरकार में मंत्री भी रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान बाढ़ में एक जनसभा की गई। इस दौरान अनंत सिंह ने नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौल दिया। इसका एक वीडियो भी उन दिनों कई मीडिया चैनलों ने चलाया। ये अनंत सिंह की राजनीति में औपचारिक एंट्री थी। इसके बाद 2005 में उन्‍होंने जदयू के टिकट पर मोकामा से विधानसभा चुनाव जीता। इसी साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और उन्होंने जनता से वादा किया कि वो बिहार को जंगल राज से मुक्ति दिलाएंगे और लॉ एंड ऑर्डर को ठीक करेंगे। इस दौरान कई बाहुबलियों और अपराधियों को पुलिस ने निशाना बनाया। दर्जनभर से ज्यादा मामले अनंत सिंह के खिलाफ दर्ज हुए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। घायल अनंत सिंह को गिरफ्तार करने अस्‍पताल पहुंची पुलिस 2 जुलाई 2004, बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्‍वर के अनुसार, सवेरे उठकर अनंत सिंह अपने घर की बैठक में शेविंग करवा रहे थे। तभी विवेका पहलवान के घर की खिड़की खुली। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। अचानक खिड़की से Ak-47 से फायरिंग शुरू हो गई। एक गोली अनंत सिंह की छाती में लगी। जवाब में अनंत सिंह के लोग दौड़कर विवेका पहलवान के घर पहुंचे और दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे, लेकिन अंदर उन्हें कोई नहीं मिला। हमला करने वाले सभी लोग घर के पीछे के दरवाजे से अब तक भाग चुके थे। दूसरी ओर अनंत सिंह का काफी खून बह चुका था। उन्हें तुरंत गाड़ी में बैठाकर पटना ले जाया गया। आलोक नर्सिंग होम की इमरजेंसी में डॉ. नरेंद्र प्रसाद ने इलाज शुरू किया। डॉ. प्रसाद ने कहा, ‘खून काफी बह चुका है और अनंत सिंह जी की इंजरी भी बहुत क्रिटिकल है। इन्हें बचाना मुश्किल है…।’ अनंत के भाई दिलीप सिंह ने डॉक्टर की कनपट्टी पर पिस्तौल रख दी, बोले ‘ऐसे कैसे बचाना मुश्किल है… अगर हमरे भाई को कुछ हुआ तो तू भी अपने परिवार का मुंह नहीं देख सकेगा डॉक्टर…।’ इसके बाद पूरा नर्सिंग होम अनंत सिंह की सेवा में लग गया। कई घंटे की सर्जरी के बाद आखिरकार अनंत सिंह की जान बच गई। कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा। यहीं पर उन्हें पुलिस गिरफ्तार करने आ गई। अस्पताल से छूटने पर उन्हें सीधा जेल ले जाया गया। इस घटना के बाद अनंत सिंह ने नदवां गांव में रहना छोड़ दिया और वो पटना में सरकारी आवास में रहने लगे। महिला ने CM को लिखी चिट्ठी, कुछ ही दिन में लाश मिली बात 2006 की है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक सुबह CM नीतीश कुमार, बिहार के सीनियर पुलिस अधिकारियों और राज्य के बड़े मीडिया चैनलों को एक चिट्ठी मिली। ये चिट्ठी एक मुसलमान महिला ने लिखी थी। चिट्ठी में उसने आरोप लगाया था कि अनंत सिंह ने उसके साथ बलात्कार किया। चिट्ठी मिलने के कुछ ही दिन बाद उस महिला की लाश विधायक अनंत सिंह के पटना आवास के नजदीक मिली। चिट्ठी के सामने आने और महिला की हत्या से हड़कंप मच गया। जनता अब मुख्यमंत्री से सवाल करने लगी। दबाव में नीतीश कुमार ने इस मामले को CBI को सौंप दिया। उन्‍होंने वादा किया कि न्याय होगा। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। दो पत्रकार अनंत सिंह के बंगले पर पहुंचे और महिला की हत्या और बलात्कार के मामले में उनसे सवाल पूछने लगे। किताब के अनुसार, पत्रकारों के सवाल सुनकर अनंत सिंह ने उन्हें इतना पिटवाया कि उन्हें अस्पताल में महीनों भर्ती रहना पड़ा। घटना के विरोध में कई अन्य पत्रकार मार्च निकालते हुए अनंत सिंह के बंगले पर पहुंचे। उन्हें भी पीट-पीटकर वहां से भगा दिया गया। नीतीश कुमार समझ चुके थे कि अब हद हो चुकी है। उन्होंने अनंत सिंह को गिरफ्तार करने का ऑर्डर दे दिया। अनंत को दो हफ्तों की पुलिस रिमांड पर भी भेजा गया। हालांकि, पुलिस ने मामले की जांच कर अनंत सिंह को क्लीन चिट दे दी। मामले में एक बिल्डर अनिल शर्मा को आरोपी बना दिया गया। लेखक और शिक्षाविद् मिलन वैष्‍णव के अनुसार, ‘अनंत सिंह हत्‍यारा नहीं है, लेकिन हत्‍याएं मैनेज करता है।’ लालू यादव का घोड़ा खरीदा, बग्घी से पहुंचे विधानसभा साल 2007 की बात है। सोनपुर के पशु मेले में लालू यादव का घोड़ा बिकने के लिए आया। अनंत सिंह को घोड़े रखने का बहुत शौक था। उनके पास 100 घोड़े हुआ करते थे। अनंत ने लालू यादव का घोड़ा खरीदने का मन बना लिया, लेकिन वो जानते थे कि लालू यादव उन्हें घोड़ा नहीं बेचेंगे। उन्‍होंने एक किसान को घोड़ा खरीदने भेजा और घोड़ा खरीद भी लिया गया। इसके बाद अनंत सिंह वही घोड़ा लेकर सोनपुर मेला घूमने पहुंच गए। अनंत सिंह जब विधायक बन गए तो घोड़ा-बग्घी पर सवार होकर विधानसभा जाते। बग्घी भी आम नहीं; इसमें लाइटें और म्यूजिक सिस्टम लगा था और सुंदर लाल कपड़े से सजावट की गई थी। लालू के दबाव में नीतीश ने किया अनंत सिंह से किनारा साल 2015 में बिहार में महागठबंधन बन चुका था और लालू यादव भी इसका हिस्सा थे। लालू के दबाव में अनंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद 2015 का विधानसभा चुनाव अनंत सिंह ने निर्दलीय लड़कर जीत लिया। इससे पटना में धमक वैसी ही बनी रही। 14 जुलाई 2019 की रात एक ऑडियो तेजी से वायरल होना शुरू हुआ। 24 मिनट 58 सेकेंड के इस ऑडियो में अनंत सिंह किसी के साथ मिलकर अपने पुराने साथी भोला सिंह की हत्या की प्लानिंग करते सुनाई दिए। ऑडियो वायरल होते ही प्रशासन के कान खड़े हो गए और पुलिस की कार्रवाई शुरू हो गई। पुलिस जांच में साबित हुआ कि वायरल ऑडियो में अनंत सिंह की ही आवाज थी। अगले महीने 16 अगस्त को पटना के ग्रामीण SP कांतेश मिश्रा और ASP लिपि सिंह पूरे लाव-लश्कर के साथ सुबह 4 बजे नदवां गांव पहुंच चुके थे। उन्होंने अनंत सिंह के घर पर छापेमारी शुरू कर दी। 18 घंटों तक चली छापेमारी में पूरी हवेली तोड़ दी गई। SHO बाढ़ के मुताबिक, पुलिस को घर से दैनिक भास्कर अखबार में लिपटी AK47 मिली। इसके अलावा हैंड ग्रेनेड और 26 गोलियों की भी जब्ती दिखाई गई। घर के केयरटेकर सुनील राम को गिरफ्तार कर लिया गया और अनंत सिंह के खिलाफ UAPA और आर्म्‍स एक्‍ट समेत कई धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। 17 अगस्त को अनंत सिंह के पटना स्थित सरकारी आवास पर रेड डाली गई, लेकिन यहां से अनंत सिंह गायब हो गए। पटना पुलिस ने कहा, ‘अनंत सिंह नेपाल भाग सकता है। इसलिए वो जहां भी मिले, एयरपोर्ट पर, स्टेशन पर, उसे गिरफ्तार कर लिया जाए।’ पुलिस ने बाढ़ कोर्ट से उनकी गिरफ्तारी का वारंट तो लिया था, लेकिन अब तक गिरफ्तारी हो नहीं पाई थी। 18 अगस्त को एक वीडियो Twitter पर पोस्ट हुआ जिसमें अनंत सिंह कहते हैं, ‘हम भागे नहीं हैं…हमारा एक दोस्त बीमार पड़ गया है, उसी में उलझ गए हैं। जहां AK-47 की जब्ती हुई वहां तो हम 2004 से ही नहीं गए। लिपि सिंह ही AK-47 रखे हैं। 3-4 दिन में हम सीधा कोर्ट में सरेंडर करेंगे….।’ लिपि सिंह ने गिरफ्तारी की कोशिशें और तेज कर दीं। पत्रकार ज्ञानेश्‍वर के अनुसार, इसके लिए 10 नई टीमें बनाईं गईं और 200 से ज्यादा जवानों को इस काम में लगाया गया। पूरे बिहार में छापेमारी होने लगी। इस बीच अनंत सिंह पटना से बिना नंबर प्लेट की होंडा सिटी गाड़ी से गया पहुंच गए। वहां एक स्थानीय नेता ने उन्हें दूसरी गाड़ी मुहैया कराई। इससे वो सड़क के रास्‍ते ही दिल्ली पहुंच गए। 23 अगस्त 2019 को शुक्रवार का दिन था। दिल्ली के साकेत कोर्ट में वकीलों और जजों ने आना शुरू ही किया था। यहीं अनंत सिंह अपने कुछ साथियों के साथ पहुंचे और उसने सरेंडर कर दिया। लिपि सिंह खबर मिलते ही तुरंत दिल्ली के लिए निकलीं। उन्‍होंने शनिवार को छुट्टी वाले दिन अर्जेंट एप्लिकेशन लगाई और अनंत सिंह को ट्रांजिट रिमांड के लिए पटना लाया गया। बाढ़ कोर्ट में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मिथिलेश कुमार तिवारी की अदालत में अनंत सिंह की पेशी हुई। अदालत ने अनंत सिंह से पूछा, ‘आप ठीक है ना….।’ अनंत सिंह ने कहा, ‘हां ठीक हैं अब…। चार दिन पहले बुखार हो गया था, लेकिन अब ठीक हैं…..।’ अनंत सिंह को 30 अगस्त तक ज्यूडिशियल रिमांड पर भेजने का आदेश दिया गया। इसके बाद बेऊर जेल भेज दिया गया। 2020 में चुनाव जीता, 2022 में सजा हुई 2020 का विधानसभा चुनाव आ चुका था। इस बार तेजस्‍वी यादव ने अनंत सिंह को RJD से टिकट दिया। JDU ने राजीव लोचन सिंह को उम्मीदवार बनाया। अनंत सिंह ने जेल में रहते हुए एक बार फिर जीत हासिल की। इस बार उन्हें 2015 के मुकाबले और ज्यादा वोट मिले थे। विधायक बनने के बावजूद अनंत सिंह को जमानत नहीं मिली। 21 जून 2022 को उन्हें 10 साल जेल की सजा सुनाई गई। बिहार विधानसभा की सदस्यता भी खत्म कर दी गई। हालांकि, उनकी पत्नी नीलम सिंह RJD के टिकट पर उपचुनाव जीत गईं और विधायक बन गईं। दैनिक भास्‍कर अखबार बना कोर्ट में सबूत 2024 में इसी मामले में पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि छापेमारी के समय अनंत सिंह या परिवार का कोई सदस्‍य घर पर मौजूद नहीं था। इसके अलावा, 16 अगस्‍त को हुई छापेमारी में बताया गया कि दैनिक भास्‍कर अखबार में लिपटी AK-47 मिली, जबकि इस अखबार पर तारीख थी 27 अगस्‍त। इसके चलते अनंत सिंह को आर्म्स एक्ट के मामले में बरी कर दिया गया। 22 जनवरी 2025। अनंत सिंह मोकामा के नौरंगा‑जलालपुर गांव में स्थानीय ग्रामीण मुकेश सिंह के घर पर लॉकिंग और रंगदारी की शिकायत पर गए। उसी दौरान स्‍थानीय बदमाश सोनू‑मोनू के गुट से सामना हो गया। 60‑70 राउंड गोलियां चलीं जिसमें कई लोग घायल हुए। अनंत सिंह पर हत्या की कोशिश की धाराओं में केस दर्ज हुआ। 24 जनवरी को उन्होंने बाढ़ सिविल कोर्ट में सरेंडर कर दिया। उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेज दिया गया। फरवरी में कोर्ट ने अनंत सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी। दुलारचंद यादव की हत्‍या के केस में जेल गए अक्‍टूबर में चुनाव प्रचार के दौरान बसावनचक गांव में अनंत सिंह और जन सुराज पार्टी समर्थक दुलारचंद यादव आमने-सामने आ गए। दोनों के बीच झड़प हो गई जिसके बाद दुलारचंद यादव को गोली मारकर कार से कुचल दिया गया। 1 नवंबर को पुलिस ने अनंत सिंह को हत्‍या के आरोप में गिरफ्तार किया। उन्‍हें बेऊर जेल भेजा गया। अनंत सिंह तीन महीने पहले ही इसी जेल से 6 अगस्‍त को बाहर आए थे। मोकामा से जदयू विधायक अनंत सिंह पर पार्टी लाइन से अलग हटकर काम करने पर एक्शन हुआ है। अनंत सिंह को JDU से 6 साल से निष्काषित कर दिया गया है। अनंत सिंह पटना स्नातक सीट पर जदयू के कैंडिडेट नीरज कुमार का लगातार विरोध कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा था कि वो नीरज कुमार की जमानत जब्त करवा देंगे। अनंत सिंह पीके के कैंडिडेट अनुज सिंह के पक्ष में कई रोड शो भी किया था। 23 अक्टूबर को एमएलसी चुनाव के वोटिंग के दिन भी अनंत सिंह ने अपने बयान पर कायम थे। आज यानी शनिवार को अनंत सिंह अपने आवास पर लगभग 1 लाख लोगों के लिए रसगुल्ले बनवा रहे थे। उनका कहना है कि उनका कैंडिडेट ही जीतेगा। इस बीच दिल्ली से ललन सिंह पटना पहुंचे। नीतीश कुमार से मुलाकात की उसके बाद अनंत सिंह को पार्टी से बाहर करने का लेटर जारी कर दिया गया है। ये वही अनंत सिंह हैं जिन्होंने साल 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान मो नीतीश कुमार को एक जनसभा में चांदी के सिक्कों से तौला था। आखिर कौन हैं अनंत सिंह…. जिसने 9 साल की उम्र में साधु बनने के लिए घर छोड़ा, मगर भाई की हत्‍या ने उसे बना दिया इलाके का सबसे बड़ा बाहुबली। जानेंगे इस स्‍टोरी में… साल 1990 का वक्‍त। पटना में तैनात डिस्ट्रिक्ट जज किसी काम से पटना जिले के बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव जा रहे थे। बाढ़ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरे, जहां पहले से ही सरकारी गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। जज साहब गाड़ी में बैठ गए और नदवां की ओर चल पड़े। गाड़ी नदवां पहुंचने ही वाली थी कि ड्राइवर ने कहा, ‘जज साहब, गाड़ी का शीशा नीचे कर लीजिए…आगे चेकिंग होगा।’ जज साहब सोच में पड़ गए और बोले, ‘डिस्ट्रिक्ट जज की तलाशी कौन ले सकता है।’ ड्राइवर ने कहा, ‘नदवां अनंत सिंह का गांव है सरजी। मुहाने पर हथियारों से लैस उसके लोग 24 घंटा बैठे रहते हैं। अनंत सिंह की सिक्‍योरिटी खातिर हर आने-जाने वाले की चेकिंग करते हैं।’ जज साहब को यकीन ही नहीं हुआ। गाड़ी जब नदवां पहुंची तो उन्‍होंने देखा, लकड़ी के बड़े से लट्ठे से फाटक बनाया गया था। 12-13 आदमी बंदूकें लिए वहां खड़े हुए थे और सभी गाड़ियों की तलाशी ले रहे थे। जज साहब ने चुपचाप अपनी गाड़ी की तलाशी दी और नदवां में दाखिल हुए। साधु बनने के लिए 9 साल की उम्र में घर छोड़ा 5 जनवरी 1967, बिहार का पटना जिला। बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव में चंद्रदीप सिंह के घर अनंत सिंह का जन्म हुआ। चार भाइयों में वो सबसे छोटा था। उनका मन पढ़ाई-लिखाई में कतई नहीं लगता था। इसलिए चौथी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी। मन पूजा-पाठ, धर्म और आध्यात्मिकता में ज्यादा लगता था, सो 9 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। वो हरिद्वार जाकर साधुओं के बीच रहने लगे। साधुओं की सेवा करना और दिनभर पूजा-पाठ में लीन रहना, उनका बस यही काम था। एक दिन कुछ साधु आपस में झगड़ा करने लगे। नौबत मारपीट तक पहुंच गई। अनंत ये देखकर दंग रह गए और वैराग्य की जिंदगी से उनका मोह भंग हो गया। इसके बाद वो अपने गांव लौट गए। भाई की हत्‍या हुई तो कहा- खुद इंसाफ करूंगा गर्मी की एक दोपहर वो अपने घर में बैठकर खाना खा रहे थे। तभी एक नौकर हांफता हुआ उनके पास पहुंचा और बोला, ‘सरकार, बिराची सिंह जी मार दिए गए हैं….।’ अनंत के बड़े भाई बिराची सिंह को किसी ने गांव के चौक पर ही गोली मार दी थी। अनंत फौरन ही भाई को देखने दौड़ गए। वहां पहुंचते ही बोले, ‘ये जिसका भी काम है, उसे मैं छोड़ूंगा नहीं…’ अनंत सिंह का परिवार इलाके के बड़े जमींदारों में आता था। उस वक्त बिहार में माओवादी संगठनों का आतंक था। आए दिन उनका संघर्ष जमींदारों के साथ होता। घटना के बाद अनंत सिंह ने पूरे गांव में पूछताछ की। हर घर में जाकर पूछा। पता चला माओवादी संगठन के सरगना ने बिराची सिंह की हत्या की है। किसी ने बताया, ‘वो ढूंढकर बड़े जमींदारों की हत्या करता है। कहता है कि सदियों पुराना हिसाब कर रहा है…।’ राजेश सिंह अपनी किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्‍स में लिखते हैं, कि अनंत आग-बबूला हो गए। उनके सिर पर धुन सवार हो गई कि भाई के हत्यारे को ठिकाने लगाना है, लेकिन परिवार ने समझाया, ‘पुलिस हमारा न्याय करेगी, तुम चिंता मत करो…।’ महीनों बीत गए, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। फिर अनंत ने फैसला किया कि अब वो खुद ही इंसाफ करेंगे। एक दिन उनके मुखबिर ने आकर बताया, ‘सरकार, आपके गांव के पास से जो गंगा बहती है, उसी के पार डेरा डाला है वो… बहन को ससुराल छोड़ कर लौटा है। सुने हैं, संगी-साथी भी कम ही हैं।’ अनंत फौरन नदी किनारे पहुंचे। एक साथी ने कहा, ‘सरकार अभी कोई हथियार वगैरह तो है नहीं। नदी पार करना भी मुश्‍किल लग रहा है। किसी और दिन हिसाब कीजिएगा…।’ वो बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अनंत ने नदी में छलांग लगा दी। वो तैरकर ही नदी पार करने लगे। साथी घबराकर वहीं रुक गए। पानी में घंटों हाथ-पैर मारने के बाद अनंत आखिरकार नदी के दूसरी ओर पहुंचे। घने जंगल के बीच वो अपने भाई के हत्यारे को ढूंढने लगे। वो नदी पार कर थक चुके थे, लेकिन बदले की धुन सवार थी। आखिरकार उनका सामना अपने भाई के हत्यारे से हुआ। कोई हथियार नहीं था तो पत्‍थर हाथ में उठा लिया। उन्‍होंने पत्‍थर सिर पर मारकर पहले अपने दुश्‍मन को बेहोश कर दिया और फिर एक बड़े पत्‍थर से उसका सिर कुचल डाला। वो खून से सने हाथ लिए नदी पार कर वापस नदवां लौट गए। इस घटना के बारे में एक इंटरव्‍यू में अनंत सिंह ने कहा था, ‘इंसाफ होना जरूरी था।’ बिहार के पत्रकार ज्ञानेश्‍वर बताते हैं कि इस घटना के बाद गांव और आस-पास के दूसरे जमींदार भी उसके पास सुरक्षा के लिए आने लगे, लेकिन पुलिस-प्रशासन ने कभी उसकी ओर आंख तक नहीं उठाई। वजह थे उनके बड़े भाई दिलीप सिंह। दिलीप सिंह 1990 से 1995 के बीच जनता दल से मोकामा के विधायक थे। आगे जाकर वो लालू यादव-राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी बने। जब भी अनंत सिंह के खिलाफ मुकदमे कोर्ट पहुंचते, तो वहां से भी उन्‍हें आसानी से जमानत मिल जाती। पड़ोसी ने किया जानलेवा हमला, बहनोई मारे गए नदवां गांव में विवेका पहलवान और अनंत सिंह पड़ोसी थे, जिनके घर की दीवार एक ही थी। दोनों परिवार की रंजिश बहुत पुरानी थी। चूंकि गांव में अनंत सिंह का दबदबा ज्यादा रहा, इसलिए विवेका पहलवान ने गांव छोड़ दिया था। बाहर जाकर वो अनंत सिंह के दुश्मनों से मिला और उन्हें इकट्ठा करने लगा। एक बार सभी रात में गांव में घुस आए और अनंत सिंह पर हमला कर दिया। अनंत सतर्क थे, सो उन्‍होंने भी जवाबी हमला किया। दोनों ओर से हजारों राउंड गोलियां चलीं। अनंत के बहनोई भूषण सिंह इस हमले में मारे गए। इसके बाद ये दुश्मनी और खूनी हो गई। 1990 में मोकामा का चुनाव अनंत के बड़े भाई दिलीप सिंह जीत गए। दोनों भाई चाहते थे कि बाढ़ पर भी उन्हीं का कब्जा हो, सो वहां से उन्होंने अपने तीसरे भाई सच्चिदानंद सिंह उर्फ फाजो सिंह को निर्दलीय चुनाव लड़ाया, लेकिन बाढ़ से जीत लालू यादव की पार्टी के विजयकिशन की हुई। किडनैप व्‍यापारी को छुड़ाने के लिए पूरे गांव पर धावा बोला इसी दौरान बाढ़ से एक बनिया जाति के एक व्यापारी का अपहरण कर लिया गया। पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पा रही थी। ऐसे में लोग शिकायत लेकर नदवां गांव अनंत सिंह के पास पहुंचे। अनंत सिंह ने छानबीन कराई तो पता चला कि भावनचक के बच्चू सिंह ने अपहरण किया है। अनंत अपने दलबल के साथ सीधे बच्चू सिंह के गांव में घुस गए। घंटों गोलीबारी हुई और व्यापारी को छुड़ा लिया गया। बच्‍चू सिंह इस बात से भड़क गया और इलाके में मारकाट शुरू हो गई। इस लड़ाई में सभी राजपूत बच्चू सिंह की तरफ और सभी भूमिहार अनंत सिंह की तरफ हो गए थे। दोनों ओर से लाशें गिरने लगीं। आखिरकार साल 2000 में एक गैंगवार में बच्‍चू सिंह मारा गया। पुलिस रिपोर्ट में हत्‍या के मुख्‍य आरोपी अनंत सिंह ही थे। पूरे गांव को बनाया अपना किला पत्रकार ज्ञानेश्‍वर बताते हैं, अनंत सिंह का सुरक्षा का इंतजाम बेहद मजबूत था। उन्‍होंने पूरे गांव को अपना अभेद्य किला बना रखा था। किला ऐसा जहां पुलिस-प्रशासन के लोग तक बिना इजाजत घुस नहीं सकते थे। उनके पास 100 से ज्यादा घोड़े और टम-टम थे, जिन्हें उन्‍होंने गांव के जरूरतमंदों को बांट रखा था। ये लोग दिन में टम-टम चलाकर कमाई करते और रात में अनंत सिंह के घर के आसपास सभी टम-टम पार्क कर देते। पास ही घोड़ों को भी बांध देते। अनंत समय-समय पर गांव के लोगों की मदद भी करते रहते थे। इससे उन्‍होंने लोगों का भरोसा जीत लिया। सालों तक उन्‍होंने गांव के लिए जाने वाली सड़क को पक्की नहीं होने दिया, ताकि कोई गांव तक गाड़ी दौड़ाता हुआ ना आ सके। एक बार बाढ़ के ASP अनंत सिंह को अरेस्ट करने नदवां गांव पहुंच गए। वो बिना फोर्स के ही गांव में दाखिल हो गए। हमेशा की तरह अनंत तक इसकी खबर पहुंच गई। हवेली तक पहुंचते ही ASP को बंधक बना लिया गया। कई दूसरे अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ASP को छोड़ा गया। हिंदी फिल्मों के बैड-मैन वाली छवि बनाई सफेद रंग के कपड़े, आंखों पर काला चश्मा, माथे पर लंबा तिलक, रौबदार मूछें, जिसे वो समय-समय पर घुमाते रहते और मुंह में दबी सिगरेट- ये अनंत सिंह के सिग्नेचर स्टाइल बन गए। उन्‍होंने अपने घर में एक अजगर और एक हाथ मिलाने वाला हाथी भी पाला हुआ था। वो अक्सर अपने घर पर डांस पार्टियों का आयोजन करने लगे। ऐसी ही एक पार्टी का वीडियो खूब चर्चा में रहा जिसमें अनंत सिंह किसी डांसर के साथ हाथ में AK-47 लेकर झूमते नजर आ रहे थे। हालांकि, इस वीडियो के बारे में मीडिया में जब सवाल पूछा गया तो उन्‍होंने कहा, ‘वीडियो नकली है, मेरे विरोधियों की साजिश है।’ उनकी छवि इलाके में रॉबिनहुड जैसी थी। वो कभी साड़ियां बांटते, तो कभी जरूरतमंदों के लिए भोज का आयोजन करते। रमजान के महीने में इफ्तार करवाते और सावन में भंडारे। भूमिहार जाति का पूरा सपोर्ट उनके पास था। सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्वर के मुताबिक वो जब भी किसी पर हमला करने जाते तो सोने का मुकुट पहनकर जाते। लोग उन्हें छोटे सरकार कहकर बुलाने लगे थे। नीतीश का साथ मिला और चुनाव जीतते गए लालू यादव से अलग होने के बाद नीतीश कुमार पर राजनीतिक संकट मंडराता नजर आ रहा था। राजेश सिंह की किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्‍स के अनुसार, 1996 के लोकसभा चुनाव में बाढ़ लोकसभा से गाड़ी पार करना नीतीश कुमार को चुनौती जैसा लग रहा था। ऐसे में उनकी नजर अनंत सिंह पर पड़ी। अनंत सिंह ने नीतीश से हाथ मिला लिया। अनंत सिंह की ही बदौलत नीतीश कुमार 1996, 1998 और 1999 में लोकसभा चुनाव जीते और अटल सरकार में मंत्री भी रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान बाढ़ में एक जनसभा की गई। इस दौरान अनंत सिंह ने नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौल दिया। इसका एक वीडियो भी उन दिनों कई मीडिया चैनलों ने चलाया। ये अनंत सिंह की राजनीति में औपचारिक एंट्री थी। इसके बाद 2005 में उन्‍होंने जदयू के टिकट पर मोकामा से विधानसभा चुनाव जीता। इसी साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और उन्होंने जनता से वादा किया कि वो बिहार को जंगल राज से मुक्ति दिलाएंगे और लॉ एंड ऑर्डर को ठीक करेंगे। इस दौरान कई बाहुबलियों और अपराधियों को पुलिस ने निशाना बनाया। दर्जनभर से ज्यादा मामले अनंत सिंह के खिलाफ दर्ज हुए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। घायल अनंत सिंह को गिरफ्तार करने अस्‍पताल पहुंची पुलिस 2 जुलाई 2004, बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्‍वर के अनुसार, सवेरे उठकर अनंत सिंह अपने घर की बैठक में शेविंग करवा रहे थे। तभी विवेका पहलवान के घर की खिड़की खुली। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। अचानक खिड़की से Ak-47 से फायरिंग शुरू हो गई। एक गोली अनंत सिंह की छाती में लगी। जवाब में अनंत सिंह के लोग दौड़कर विवेका पहलवान के घर पहुंचे और दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे, लेकिन अंदर उन्हें कोई नहीं मिला। हमला करने वाले सभी लोग घर के पीछे के दरवाजे से अब तक भाग चुके थे। दूसरी ओर अनंत सिंह का काफी खून बह चुका था। उन्हें तुरंत गाड़ी में बैठाकर पटना ले जाया गया। आलोक नर्सिंग होम की इमरजेंसी में डॉ. नरेंद्र प्रसाद ने इलाज शुरू किया। डॉ. प्रसाद ने कहा, ‘खून काफी बह चुका है और अनंत सिंह जी की इंजरी भी बहुत क्रिटिकल है। इन्हें बचाना मुश्किल है…।’ अनंत के भाई दिलीप सिंह ने डॉक्टर की कनपट्टी पर पिस्तौल रख दी, बोले ‘ऐसे कैसे बचाना मुश्किल है… अगर हमरे भाई को कुछ हुआ तो तू भी अपने परिवार का मुंह नहीं देख सकेगा डॉक्टर…।’ इसके बाद पूरा नर्सिंग होम अनंत सिंह की सेवा में लग गया। कई घंटे की सर्जरी के बाद आखिरकार अनंत सिंह की जान बच गई। कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा। यहीं पर उन्हें पुलिस गिरफ्तार करने आ गई। अस्पताल से छूटने पर उन्हें सीधा जेल ले जाया गया। इस घटना के बाद अनंत सिंह ने नदवां गांव में रहना छोड़ दिया और वो पटना में सरकारी आवास में रहने लगे। महिला ने CM को लिखी चिट्ठी, कुछ ही दिन में लाश मिली बात 2006 की है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक सुबह CM नीतीश कुमार, बिहार के सीनियर पुलिस अधिकारियों और राज्य के बड़े मीडिया चैनलों को एक चिट्ठी मिली। ये चिट्ठी एक मुसलमान महिला ने लिखी थी। चिट्ठी में उसने आरोप लगाया था कि अनंत सिंह ने उसके साथ बलात्कार किया। चिट्ठी मिलने के कुछ ही दिन बाद उस महिला की लाश विधायक अनंत सिंह के पटना आवास के नजदीक मिली। चिट्ठी के सामने आने और महिला की हत्या से हड़कंप मच गया। जनता अब मुख्यमंत्री से सवाल करने लगी। दबाव में नीतीश कुमार ने इस मामले को CBI को सौंप दिया। उन्‍होंने वादा किया कि न्याय होगा। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। दो पत्रकार अनंत सिंह के बंगले पर पहुंचे और महिला की हत्या और बलात्कार के मामले में उनसे सवाल पूछने लगे। किताब के अनुसार, पत्रकारों के सवाल सुनकर अनंत सिंह ने उन्हें इतना पिटवाया कि उन्हें अस्पताल में महीनों भर्ती रहना पड़ा। घटना के विरोध में कई अन्य पत्रकार मार्च निकालते हुए अनंत सिंह के बंगले पर पहुंचे। उन्हें भी पीट-पीटकर वहां से भगा दिया गया। नीतीश कुमार समझ चुके थे कि अब हद हो चुकी है। उन्होंने अनंत सिंह को गिरफ्तार करने का ऑर्डर दे दिया। अनंत को दो हफ्तों की पुलिस रिमांड पर भी भेजा गया। हालांकि, पुलिस ने मामले की जांच कर अनंत सिंह को क्लीन चिट दे दी। मामले में एक बिल्डर अनिल शर्मा को आरोपी बना दिया गया। लेखक और शिक्षाविद् मिलन वैष्‍णव के अनुसार, ‘अनंत सिंह हत्‍यारा नहीं है, लेकिन हत्‍याएं मैनेज करता है।’ लालू यादव का घोड़ा खरीदा, बग्घी से पहुंचे विधानसभा साल 2007 की बात है। सोनपुर के पशु मेले में लालू यादव का घोड़ा बिकने के लिए आया। अनंत सिंह को घोड़े रखने का बहुत शौक था। उनके पास 100 घोड़े हुआ करते थे। अनंत ने लालू यादव का घोड़ा खरीदने का मन बना लिया, लेकिन वो जानते थे कि लालू यादव उन्हें घोड़ा नहीं बेचेंगे। उन्‍होंने एक किसान को घोड़ा खरीदने भेजा और घोड़ा खरीद भी लिया गया। इसके बाद अनंत सिंह वही घोड़ा लेकर सोनपुर मेला घूमने पहुंच गए। अनंत सिंह जब विधायक बन गए तो घोड़ा-बग्घी पर सवार होकर विधानसभा जाते। बग्घी भी आम नहीं; इसमें लाइटें और म्यूजिक सिस्टम लगा था और सुंदर लाल कपड़े से सजावट की गई थी। लालू के दबाव में नीतीश ने किया अनंत सिंह से किनारा साल 2015 में बिहार में महागठबंधन बन चुका था और लालू यादव भी इसका हिस्सा थे। लालू के दबाव में अनंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद 2015 का विधानसभा चुनाव अनंत सिंह ने निर्दलीय लड़कर जीत लिया। इससे पटना में धमक वैसी ही बनी रही। 14 जुलाई 2019 की रात एक ऑडियो तेजी से वायरल होना शुरू हुआ। 24 मिनट 58 सेकेंड के इस ऑडियो में अनंत सिंह किसी के साथ मिलकर अपने पुराने साथी भोला सिंह की हत्या की प्लानिंग करते सुनाई दिए। ऑडियो वायरल होते ही प्रशासन के कान खड़े हो गए और पुलिस की कार्रवाई शुरू हो गई। पुलिस जांच में साबित हुआ कि वायरल ऑडियो में अनंत सिंह की ही आवाज थी। अगले महीने 16 अगस्त को पटना के ग्रामीण SP कांतेश मिश्रा और ASP लिपि सिंह पूरे लाव-लश्कर के साथ सुबह 4 बजे नदवां गांव पहुंच चुके थे। उन्होंने अनंत सिंह के घर पर छापेमारी शुरू कर दी। 18 घंटों तक चली छापेमारी में पूरी हवेली तोड़ दी गई। SHO बाढ़ के मुताबिक, पुलिस को घर से दैनिक भास्कर अखबार में लिपटी AK47 मिली। इसके अलावा हैंड ग्रेनेड और 26 गोलियों की भी जब्ती दिखाई गई। घर के केयरटेकर सुनील राम को गिरफ्तार कर लिया गया और अनंत सिंह के खिलाफ UAPA और आर्म्‍स एक्‍ट समेत कई धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। 17 अगस्त को अनंत सिंह के पटना स्थित सरकारी आवास पर रेड डाली गई, लेकिन यहां से अनंत सिंह गायब हो गए। पटना पुलिस ने कहा, ‘अनंत सिंह नेपाल भाग सकता है। इसलिए वो जहां भी मिले, एयरपोर्ट पर, स्टेशन पर, उसे गिरफ्तार कर लिया जाए।’ पुलिस ने बाढ़ कोर्ट से उनकी गिरफ्तारी का वारंट तो लिया था, लेकिन अब तक गिरफ्तारी हो नहीं पाई थी। 18 अगस्त को एक वीडियो Twitter पर पोस्ट हुआ जिसमें अनंत सिंह कहते हैं, ‘हम भागे नहीं हैं…हमारा एक दोस्त बीमार पड़ गया है, उसी में उलझ गए हैं। जहां AK-47 की जब्ती हुई वहां तो हम 2004 से ही नहीं गए। लिपि सिंह ही AK-47 रखे हैं। 3-4 दिन में हम सीधा कोर्ट में सरेंडर करेंगे….।’ लिपि सिंह ने गिरफ्तारी की कोशिशें और तेज कर दीं। पत्रकार ज्ञानेश्‍वर के अनुसार, इसके लिए 10 नई टीमें बनाईं गईं और 200 से ज्यादा जवानों को इस काम में लगाया गया। पूरे बिहार में छापेमारी होने लगी। इस बीच अनंत सिंह पटना से बिना नंबर प्लेट की होंडा सिटी गाड़ी से गया पहुंच गए। वहां एक स्थानीय नेता ने उन्हें दूसरी गाड़ी मुहैया कराई। इससे वो सड़क के रास्‍ते ही दिल्ली पहुंच गए। 23 अगस्त 2019 को शुक्रवार का दिन था। दिल्ली के साकेत कोर्ट में वकीलों और जजों ने आना शुरू ही किया था। यहीं अनंत सिंह अपने कुछ साथियों के साथ पहुंचे और उसने सरेंडर कर दिया। लिपि सिंह खबर मिलते ही तुरंत दिल्ली के लिए निकलीं। उन्‍होंने शनिवार को छुट्टी वाले दिन अर्जेंट एप्लिकेशन लगाई और अनंत सिंह को ट्रांजिट रिमांड के लिए पटना लाया गया। बाढ़ कोर्ट में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मिथिलेश कुमार तिवारी की अदालत में अनंत सिंह की पेशी हुई। अदालत ने अनंत सिंह से पूछा, ‘आप ठीक है ना….।’ अनंत सिंह ने कहा, ‘हां ठीक हैं अब…। चार दिन पहले बुखार हो गया था, लेकिन अब ठीक हैं…..।’ अनंत सिंह को 30 अगस्त तक ज्यूडिशियल रिमांड पर भेजने का आदेश दिया गया। इसके बाद बेऊर जेल भेज दिया गया। 2020 में चुनाव जीता, 2022 में सजा हुई 2020 का विधानसभा चुनाव आ चुका था। इस बार तेजस्‍वी यादव ने अनंत सिंह को RJD से टिकट दिया। JDU ने राजीव लोचन सिंह को उम्मीदवार बनाया। अनंत सिंह ने जेल में रहते हुए एक बार फिर जीत हासिल की। इस बार उन्हें 2015 के मुकाबले और ज्यादा वोट मिले थे। विधायक बनने के बावजूद अनंत सिंह को जमानत नहीं मिली। 21 जून 2022 को उन्हें 10 साल जेल की सजा सुनाई गई। बिहार विधानसभा की सदस्यता भी खत्म कर दी गई। हालांकि, उनकी पत्नी नीलम सिंह RJD के टिकट पर उपचुनाव जीत गईं और विधायक बन गईं। दैनिक भास्‍कर अखबार बना कोर्ट में सबूत 2024 में इसी मामले में पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि छापेमारी के समय अनंत सिंह या परिवार का कोई सदस्‍य घर पर मौजूद नहीं था। इसके अलावा, 16 अगस्‍त को हुई छापेमारी में बताया गया कि दैनिक भास्‍कर अखबार में लिपटी AK-47 मिली, जबकि इस अखबार पर तारीख थी 27 अगस्‍त। इसके चलते अनंत सिंह को आर्म्स एक्ट के मामले में बरी कर दिया गया। 22 जनवरी 2025। अनंत सिंह मोकामा के नौरंगा‑जलालपुर गांव में स्थानीय ग्रामीण मुकेश सिंह के घर पर लॉकिंग और रंगदारी की शिकायत पर गए। उसी दौरान स्‍थानीय बदमाश सोनू‑मोनू के गुट से सामना हो गया। 60‑70 राउंड गोलियां चलीं जिसमें कई लोग घायल हुए। अनंत सिंह पर हत्या की कोशिश की धाराओं में केस दर्ज हुआ। 24 जनवरी को उन्होंने बाढ़ सिविल कोर्ट में सरेंडर कर दिया। उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेज दिया गया। फरवरी में कोर्ट ने अनंत सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी। दुलारचंद यादव की हत्‍या के केस में जेल गए अक्‍टूबर में चुनाव प्रचार के दौरान बसावनचक गांव में अनंत सिंह और जन सुराज पार्टी समर्थक दुलारचंद यादव आमने-सामने आ गए। दोनों के बीच झड़प हो गई जिसके बाद दुलारचंद यादव को गोली मारकर कार से कुचल दिया गया। 1 नवंबर को पुलिस ने अनंत सिंह को हत्‍या के आरोप में गिरफ्तार किया। उन्‍हें बेऊर जेल भेजा गया। अनंत सिंह तीन महीने पहले ही इसी जेल से 6 अगस्‍त को बाहर आए थे।  

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