(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, 22 अक्टूबर राजस्थान के जैसलमेर में चूना पत्थर खनन की दो परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी देने की सिफारिश की गई है। इनमें से एक परियोजना का कुछ हिस्सा ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (जीआईबी) के ‘‘प्राथमिकता क्षेत्र’’ में आता है, जबकि दूसरी परियोजना इस पक्षी के प्रवास क्षेत्र से एक किलोमीटर से कुछ अधिक दूरी पर स्थित है। जीआईबी के लिए ये प्राथमिकता क्षेत्र महत्वपूर्ण आवास हैं, जो इस गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षी को आश्रय और प्रजनन स्थल उपलब्ध कराते हैं।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब जैसलमेर के जोगा गांव में चूना पत्थर से जुड़ी एक अन्य परियोजना ने सितंबर में मंजूरी प्रक्रिया का पहला चरण पार कर लिया था। यह परियोजना जीआईबी के प्राथमिकता क्षेत्र से 5.8 किलोमीटर दूर है। जुलाई में भी इसी तरह की एक अन्य परियोजना को ऐसी ही मंजूरी दी गई थी।
इस परियोजना का 280 हेक्टेयर से अधिक, यानी 29 प्रतिशत खनन पट्टा क्षेत्र, उसी गांव में जीआईबी के प्राकृतिक आवास के अंतर्गत आता है। हाल ही में जिन परियोजनाओं को मंजूरी देने की सिफारिश की गई है, उनमें जैसलमेर के पारेवर गांव स्थित ‘पारेवर एसएन1 लाइमस्टोन ब्लॉक’ में वंडर सीमेंट लिमिटेड और इसी जिले के रामगढ़ गांव स्थित ‘रामगढ़ ऑक्शन ब्लॉक’ में डालमिया भारत ग्रीन विजन लिमिटेड की खनन परियोजनाएं शामिल हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने आठ अक्टूबर को हुई बैठक में इन परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी देने की सिफारिश की।
रामगढ़ परियोजना का खनन पट्टा क्षेत्र 250 हेक्टेयर से अधिक है और यह जीआईबी के ‘‘प्राथमिकता क्षेत्र’’ से 1.77 किलोमीटर दूर स्थित है। वहीं, पारेवर परियोजना का खनन पट्टा क्षेत्र 960 हेक्टेयर है, जिसमें से 0.29 हेक्टेयर हिस्सा जीआईबी के प्रवास क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह परियोजना मोकला-पारेवर संरक्षण रिजर्व से भी 7.34 किलोमीटर दूर है।
पारेवर परियोजना पर विचार करते हुए ईएसी ने सिफारिश की कि जीआईबी के आवास क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 0.29 हेक्टेयर इलाके में कोई खनन गतिविधि नहीं की जानी चाहिए। समिति ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी मिलने और खनन पट्टा विलेख निष्पादित होने के बाद वंडर सीमेंट लिमिटेड को यह क्षेत्र वापस सौंप देना चाहिए।

