क्या आने वाले दिनों में और महंगी होगी चीनी:बढ़ती कीमतों के लिए गन्ना उत्पादन में कमी या एथनॉल जिम्मेदार?मिल के GM ने बताईं वजहें

क्या आने वाले दिनों में और महंगी होगी चीनी:बढ़ती कीमतों के लिए गन्ना उत्पादन में कमी या एथनॉल जिम्मेदार?मिल के GM ने बताईं वजहें

देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे गन्ने की घटती पैदावार, बेमौसम और अधिक बारिश, खेती की बढ़ती लागत और कच्चे माल की महंगाई जैसे कई कारण हैं। इस बार सामान्य से अधिक बारिश होने के कारण गन्ने की फसल को करीब 25 प्रतिशत नुकसान हुआ है। यह कहना है एनएसआई के स्थापना दिवस में आए शुगर इंडस्ट्री से जुड़े पूर्व छात्रों का। उन्होंने बताया कि मजदूरी और रसायनों की कीमतें बढ़ने से चीनी उत्पादन की लागत भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आने वाले समय में चीनी के दाम और बढ़ने की आशंका है। चीनी के बढ़ते दामों की बताई वजह डीसीएम श्रीराम लिमिटेड के जीएम और डिस्टिलरी हेड राजीव नयन ठाकुर ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे के कारणों पर बात करते हुए कहा कि सामान्य तौर पर मानसून के दौरान करीब 1000 mm बारिश होती है, लेकिन इस बार लगभग 1500 mm बारिश हुई है। अधिक बारिश का असर गन्ने की फसल पर पड़ा और पैदावार में करीब 25 प्रतिशत तक नुकसान होने का अनुमान है। तेलंगाना, कर्नाटक,महाराष्ट्र और पूर्वी यूपी में मौसम की वजह से गन्ने का उत्पादन कम हुआ है। गन्ने की उपलब्धता घटने से चीनी उत्पादन पर भी असर पड़ रहा है, जिसका दबाव कीमतों पर दिखाई दे सकता है। उन्होंने कहा कि गन्ने की खेती में किसानों को मजदूरी, रसायनों और अन्य कृषि संसाधनों पर पहले से अधिक खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में कम पैदावार के साथ बढ़ती लागत किसानों की आर्थिक स्थिति पर दोहरा दबाव बना रही है। गन्ने की ‘वैरायटी 238’ को भी नुकसान राजीव नयन ने बताया कि गन्ने की ‘वैरायटी 238’ किसानों के लिए काफी फायदेमंद मानी जाती थी। इसकी पैदावार अच्छी होती थी और चीनी उत्पादन में भी मदद मिलती थी। अधिक बारिश की स्थिति में भी इस वैरायटी से बेहतर उत्पादन की उम्मीद रहती थी। किसानों को भरोसा था कि दूसरी परिस्थितियों से होने वाले नुकसान की भरपाई इस वैरायटी से हो जाएगी। लेकिन इस बार इसमें कीट रोग का प्रकोप होने से अपेक्षित लाभ नहीं मिला। उन्होंने कहा कि दूसरी वैरायटी से भी उतनी अच्छी पैदावार नहीं मिल पा रही है। इसका असर आने वाले समय में गन्ने की उपलब्धता और चीनी उत्पादन की लागत पर पड़ सकता है। 42 रुपए की लागत और बढ़ने की आशंका राजीव नयन ठाकुर के अनुसार, मौजूदा समय में चीनी उत्पादन की लागत करीब 40 से 42 रुपए प्रति किलो पड़ रही है। मजदूरी, रसायनों और अन्य संसाधनों की कीमतें बढ़ने के कारण यह लागत आगे और बढ़ सकती है। उत्पादन महंगा होने का असर चीनी की कीमतों पर भी पड़ने की आशंका है। उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के कारण सल्फर की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। सल्फर के दाम 25 रुपए प्रति किलो से बढ़कर करीब 150 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। चीनी उद्योग में इस्तेमाल होने वाले इस रसायन की कीमत में इतनी बड़ी बढ़ोतरी से उत्पादन लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने की डिमांड ठाकुर ने कहा कि किसानों को एक ओर मौसम की मार झेलनी पड़ रही है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत बढ़ती जा रही है। जबकि गन्ने का समर्थन मूल्य 400 रुपये प्रति क्विंटल है। इसे बढ़ाकर कम से कम 450 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। अगर सरकार ने इसे बढ़ाकर कम से कम 450 रुपये प्रति क्विंटल नहीं किया, तो किसान गन्ने की जगह मक्का या दूसरी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। चीनी मिलों का पेराई सीजन घटने से बढ़ रही लागत वहीं एनएसएल हैदराबाद के वाइस प्रेसिडेंट कारपोरेट ब्रजमोहन ने चीनी की कीमतों में अचानक आई तेज बढ़ोतरी के पीछे का सबसे बड़ा कारण बताया कि पहले देश की चीनी मिलें सालभर में करीब 200 दिन तक उत्पादन करती थीं, लेकिन अब यह अवधि घटकर लगभग 170 दिन रह गई है। अगर गन्ने की उपलब्धता और उत्पादन की मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो अगले पेराई सीजन में मिलों के संचालन की अवधि 150 दिन से भी कम रह सकती है। उन्होंने बताया कि चीनी मिलों की स्थापना और संचालन पर भारी निवेश किया जाता है। मिलों को लंबे समय तक चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में गन्ने की जरूरत होती है। जब गन्ना कम मिलता है और पेराई के दिन घटते हैं, तो मशीनों, कर्मचारियों और अन्य व्यवस्थाओं पर होने वाला खर्च कम उत्पादन पर बंट जाता है। इससे प्रति यूनिट उत्पादन लागत बढ़ जाती है। गन्ने की जगह दूसरी फसलों की ओर जा सकते हैं किसान ब्रजमोहन ने कहा कि अगर गन्ना किसान दूसरी फसलों की ओर जाते हैं, तो इससे देश में गन्ने की उपलब्धता और चीनी उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में घरेलू मांग पूरी करने के लिए चीनी आयात की जरूरत बढ़ने की आशंका है, जो देश की चीनी के मामले में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के लिए चुनौती होगी। उन्होंने कहा कि गन्ने की खेती को लाभकारी बनाए रखने, उत्पादन लागत के दबाव को कम करने और किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए समय रहते कदम उठाने की जरूरत है।

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