सम्राट सरकार ने अपने 6 महीने के कार्यकाल में 3 ADG लॉ एंड ऑर्डर बदल दिए। यानी हर दूसरे महीने लॉ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी निभाने वाले अफसर का तबादला हुआ। CM सम्राट बार-बार ADG लॉ एंड ऑर्डर क्यों बदल रहे, चाहते क्या हैं, क्या ऐसे सुधरेगी कानून-व्यवस्था, इन्हीं सवालों को समझेंगे; बूझे की नाही में…। सवाल-1ः बार-बार ADG लॉ एंड ऑर्डर के बदलने का मामला क्या है? जवाबः 15 अप्रैल 2026 को भाजपा के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले ADG लॉ एंड ऑर्डर पोस्ट पर तीन सीनियर IPS अफसरों की तैनाती की गई है। सवाल-2: बार-बार अफसर क्यों बदले जा रहे? जवाबः आधिकारिक तौर पर अफसरों के तबादले के कारणों को नहीं बताया गया है। लेकिन सियासी और प्रशासनिक गलियारे में 2 तरह की चर्चाएं हैं। 1. सीनियर अफसर पसंद का अफसर चाहते हैं चर्चा है कि पुलिस महकमा एक सीनियर IPS अफसर के इशारे पर चल रहा है। वह सभी महत्वपूर्ण पोस्टों पर अपने पसंदीदा अफसरों की तैनाती चाहते हैं। अभी तक इस सरकार में 2 ADG लॉ एंड ऑर्डर बनाए गए थे-सुधांशु कुमार और केएस अनुपम। चर्चा है कि दोनों अफसरों की ट्यूनिंग उनसे ठीक नहीं थी। इसलिए दोनों को कम समय में जाना पड़ा। ट्रांसफर की टाइमिंग ऐसी चुनी गई, जिससे सरकार की साख भी बचे और अफसर भी हट जाए। जैसे- सुधांशु कुमार का ट्रांसफर भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर के बाद किया गया। मैसेज दिया गया कि सरकार लॉ एंड ऑर्डर पर सख्त है। जबकि, एनकाउंटर STF के जवान ने किया था। केएस अनुपम का ट्रांसफर जमुई छेड़खानी कांड के करीब 20 दिन बाद किया गया। ताकि पब्लिक के बीच मैसेज अच्छा जाए। 2. सरकार से प्रशासन तक लव-कुश समीकरण चर्चा है कि सरकार से लेकर प्रशासत तक लव-कुश (कुर्मी-कोयरी) समीकरण को साधा जा रहा है। पुलिस महकमा भी इससे अछुता नहीं है। ADG लॉ एंड ऑर्डर के पोस्ट पर रत्न संजय की पोस्टिंग को कुछ लोग इसी समीकरण का हिस्सा मान रहे हैं। रत्न संजय कुर्मी समाज से आते हैं। अंदरखाने की चर्चाओं की मानें तो अगले DGP भी इसी समाज से हो सकते हैं। चर्चा है कि इसी समीकरण से DGP बनाने के लिए लिस्ट को होल्ड पर डाला गया है। सवाल-3ः हर 2 महीने पर ADG लॉ एंड ऑर्डर का तबादला, क्या संकेत देता है? जवाबः मौटे तौर पर इसके 2 बड़े संकेत हैं… 1. एडमिनिस्ट्रेटिव विजन ठीक नहीं बिहार पुलिस के पूर्व DG एसके भारद्वाज कहते हैं, ‘ADG लॉ एंड ऑर्डर महत्वपूर्ण पोस्ट है। यह DGP का राइट-लेफ्ट, दोनों हैंड होता है। कानून-व्यवस्था को बनाए रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। अपराधियों के खिलाफ ऑपरेशन, क्राइम कंट्रोल, सरेंडर, एनकाउंटर, क्लास 4 के कैडर का अप्वाइंटमेंट कराना। इनके दायरे में आता है।’ किसी भी अफसर को 2-3 महीने तो राज्य के भौगोलिक, आपराधिक और सामाजिक परिदृश्य को समझने में ही निकल जाता है। 2. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में तेजी से बड़े अफसरों के फेरबदल का सीधा मतलब निकाला जाता है कि पुलिस बल पर राजनीतिक दबाव अधिक है या फिर शासन-प्रशासन में शीर्ष स्तर पर तालमेल और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है। जब किसी अधिकारी को पर्याप्त समय ही नहीं मिलेगा, तो किसी बड़ी दंगा/हिंसा या कानून-व्यवस्था की विफलता की स्थिति में प्रशासनिक जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है। बार-बार के बेमतलब तबादलों से अफसरों का मनोबल गिरता है। अधिकारी कठोर या कड़े नीतिगत निर्णय लेने से बचने लगते हैं और ‘अस्थायी दृष्टिकोण’ अपना लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था… प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पुलिस अधिकारियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने और कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए ऑपरेशनल पोस्टों पर कम से कम 2 साल निश्चित कार्यकाल दिया जाना चाहिए। सवाल-4ः नए ADG लॉ एंड ऑर्डर रत्न संजय कौन हैं? जवाबः रत्न संजय बिहार में सुपरकॉप के रूप में फेमस हैं। उन्होंने करीब दो दशक तक सीवान में राज करने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन के आतंक के साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया था। रत्न संजय ऐसे पुलिस अधिकारी हैं, जो बाहुबलियों और माफियाओं को चुनौती देने में पीछे नहीं रहते। 2004 में एक ऐसी घटना घटी थी जो बिहार ही नहीं पूरे देश में चर्चा का विषय बनी थी। शहाबुद्दीन के घर पर छापेमारी, मिली पाकिस्तानी AK-47 बात 16 अगस्त 2004 की है। सात-आठ युवकों ने सीवान के गौशाला रोड स्थित राजीव किराना स्टोर पर धावा बोलकर कैश लूट लिया। सभी धमकी देते हुए निकले कि मुंह खोला तो बुरा अंजाम होगा। दुकान में बैठे राजीव ने विरोध किया तो उसकी पिटाई कर दी गई। खतरा देख गिरीश बाथरूम में गया और एसिड की बोतल लाकर बदमाशों को डराया कि भागो नहीं तो एसिड फेंक देंगे। सम्राट सरकार ने अपने 6 महीने के कार्यकाल में 3 ADG लॉ एंड ऑर्डर बदल दिए। यानी हर दूसरे महीने लॉ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी निभाने वाले अफसर का तबादला हुआ। CM सम्राट बार-बार ADG लॉ एंड ऑर्डर क्यों बदल रहे, चाहते क्या हैं, क्या ऐसे सुधरेगी कानून-व्यवस्था, इन्हीं सवालों को समझेंगे; बूझे की नाही में…। सवाल-1ः बार-बार ADG लॉ एंड ऑर्डर के बदलने का मामला क्या है? जवाबः 15 अप्रैल 2026 को भाजपा के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले ADG लॉ एंड ऑर्डर पोस्ट पर तीन सीनियर IPS अफसरों की तैनाती की गई है। सवाल-2: बार-बार अफसर क्यों बदले जा रहे? जवाबः आधिकारिक तौर पर अफसरों के तबादले के कारणों को नहीं बताया गया है। लेकिन सियासी और प्रशासनिक गलियारे में 2 तरह की चर्चाएं हैं। 1. सीनियर अफसर पसंद का अफसर चाहते हैं चर्चा है कि पुलिस महकमा एक सीनियर IPS अफसर के इशारे पर चल रहा है। वह सभी महत्वपूर्ण पोस्टों पर अपने पसंदीदा अफसरों की तैनाती चाहते हैं। अभी तक इस सरकार में 2 ADG लॉ एंड ऑर्डर बनाए गए थे-सुधांशु कुमार और केएस अनुपम। चर्चा है कि दोनों अफसरों की ट्यूनिंग उनसे ठीक नहीं थी। इसलिए दोनों को कम समय में जाना पड़ा। ट्रांसफर की टाइमिंग ऐसी चुनी गई, जिससे सरकार की साख भी बचे और अफसर भी हट जाए। जैसे- सुधांशु कुमार का ट्रांसफर भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर के बाद किया गया। मैसेज दिया गया कि सरकार लॉ एंड ऑर्डर पर सख्त है। जबकि, एनकाउंटर STF के जवान ने किया था। केएस अनुपम का ट्रांसफर जमुई छेड़खानी कांड के करीब 20 दिन बाद किया गया। ताकि पब्लिक के बीच मैसेज अच्छा जाए। 2. सरकार से प्रशासन तक लव-कुश समीकरण चर्चा है कि सरकार से लेकर प्रशासत तक लव-कुश (कुर्मी-कोयरी) समीकरण को साधा जा रहा है। पुलिस महकमा भी इससे अछुता नहीं है। ADG लॉ एंड ऑर्डर के पोस्ट पर रत्न संजय की पोस्टिंग को कुछ लोग इसी समीकरण का हिस्सा मान रहे हैं। रत्न संजय कुर्मी समाज से आते हैं। अंदरखाने की चर्चाओं की मानें तो अगले DGP भी इसी समाज से हो सकते हैं। चर्चा है कि इसी समीकरण से DGP बनाने के लिए लिस्ट को होल्ड पर डाला गया है। सवाल-3ः हर 2 महीने पर ADG लॉ एंड ऑर्डर का तबादला, क्या संकेत देता है? जवाबः मौटे तौर पर इसके 2 बड़े संकेत हैं… 1. एडमिनिस्ट्रेटिव विजन ठीक नहीं बिहार पुलिस के पूर्व DG एसके भारद्वाज कहते हैं, ‘ADG लॉ एंड ऑर्डर महत्वपूर्ण पोस्ट है। यह DGP का राइट-लेफ्ट, दोनों हैंड होता है। कानून-व्यवस्था को बनाए रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। अपराधियों के खिलाफ ऑपरेशन, क्राइम कंट्रोल, सरेंडर, एनकाउंटर, क्लास 4 के कैडर का अप्वाइंटमेंट कराना। इनके दायरे में आता है।’ किसी भी अफसर को 2-3 महीने तो राज्य के भौगोलिक, आपराधिक और सामाजिक परिदृश्य को समझने में ही निकल जाता है। 2. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में तेजी से बड़े अफसरों के फेरबदल का सीधा मतलब निकाला जाता है कि पुलिस बल पर राजनीतिक दबाव अधिक है या फिर शासन-प्रशासन में शीर्ष स्तर पर तालमेल और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है। जब किसी अधिकारी को पर्याप्त समय ही नहीं मिलेगा, तो किसी बड़ी दंगा/हिंसा या कानून-व्यवस्था की विफलता की स्थिति में प्रशासनिक जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है। बार-बार के बेमतलब तबादलों से अफसरों का मनोबल गिरता है। अधिकारी कठोर या कड़े नीतिगत निर्णय लेने से बचने लगते हैं और ‘अस्थायी दृष्टिकोण’ अपना लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था… प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पुलिस अधिकारियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने और कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए ऑपरेशनल पोस्टों पर कम से कम 2 साल निश्चित कार्यकाल दिया जाना चाहिए। सवाल-4ः नए ADG लॉ एंड ऑर्डर रत्न संजय कौन हैं? जवाबः रत्न संजय बिहार में सुपरकॉप के रूप में फेमस हैं। उन्होंने करीब दो दशक तक सीवान में राज करने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन के आतंक के साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया था। रत्न संजय ऐसे पुलिस अधिकारी हैं, जो बाहुबलियों और माफियाओं को चुनौती देने में पीछे नहीं रहते। 2004 में एक ऐसी घटना घटी थी जो बिहार ही नहीं पूरे देश में चर्चा का विषय बनी थी। शहाबुद्दीन के घर पर छापेमारी, मिली पाकिस्तानी AK-47 बात 16 अगस्त 2004 की है। सात-आठ युवकों ने सीवान के गौशाला रोड स्थित राजीव किराना स्टोर पर धावा बोलकर कैश लूट लिया। सभी धमकी देते हुए निकले कि मुंह खोला तो बुरा अंजाम होगा। दुकान में बैठे राजीव ने विरोध किया तो उसकी पिटाई कर दी गई। खतरा देख गिरीश बाथरूम में गया और एसिड की बोतल लाकर बदमाशों को डराया कि भागो नहीं तो एसिड फेंक देंगे।

