पाकुड़ जिले के हिरणपुर स्थित सील दुर्गा मंदिर में करीब 160 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होती आ रही है। आजादी से पहले शुरू हुई इस पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसके आयोजन के लिए किसी से चंदा नहीं लिया जाता। पूजा का पूरा खर्च मां के नाम पर मौजूद 30 से 35 बीघा जमीन से होने वाली आय से पूरा किया जाता है। मंदिर में पूजा की शुरुआत लगभग 160 वर्ष पूर्व हीरालाल शील और उनकी पत्नी सुंदरीबाला दासी ने मिट्टी के मंदिर में की थी। इसके बाद उनके चार बेटों ईश्वर चंद्र शील, महेश्वर चंद्र शील, राजकिशोर शील और गिरीश चंद्र शील ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। लंबे समय तक मां दुर्गा की पूजा मिट्टी के मंदिर में ही होती रही। बाद में वर्ष 1993 में मां की प्रतिमा को पक्के मंदिर में स्थापित किया गया। तब से आज तक इसी मंदिर में पूजा-अर्चना की जा रही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है। न डीजे का शोर, न चंदे पर निर्भरता बदलते दौर में जहां दुर्गा पूजा के दौरान भव्य सजावट और डीजे का चलन बढ़ा है, वहीं सील दुर्गा मंदिर में पारंपरिक पूजा पद्धति को प्राथमिकता दी जाती है। यहां पूजा के दौरान डीजे का इस्तेमाल नहीं होता और धार्मिक रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा का खर्च जमीन से प्राप्त आय से चलने के कारण आयोजन के लिए श्रद्धालुओं से चंदा जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती। मंदिर में दुर्गा पूजा के षष्ठी तिथि को मां की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसी दिन कलश स्थापना के साथ कलश यात्रा भी निकाली जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक विधि-विधान के तहत यहां बकरे की बलि भी चढ़ाई जाती है। मंदिर की यह विशिष्ट परंपरा इसे क्षेत्र के दूसरे पूजा आयोजनों से अलग पहचान देती है। वर्तमान में दुर्गा पूजा की तैयारियों में श्रद्धालु जुटे हुए हैं। मंदिर परिसर में आयोजन को लेकर गतिविधियां चल रही हैं। मन्नत पूरी होने की मान्यता, बंगाल से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु शील दुर्गा मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत मां दुर्गा पूरी करती हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी खुशी और श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। इसी विश्वास के कारण हर साल बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। हिरणपुर और आसपास के क्षेत्रों के अलावा पश्चिम बंगाल से भी श्रद्धालु यहां आकर पूजा करते हैं। भक्तों का मानना है कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद खाली नहीं जाती। करीब डेढ़ शताब्दी से अधिक समय से चली आ रही पूजा परंपरा ने मंदिर को क्षेत्र की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना दिया है। पाकुड़ जिले के हिरणपुर स्थित सील दुर्गा मंदिर में करीब 160 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होती आ रही है। आजादी से पहले शुरू हुई इस पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसके आयोजन के लिए किसी से चंदा नहीं लिया जाता। पूजा का पूरा खर्च मां के नाम पर मौजूद 30 से 35 बीघा जमीन से होने वाली आय से पूरा किया जाता है। मंदिर में पूजा की शुरुआत लगभग 160 वर्ष पूर्व हीरालाल शील और उनकी पत्नी सुंदरीबाला दासी ने मिट्टी के मंदिर में की थी। इसके बाद उनके चार बेटों ईश्वर चंद्र शील, महेश्वर चंद्र शील, राजकिशोर शील और गिरीश चंद्र शील ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। लंबे समय तक मां दुर्गा की पूजा मिट्टी के मंदिर में ही होती रही। बाद में वर्ष 1993 में मां की प्रतिमा को पक्के मंदिर में स्थापित किया गया। तब से आज तक इसी मंदिर में पूजा-अर्चना की जा रही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है। न डीजे का शोर, न चंदे पर निर्भरता बदलते दौर में जहां दुर्गा पूजा के दौरान भव्य सजावट और डीजे का चलन बढ़ा है, वहीं सील दुर्गा मंदिर में पारंपरिक पूजा पद्धति को प्राथमिकता दी जाती है। यहां पूजा के दौरान डीजे का इस्तेमाल नहीं होता और धार्मिक रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा का खर्च जमीन से प्राप्त आय से चलने के कारण आयोजन के लिए श्रद्धालुओं से चंदा जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती। मंदिर में दुर्गा पूजा के षष्ठी तिथि को मां की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसी दिन कलश स्थापना के साथ कलश यात्रा भी निकाली जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक विधि-विधान के तहत यहां बकरे की बलि भी चढ़ाई जाती है। मंदिर की यह विशिष्ट परंपरा इसे क्षेत्र के दूसरे पूजा आयोजनों से अलग पहचान देती है। वर्तमान में दुर्गा पूजा की तैयारियों में श्रद्धालु जुटे हुए हैं। मंदिर परिसर में आयोजन को लेकर गतिविधियां चल रही हैं। मन्नत पूरी होने की मान्यता, बंगाल से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु शील दुर्गा मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत मां दुर्गा पूरी करती हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी खुशी और श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। इसी विश्वास के कारण हर साल बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। हिरणपुर और आसपास के क्षेत्रों के अलावा पश्चिम बंगाल से भी श्रद्धालु यहां आकर पूजा करते हैं। भक्तों का मानना है कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद खाली नहीं जाती। करीब डेढ़ शताब्दी से अधिक समय से चली आ रही पूजा परंपरा ने मंदिर को क्षेत्र की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना दिया है।

