बेगूसराय के बीहट में देश का सबसे ऊंचा दुर्गा मंदिर है। सिद्धपीठ बड़की की ऊंचाई 221 फीट है। वहीं, पूरे देश में सबसे ऊंचे मंदिर में इस टेंपल की ऊंचाई तीसरे स्थान पर है। यहां पिंडी के रूप में मां की पूजा होती है। करीब 90 साल पुराने मंदिर का स्वरूप तो बदला, पर मां कि प्रतिमा हर साल नवरात्र में एक जैसी ही बैठाई जाती है। इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाता है। मंदिर से गंगा तट की दूरी करीब 2 किलोमीटर है, लेकिन मां दुर्गा की विसर्जन यात्रा में 12 घंटे लगते हैं। विसर्जन यात्रा में किसी भी प्रकार के वाहन का प्रयोग नहीं किया जाता है। मां की प्रतिमा हाथों से खींची जाने वाली विशेष चक्के वाली ठेला गाड़ी पर ले जाई जाती है। मंदिर कितना पुराना है, पुजारी ने क्या बताई खासियत, लोग कैसे करते हैं विसर्जन, क्या है मान्यता, पढ़ें रिपोर्ट… पहले मंदिर की कुछ तस्वीरें… मंदिर का इतिहास मुगल काल से जुड़ा है सिद्धपीठ बड़की दुर्गा मंदिर का इतिहास 16वीं-17वीं शताब्दी यानी मुगल काल से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक संदर्भों और बुजुर्गों की मान्यताओं के अनुसार आततायियों के दौर में जब सनातन धर्म, संस्कृति और धार्मिक धरोहरों पर संकट मंडरा रहा था, तब स्थानीय सनातनी, राजपूत और भूमिहार परिवारों ने एकजुट होकर धर्म रक्षा का संकल्प लिया और मां भगवती के पूजन-उत्सव की शुरुआत की। उस समय गंगा किनारे स्थित मल्हीपुर गांव के पास राजपूत परिवारों ने मां दुर्गा के पिंड की नींव डाली थी। लेकिन साल-दर-साल प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़ की विभीषिका और गंगा नदी के लगातार हो रहे कटाव के कारण मंदिर के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। 80-90 वर्ष पहले मल्हीपुर के लोगों के आग्रह और बीहट के ग्रामीणों की आपसी सहमति से मां दुर्गा के पूजन स्थल को बीहट के सबसे ऊंचे इलाके डीह पर स्थानांतरित किया गया। बीहट का यह क्षेत्र आसपास का सबसे ऊंचा स्थान था, जहां गंगाजी के पानी का प्रकोप नहीं रहता था। पहले झोपड़ी तैयार की गई थी, 2009 में मंदिर की नींव रखी शुरुआत में स्वर्गीय जयनाथ सिंह की देखरेख में झोपड़ी बनाकर मां दुर्गा की स्थापना की गई। इसके बाद पक्के मकान का रूप लिया और लगभग 50 वर्षों तक उसी भवन में पूजा-अर्चना चलती रही। इस मंदिर से जुड़ी सबसे खास और अलौकिक परंपरा मल्हीपुर से बीहट आगमन और गंगा नदी से जुड़ा इतिहास है। प्राचीन काल में सावन-भादों के महीने में जब गंगा नदी अपने विकराल रूप में होती थी, तो मल्हीपुर स्थित दुर्गा मंदिर के गर्भगृह तक गंगा का जल प्रवेश कर जाता था। आश्विन महीने में नवरात्र के समय पूजा-अर्चना में काफी समस्याएं आती थीं। जनश्रुतियों और मान्यताओं के अनुसार भगवती की कृपा से बहती गंगा की धार में काठ का एक विशाल सिंहासन तैरता हुआ आया, जिसे बीहट और मल्हीपुर के ग्रामीणों ने मां का संकेत माना। इसके बाद ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से बीहट के ऊंचे डीह पर मंदिर स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके बाद मंदिर बनाकर पूजा शुरू हो गया। 2009 में गांव के युवाओं और सिद्धपीठ बड़की दुर्गा मंदिर निर्माण सह पूजा समिति के उत्साह और जनसहयोग से विशालकाय मंदिर के नवनिर्माण की नींव रखी गई। पांच साल में बना 11 मंजिला मंदिर पुजारी पंकज फलाहारी बताते हैं कि 11 मंजिला भव्य मंदिर का नवनिर्माण कार्य 14 फरवरी 2009 से शुरू हुआ था और महज 5 साल के अंदर पूरा मंदिर बनकर तैयार हो गया था। इसके निर्माण में 3 करोड़ रुपए लगे थे। इसके बाद से मंदिर में स्टील गेट, रंग-रोगन, श्रृंगार और सौंदर्यीकरण का कार्य चलता आ रहा है। मंदिर के मुख्य पुजारी पंकज कुमार फलाहारी के अनुसार यदि कोई इस बात पर सवाल उठाता है कि यह दुनिया का सबसे ऊंचा दुर्गा मंदिर कैसे है, तो वह टेप और इंची टेप लाकर स्वयं इसकी नपाई कर सकता है और दुनिया भर के अन्य दुर्गा मंदिरों से इसकी तुलना कर सकता है। वर्तमान में 221 फीट ऊंचा यह सिद्धपीठ मंदिर दुनिया के सबसे ऊंचे दुर्गा मंदिर का दर्जा प्राप्त किए हुए है। पुजारी पंकज फलाहारी भावुक होकर कहते हैं कि यदि भगवती की कृपा और आशीर्वाद से देश या दुनिया में कहीं इससे भी बड़ा दुर्गा मंदिर बनता है, तो मैं स्वयं वहां जाकर सहयोग करूंगा। विसर्जन यात्रा में ठेले को 30 लोग मिलकर खींचते हैं पुजारी के अनुसार मां दुर्गा की विसर्जन यात्रा को इस 2 किलोमीटर की दूरी तय करने में पूरे 12 घंटे का समय लग जाता है। दोपहर 2 बजे शुरू होने वाली विसर्जन शोभायात्रा देर रात 2 बजे के आसपास संपन्न होती है। मंदिर से विसर्जन यात्रा शुरू होती है, फिर हमलोग 1 किमी दूर दूसरे गांव मल्हीपुर जाते हैं, फिर वहां के लोग भी यात्रा में शामिल होते हैं। वहां से गंगा की दूरी 1 किमी और है। ठेले पर मां की प्रतिमा होती है। ठेले को खींचने के लिए कम से कम 30 लोग लगते हैं। बाकी अन्य लोग भी श्रद्धा से हाथ लगाते हैं। मां के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया गया मंसूरचक निवासी मूर्तिकार गणेश पंडित बताते हैं कि मैं पिछले 35 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण कर रहा हूं। मुझसे पहले मेरे पिताजी रामजी पंडित और उनके पूर्वज ही इस प्रतिमा का निर्माण करते थे। प्रतिमा निर्माण में मिट्टी का ढांचा तैयार करने में करीब 7 दिन और पेंटिंग-श्रृंगार करने में 2 दिन यानी कुल 9 दिनों का समय लगता है। गणेश पंडित बताते हैं कि पूर्वजों के समय से जो मां का नैन-नक्श और स्वरूप चला आ रहा है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाता। बेगूसराय जिले में बड़की दुर्गा के अलावा बखरी, घटकिंडी, बरौनी, लखनपुर, भवानंदपुर और बीहट वाली माई समेत कुल नौ स्थानों पर एक ही रंग और एक ही परंपरा की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। सच्चे मन से जो मांगता है, उसकी मनोकामना पूरी होती मुकुंद कहते हैं कि मेरे पिताजी पिछले 20 वर्षों से केवल फलाहार पर रहकर मां की सेवा कर रहे हैं। आमतौर पर यदि कोई व्यक्ति एक दिन भी केवल फल खाकर रहे, तो उसका शरीर, मन और स्वास्थ्य विचलित हो जाता है और तरह-तरह की परेशानियां आने लगती हैं। लेकिन मां जगदंबा की ऐसी असीम कृपा है कि उनके पिताजी ने आज तक 20 सालों में कभी भी शरीर में थकावट या किसी भी प्रकार की परेशानी या शिकायत की बात नहीं कही। यही मां की शक्ति और भक्त की अटूट श्रद्धा का जीवंत प्रमाण है। मुकुंद बताते हैं कि नवरात्र के दौरान मंदिर में इतनी भीड़ होती है कि खड़े रहने तक की जगह नहीं मिलती और हर कोई मां के नव रूपों के दर्शन और शाम की भव्य आरती में शामिल होने के लिए लालायित रहता है। अगर कोई भी व्यक्ति सच्चे मन से मां के दरबार में श्रद्धापूर्वक कुछ मांगता है, तो उसकी मनोकामना निश्चित रूप से पूरी होती है। विदेशी भी पूजा के लिए आते हैं गुरदासपुर टोला की रहने वाली श्रद्धालु पुतुल देवी बताती हैं कि मैं पटना में रहती हूं, लेकिन नवरात्र के सभी 9 दिनों तक मंदिर में ही रहकर पाठ और पूजा-अर्चना करती हूं। सुबह 7 बजे और शाम 7 बजे होने वाली आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। नवरात्र के दौरान देश भर के कोने-कोने से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। जैसे लोग वैष्णो देवी या विंध्यवासिनी धाम दर्शन के लिए जाते हैं, वैसे ही सिद्धपीठ बड़की दुर्गा मंदिर में भी दूर-दूर से भक्त और विदेशों में रहने वाले एनआरआई भी खींचे चले आते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मां के दरबार में खोईंछा भरते हैं, विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। महाअष्टमी की रात विशेष पूजा के बाद मंदिर का पट खोला जाता है। बेगूसराय के बीहट में देश का सबसे ऊंचा दुर्गा मंदिर है। सिद्धपीठ बड़की की ऊंचाई 221 फीट है। वहीं, पूरे देश में सबसे ऊंचे मंदिर में इस टेंपल की ऊंचाई तीसरे स्थान पर है। यहां पिंडी के रूप में मां की पूजा होती है। करीब 90 साल पुराने मंदिर का स्वरूप तो बदला, पर मां कि प्रतिमा हर साल नवरात्र में एक जैसी ही बैठाई जाती है। इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाता है। मंदिर से गंगा तट की दूरी करीब 2 किलोमीटर है, लेकिन मां दुर्गा की विसर्जन यात्रा में 12 घंटे लगते हैं। विसर्जन यात्रा में किसी भी प्रकार के वाहन का प्रयोग नहीं किया जाता है। मां की प्रतिमा हाथों से खींची जाने वाली विशेष चक्के वाली ठेला गाड़ी पर ले जाई जाती है। मंदिर कितना पुराना है, पुजारी ने क्या बताई खासियत, लोग कैसे करते हैं विसर्जन, क्या है मान्यता, पढ़ें रिपोर्ट… पहले मंदिर की कुछ तस्वीरें… मंदिर का इतिहास मुगल काल से जुड़ा है सिद्धपीठ बड़की दुर्गा मंदिर का इतिहास 16वीं-17वीं शताब्दी यानी मुगल काल से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक संदर्भों और बुजुर्गों की मान्यताओं के अनुसार आततायियों के दौर में जब सनातन धर्म, संस्कृति और धार्मिक धरोहरों पर संकट मंडरा रहा था, तब स्थानीय सनातनी, राजपूत और भूमिहार परिवारों ने एकजुट होकर धर्म रक्षा का संकल्प लिया और मां भगवती के पूजन-उत्सव की शुरुआत की। उस समय गंगा किनारे स्थित मल्हीपुर गांव के पास राजपूत परिवारों ने मां दुर्गा के पिंड की नींव डाली थी। लेकिन साल-दर-साल प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़ की विभीषिका और गंगा नदी के लगातार हो रहे कटाव के कारण मंदिर के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। 80-90 वर्ष पहले मल्हीपुर के लोगों के आग्रह और बीहट के ग्रामीणों की आपसी सहमति से मां दुर्गा के पूजन स्थल को बीहट के सबसे ऊंचे इलाके डीह पर स्थानांतरित किया गया। बीहट का यह क्षेत्र आसपास का सबसे ऊंचा स्थान था, जहां गंगाजी के पानी का प्रकोप नहीं रहता था। पहले झोपड़ी तैयार की गई थी, 2009 में मंदिर की नींव रखी शुरुआत में स्वर्गीय जयनाथ सिंह की देखरेख में झोपड़ी बनाकर मां दुर्गा की स्थापना की गई। इसके बाद पक्के मकान का रूप लिया और लगभग 50 वर्षों तक उसी भवन में पूजा-अर्चना चलती रही। इस मंदिर से जुड़ी सबसे खास और अलौकिक परंपरा मल्हीपुर से बीहट आगमन और गंगा नदी से जुड़ा इतिहास है। प्राचीन काल में सावन-भादों के महीने में जब गंगा नदी अपने विकराल रूप में होती थी, तो मल्हीपुर स्थित दुर्गा मंदिर के गर्भगृह तक गंगा का जल प्रवेश कर जाता था। आश्विन महीने में नवरात्र के समय पूजा-अर्चना में काफी समस्याएं आती थीं। जनश्रुतियों और मान्यताओं के अनुसार भगवती की कृपा से बहती गंगा की धार में काठ का एक विशाल सिंहासन तैरता हुआ आया, जिसे बीहट और मल्हीपुर के ग्रामीणों ने मां का संकेत माना। इसके बाद ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से बीहट के ऊंचे डीह पर मंदिर स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके बाद मंदिर बनाकर पूजा शुरू हो गया। 2009 में गांव के युवाओं और सिद्धपीठ बड़की दुर्गा मंदिर निर्माण सह पूजा समिति के उत्साह और जनसहयोग से विशालकाय मंदिर के नवनिर्माण की नींव रखी गई। पांच साल में बना 11 मंजिला मंदिर पुजारी पंकज फलाहारी बताते हैं कि 11 मंजिला भव्य मंदिर का नवनिर्माण कार्य 14 फरवरी 2009 से शुरू हुआ था और महज 5 साल के अंदर पूरा मंदिर बनकर तैयार हो गया था। इसके निर्माण में 3 करोड़ रुपए लगे थे। इसके बाद से मंदिर में स्टील गेट, रंग-रोगन, श्रृंगार और सौंदर्यीकरण का कार्य चलता आ रहा है। मंदिर के मुख्य पुजारी पंकज कुमार फलाहारी के अनुसार यदि कोई इस बात पर सवाल उठाता है कि यह दुनिया का सबसे ऊंचा दुर्गा मंदिर कैसे है, तो वह टेप और इंची टेप लाकर स्वयं इसकी नपाई कर सकता है और दुनिया भर के अन्य दुर्गा मंदिरों से इसकी तुलना कर सकता है। वर्तमान में 221 फीट ऊंचा यह सिद्धपीठ मंदिर दुनिया के सबसे ऊंचे दुर्गा मंदिर का दर्जा प्राप्त किए हुए है। पुजारी पंकज फलाहारी भावुक होकर कहते हैं कि यदि भगवती की कृपा और आशीर्वाद से देश या दुनिया में कहीं इससे भी बड़ा दुर्गा मंदिर बनता है, तो मैं स्वयं वहां जाकर सहयोग करूंगा। विसर्जन यात्रा में ठेले को 30 लोग मिलकर खींचते हैं पुजारी के अनुसार मां दुर्गा की विसर्जन यात्रा को इस 2 किलोमीटर की दूरी तय करने में पूरे 12 घंटे का समय लग जाता है। दोपहर 2 बजे शुरू होने वाली विसर्जन शोभायात्रा देर रात 2 बजे के आसपास संपन्न होती है। मंदिर से विसर्जन यात्रा शुरू होती है, फिर हमलोग 1 किमी दूर दूसरे गांव मल्हीपुर जाते हैं, फिर वहां के लोग भी यात्रा में शामिल होते हैं। वहां से गंगा की दूरी 1 किमी और है। ठेले पर मां की प्रतिमा होती है। ठेले को खींचने के लिए कम से कम 30 लोग लगते हैं। बाकी अन्य लोग भी श्रद्धा से हाथ लगाते हैं। मां के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया गया मंसूरचक निवासी मूर्तिकार गणेश पंडित बताते हैं कि मैं पिछले 35 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण कर रहा हूं। मुझसे पहले मेरे पिताजी रामजी पंडित और उनके पूर्वज ही इस प्रतिमा का निर्माण करते थे। प्रतिमा निर्माण में मिट्टी का ढांचा तैयार करने में करीब 7 दिन और पेंटिंग-श्रृंगार करने में 2 दिन यानी कुल 9 दिनों का समय लगता है। गणेश पंडित बताते हैं कि पूर्वजों के समय से जो मां का नैन-नक्श और स्वरूप चला आ रहा है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाता। बेगूसराय जिले में बड़की दुर्गा के अलावा बखरी, घटकिंडी, बरौनी, लखनपुर, भवानंदपुर और बीहट वाली माई समेत कुल नौ स्थानों पर एक ही रंग और एक ही परंपरा की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। सच्चे मन से जो मांगता है, उसकी मनोकामना पूरी होती मुकुंद कहते हैं कि मेरे पिताजी पिछले 20 वर्षों से केवल फलाहार पर रहकर मां की सेवा कर रहे हैं। आमतौर पर यदि कोई व्यक्ति एक दिन भी केवल फल खाकर रहे, तो उसका शरीर, मन और स्वास्थ्य विचलित हो जाता है और तरह-तरह की परेशानियां आने लगती हैं। लेकिन मां जगदंबा की ऐसी असीम कृपा है कि उनके पिताजी ने आज तक 20 सालों में कभी भी शरीर में थकावट या किसी भी प्रकार की परेशानी या शिकायत की बात नहीं कही। यही मां की शक्ति और भक्त की अटूट श्रद्धा का जीवंत प्रमाण है। मुकुंद बताते हैं कि नवरात्र के दौरान मंदिर में इतनी भीड़ होती है कि खड़े रहने तक की जगह नहीं मिलती और हर कोई मां के नव रूपों के दर्शन और शाम की भव्य आरती में शामिल होने के लिए लालायित रहता है। अगर कोई भी व्यक्ति सच्चे मन से मां के दरबार में श्रद्धापूर्वक कुछ मांगता है, तो उसकी मनोकामना निश्चित रूप से पूरी होती है। विदेशी भी पूजा के लिए आते हैं गुरदासपुर टोला की रहने वाली श्रद्धालु पुतुल देवी बताती हैं कि मैं पटना में रहती हूं, लेकिन नवरात्र के सभी 9 दिनों तक मंदिर में ही रहकर पाठ और पूजा-अर्चना करती हूं। सुबह 7 बजे और शाम 7 बजे होने वाली आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। नवरात्र के दौरान देश भर के कोने-कोने से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। जैसे लोग वैष्णो देवी या विंध्यवासिनी धाम दर्शन के लिए जाते हैं, वैसे ही सिद्धपीठ बड़की दुर्गा मंदिर में भी दूर-दूर से भक्त और विदेशों में रहने वाले एनआरआई भी खींचे चले आते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मां के दरबार में खोईंछा भरते हैं, विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। महाअष्टमी की रात विशेष पूजा के बाद मंदिर का पट खोला जाता है।

