मुहूर्त नहीं निकला, मां जालपा की पाती से शादी तय:नवरात्रि में 1100 साल पुरानी मां जालपा के दर्शन, उल्टा स्वस्तिक बनाकर मांगते हैं मन्नत

मुहूर्त नहीं निकला, मां जालपा की पाती से शादी तय:नवरात्रि में 1100 साल पुरानी मां जालपा के दर्शन, उल्टा स्वस्तिक बनाकर मांगते हैं मन्नत

मध्यप्रदेश के राजगढ़ शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे-52 के पास घने जंगलों के बीच ऊंची टेकरी पर मां जालपा विराजित हैं। माता का यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं और मान्यताओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां शादी के लिए शुभ मुहूर्त नहीं निकलने पर परिवार मां के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी ज्वार या गेहूं के दानों की विशेष पद्धति से गणना कर विवाह की तारीख निकालते हैं। मंदिर में मिलने वाली इस जानकारी को ‘पाती’ कहा जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि माता के दरबार से मिली पाती के अनुसार विवाह करना शुभ होता है। मां जालपा के मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नवरात्र के दौरान यहां विशेष भीड़ उमड़ती है। राजगढ़ और आसपास के क्षेत्रों के भक्त पदयात्रा कर माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और चुनरी चढ़ाकर आशीर्वाद लेते हैं। मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों के अलावा राजस्थान और गुजरात से भी श्रद्धालु यहां आते हैं। करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़कर माता के दरबार तक पहुंचने वाले भक्तों के लिए मंदिर की आस्था और परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। ज्वार-गेहूं के दानों से निकलती है विवाह की पाती मां जालपा मंदिर की सबसे खास परंपराओं में विवाह की पाती निकालना शामिल है। कई बार परिवारों को विवाह के लिए शुभ मुहूर्त नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में वे माता के दरबार पहुंचकर पुजारी से पाती निकलवाते हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार, माता के चरणों में अर्पित ज्वार या गेहूं के दानों की विशेष तरीके से गणना की जाती है। इसी गणना के आधार पर विवाह का दिन तय किया जाता है। मुहूर्त निकलने के बाद पुजारी एक विशेष प्रपत्र पर विवाह की तारीख और उससे जुड़ी जानकारी लिखकर परिवार को देते हैं। इसे पाती या लग्नपत्री कहा जाता है। परिवार इसी के आधार पर विवाह की तैयारी करते हैं। मंदिर की मान्यता के अनुसार, यह पाती परिवार के लिए शुभ मुहूर्त मानी जाती है। यही वजह है कि विवाह का समय तय करने में परेशानी आने पर भी लोग मां जालपा के दरबार पहुंचते हैं। इस परंपरा में विवाह के बाद भी माता के प्रति श्रद्धा जताने का विधान है। शादी संपन्न होने के बाद नवदंपती दोबारा मंदिर पहुंचते हैं। वे विवाह के लिए मिली पाती माता के चरणों में अर्पित करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। इस तरह पाती निकलवाने से लेकर विवाह के बाद माता के दर्शन करने तक की परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल तारीख तय करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि माता के प्रति आस्था और विश्वास से जुड़ी परंपरा है। 1100 साल पुरानी प्रतिमा, भक्त ज्वालानाथ की तपस्या से जुड़ी मान्यता मंदिर में स्थापित मां जालपा की प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि यह करीब 1100 साल पुरानी है। प्रचलित कथा के अनुसार, भक्त ज्वालानाथ ने यहां तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें दर्शन दिए। इसके बाद यहां पीपल के पेड़ के नीचे माता की प्रतिमा मिलने की बात कही जाती है। बाद में जालपा पहाड़ी पर पत्थर से निर्मित सिंह पर सवार माता की प्रतिमा को चबूतरे पर स्थापित किया गया। मंदिर की प्रतिमा और उसके प्रकट होने से जुड़ी यह मान्यता पीढ़ियों से श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है। माता के दर्शन के लिए आने वाले भक्त प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। नवरात्र के दिनों में विशेष पूजा और दर्शन के लिए यहां भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। आसपास के क्षेत्रों के लोग भी माता के दर्शन को अपनी धार्मिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं। मंदिर की देखरेख को लेकर भी समय के साथ व्यवस्था बदलती रही है। पुरानी जानकारी के अनुसार, प्रतिमा की स्थापना के बाद मंदिर की देखरेख राजगढ़ स्टेट के उमठवंशीय राजाओं के जिम्मे रही। बाद में प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में मंदिर की देखरेख ट्रस्ट करता है। मंदिर से जुड़ी पुरानी मान्यताओं और परंपराओं के कारण यह स्थान राजगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। दिन में बनता था मंदिर, रात में गिर जाता था मां जालपा मंदिर से जुड़ी एक और प्रचलित कथा मंदिर निर्माण को लेकर है। मान्यता के अनुसार, पहले भील राजाओं ने माता को अपनी कुलदेवी मानकर यहां मंदिर बनवाने का प्रयास किया था। दिन में मंदिर का निर्माण कराया जाता, लेकिन रात में निर्माण गिर जाने की बात कही जाती है। इसके बाद राजपूत राजाओं के समय भी मंदिर निर्माण को लेकर ऐसी ही कथा प्रचलित रही। कहानी के अनुसार, कई प्रयासों के बाद भी मंदिर निर्माण नहीं हो सका। बाद में जनसहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया। यह कथा मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं का हिस्सा है और लंबे समय से लोगों के बीच सुनाई जाती रही है। हालांकि, इस कथा को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना के बजाय प्रचलित मान्यता के रूप में ही देखा जाता है। मंदिर की सेवा परंपरा भी पुरानी है। मंदिर के सेवक विष्णुनाथ पंडा के अनुसार, उनका परिवार 11 पीढ़ियों से माता की सेवा करता आ रहा है। आज भी भीलवंशीय परिवार की पीढ़ियां माता की सेवा से जुड़ी हैं। इस परंपरा के चलते मंदिर में पूजा-अर्चना और सेवा का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। माता के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की प्राचीनता के साथ यह सेवा परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। उल्टा सातिया बनाकर मांगते हैं मनोकामना मां जालपा मंदिर में मनोकामना मांगने की एक अलग परंपरा भी है। श्रद्धालु अपनी मुराद पूरी होने की कामना के साथ मंदिर परिसर में उल्टा स्वास्तिक यानी सातिया बनाते हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर वे दोबारा माता के दरबार में पहुंचते हैं और गोबर से सीधा सातिया बनाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में ऐसे सातिये दिखाई देते हैं। श्रद्धालु इन्हें अपनी मनोकामना और माता से जुड़े विश्वास के प्रतीक के रूप में बनाते हैं। मन्नत पूरी होने पर कई भक्त माता का विशेष श्रृंगार करवाते हैं, भंडारा कराते हैं और दान-पुण्य करते हैं। इस तरह माता के प्रति आभार जताने के लिए अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं। मंदिर में बने उल्टे और सीधे सातिये श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी इस परंपरा को दर्शाते हैं। यहां आने वाले भक्त पूजा-अर्चना के साथ अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद दोबारा मंदिर पहुंचकर सातिया बनाने की परंपरा के कारण मंदिर परिसर में ऐसे निशान बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह माता के प्रति श्रद्धा जताने का एक तरीका है। नवरात्र में पदयात्रा कर चुनरी चढ़ाते हैं भक्त मां जालपा मंदिर में सामान्य दिनों में भी श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्र में यहां भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है। राजगढ़ और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पदयात्रा कर माता के दर्शन के लिए आते हैं। भक्त चुनरी चढ़ाते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में दर्शन करने आने वालों में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ दूसरे जिलों और राज्यों के लोग भी शामिल रहते हैं। मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान और गुजरात से भी श्रद्धालु मां जालपा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर की प्रसिद्धि का एक कारण विवाह की पाती निकालने की परंपरा है, तो दूसरा कारण प्रतिमा और मंदिर से जुड़ी पुरानी मान्यताएं हैं। मनोकामना के लिए उल्टा सातिया बनाने और पूरी होने पर सीधा सातिया बनाने की परंपरा भी भक्तों को आकर्षित करती है। नवरात्र के दौरान राजगढ़ और आसपास के इलाकों में माता के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालु पदयात्रा को विशेष महत्व देते हैं। भक्त माता के दरबार तक पहुंचकर चुनरी चढ़ाते हैं और पूजा करते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं। सालभर चलने वाली पूजा-अर्चना और सेवा परंपरा नवरात्र में और अधिक दिखाई देती है। सड़क और सीढ़ियों से पहुंच सकते हैं मंदिर मां जालपा का मंदिर राजगढ़ शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे-52 के पास स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग के साथ सीढ़ियों का रास्ता भी है। टेकरी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। घने जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर आसपास के क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मंदिर की सुरक्षा के लिए यहां पुलिस चौकी भी स्थापित है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से मंदिर और पहुंच मार्ग पर लोगों की आवाजाही अधिक रहती है। मंदिर की देखरेख ट्रस्ट के जिम्मे है। श्रद्धालु यहां दर्शन, पूजा-अर्चना और मनोकामना के लिए पहुंचते हैं। मां जालपा मंदिर की पहचान केवल इसकी प्राचीन प्रतिमा या नवरात्र में जुटने वाली भीड़ तक सीमित नहीं है। विवाह के लिए पाती निकलवाने की परंपरा, उल्टा और सीधा सातिया बनाने की मान्यता, मंदिर निर्माण की प्रचलित कथा और 11 पीढ़ियों से चली आ रही सेवा परंपरा इसे विशिष्ट बनाती हैं। यही वजह है कि राजगढ़ के साथ-साथ दूसरे जिलों और राज्यों से भी श्रद्धालु माता के दरबार में पहुंचते हैं। संबंधित खबर भी पढ़ें… देवास में तुलजा भवानी के 3 स्वरूप में दर्शन; चामुंडा को मीठे भजिए का भोग देवास के टेकरी मंदिर में यूं तो सालभर भीड़ रहती है, लेकिन नवरात्रि में भक्तों की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। मां तुलजा भवानी और चामुंडा के इस दरबार में कोई सुख-समृद्धि, तो कोई संतान की कामना लेकर आता है। लोगों का कहना है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना मां जरूर स्वीकार करती हैं। पूरी खबर पढ़ें

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