गयाजी में इन दिनों पितृपक्ष मेला चल रहा है। गुरुवार को पितृपक्ष की त्रयोदशी पर देवघाट पर पितृ दिवाली मनाई गई। शाम होते ही फल्गु नदी का देवघाट हजारों दीपों की रोशनी से जगमगा उठा। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों के नाम दीप जलाकर उन्हें श्रद्धा से याद किया। माना जाता है कि पितृपक्ष की त्रयोदशी पर पितरों के नाम दीप जलाने का खास महत्व है। यह दीप उनके मार्ग को रोशन और आसान बनाने का प्रतीक है। इसी आस्था के साथ श्रद्धालुओं ने देवघाट पर दीपदान किया और अपने पितरों की शांति व मोक्ष की कामना की। छत्तीसगढ़ के कोरबा से आईं एक श्रद्धालु ने बताया कि उनका परिवार 24 सितंबर से गयाजी में पिंडदान कर रहा है। उन्होंने पितृ दिवाली पर परिवार के साथ दीप जलाए। परिवार ने तय विधि-विधान से 21 पीढ़ियों के पितरों का पिंडदान किया। श्रद्धालु ने कहा कि गयाजी आकर उन्हें शांति मिली। पितरों के साथ पशु-पक्षियों को भी किया स्मरण मुरादाबाद से आई महिला तीर्थ यात्री सृष्टि सिंह राठौड़ ने बताई कि वे अपने परिवार के साथ पितरों के निमित्त गयाजी आए हैं। उन्होंने कहा कि पितृ दिवाली के अवसर पर पंडितजी के बताए अनुसार पितरों के नाम दीपदान किया गया। उनके परिवार ने अपने कुल के पितरों के साथ उन पशु-पक्षियों और जीवों को भी स्मरण किया, जो कभी परिवार का हिस्सा रहे या जिनसे परिवार का जुड़ाव रहा। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के अनुसार पितरों के लिए जो कुछ किया जा सकता है, वह करना चाहिए. माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, परदादा और परनाना सहित सभी पूर्वजों को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही इस पूरे कर्मकांड का मूल भाव है। 17 दिन का कार्यक्रम पूरा कर ओडिशा के श्रद्धालुओं ने जलाए दीप ओडिशा के भुवनेश्वर से आए रंजू देवी ने बताई कि उनका परिवार करीब 17 दिनों के कार्यक्रम के तहत गयाजी आया है। पितरों के निमित्त विभिन्न कर्मकांड और पिंडदान करने के बाद त्रयोदशी पर देवघाट में दीप जलाया। उन्होंने कहा कि यहां की व्यवस्था देखकर वे काफी खुश हैं और प्रशासन की ओर से उन्हें सहयोग मिला।
उन्होंने कहा कि देवघाट पर जब दीप जलाए तो ऐसा महसूस हुआ कि आज वास्तविक दीपावली ही है। चारों ओर जलते दीप, फल्गु नदी का तट और श्रद्धालुओं की आस्था ने माहौल को बेहद भावुक और आध्यात्मिक बना दिया। एक दीप दूर करता है अंधकार गयापाल पंडा रंजीत शास्त्री ने बताया कि पितृपक्ष की त्रयोदशी पर पितरों के नाम दीप जलाने की विशेष धार्मिक मान्यता है। उन्होंने कहा कि जीवन में जिस प्रकार अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पूर्वजों की स्मृति और उनकी कृपा को जीवन में प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। पितृ कृपा का प्रतीक है दीपदान माता-पिता के बाद पूर्वजों का स्थान महत्वपूर्ण माना गया है और उनकी कृपा परिवार पर बनी रहे, इसी कामना से पितृ दीपावली पर दीपदान किया जाता है। उन्होंने बताया कि गयाजी की विशेषता यह है कि यहां आने वाला श्रद्धालु अपने पूर्वजों से जुड़ने और उनके निमित्त कर्म करने का अवसर प्राप्त करता है। पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और तर्पण के साथ त्रयोदशी का दीपदान भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का विषय है। प्रशासन की व्यवस्था की श्रद्धालुओं ने की सराहना छत्तीसगढ़ से आये तीर्थ यात्री गयाजी में प्रशासन की व्यवस्था की भी जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इतने दिनों तक यहां रहने के दौरान उन्हें कहीं भी अभद्र व्यवहार या बड़ी अव्यवस्था का सामना नहीं करना पड़ा। सफाई, आवागमन और अन्य व्यवस्थाएं अच्छी रहीं। उन्होंने प्रशासन का धन्यवाद करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने के बावजूद व्यवस्था संभालना बड़ी जिम्मेदारी है और उन्हें यहां प्रशासन का अच्छा सहयोग मिला। पितरों की स्मृति में रोशन हुआ देवघाट गुरुवार की शाम देवघाट पर पितृ दिवाली के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। किसी ने अपने माता-पिता के नाम दीप जलाया तो किसी ने दादा-दादी और अन्य पूर्वजों को याद किया। परिवार के लोग एक साथ दीप जलाते और पितरों की शांति एवं मोक्ष की कामना करते नजर आए। पितृपक्ष मेला महासंगम-2026 के बीच देवघाट पर मनाई गई पितृ दिवाली ने गयाजी की सदियों पुरानी पितृ परंपरा को जीवंत कर दिया। हजारों दीपों से जगमगाता फल्गु तट इस बात का साक्षी बना कि गयाजी में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पितृपक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति प्रेम, श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़ने का अवसर भी है। गयाजी में इन दिनों पितृपक्ष मेला चल रहा है। गुरुवार को पितृपक्ष की त्रयोदशी पर देवघाट पर पितृ दिवाली मनाई गई। शाम होते ही फल्गु नदी का देवघाट हजारों दीपों की रोशनी से जगमगा उठा। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों के नाम दीप जलाकर उन्हें श्रद्धा से याद किया। माना जाता है कि पितृपक्ष की त्रयोदशी पर पितरों के नाम दीप जलाने का खास महत्व है। यह दीप उनके मार्ग को रोशन और आसान बनाने का प्रतीक है। इसी आस्था के साथ श्रद्धालुओं ने देवघाट पर दीपदान किया और अपने पितरों की शांति व मोक्ष की कामना की। छत्तीसगढ़ के कोरबा से आईं एक श्रद्धालु ने बताया कि उनका परिवार 24 सितंबर से गयाजी में पिंडदान कर रहा है। उन्होंने पितृ दिवाली पर परिवार के साथ दीप जलाए। परिवार ने तय विधि-विधान से 21 पीढ़ियों के पितरों का पिंडदान किया। श्रद्धालु ने कहा कि गयाजी आकर उन्हें शांति मिली। पितरों के साथ पशु-पक्षियों को भी किया स्मरण मुरादाबाद से आई महिला तीर्थ यात्री सृष्टि सिंह राठौड़ ने बताई कि वे अपने परिवार के साथ पितरों के निमित्त गयाजी आए हैं। उन्होंने कहा कि पितृ दिवाली के अवसर पर पंडितजी के बताए अनुसार पितरों के नाम दीपदान किया गया। उनके परिवार ने अपने कुल के पितरों के साथ उन पशु-पक्षियों और जीवों को भी स्मरण किया, जो कभी परिवार का हिस्सा रहे या जिनसे परिवार का जुड़ाव रहा। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के अनुसार पितरों के लिए जो कुछ किया जा सकता है, वह करना चाहिए. माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, परदादा और परनाना सहित सभी पूर्वजों को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही इस पूरे कर्मकांड का मूल भाव है। 17 दिन का कार्यक्रम पूरा कर ओडिशा के श्रद्धालुओं ने जलाए दीप ओडिशा के भुवनेश्वर से आए रंजू देवी ने बताई कि उनका परिवार करीब 17 दिनों के कार्यक्रम के तहत गयाजी आया है। पितरों के निमित्त विभिन्न कर्मकांड और पिंडदान करने के बाद त्रयोदशी पर देवघाट में दीप जलाया। उन्होंने कहा कि यहां की व्यवस्था देखकर वे काफी खुश हैं और प्रशासन की ओर से उन्हें सहयोग मिला।
उन्होंने कहा कि देवघाट पर जब दीप जलाए तो ऐसा महसूस हुआ कि आज वास्तविक दीपावली ही है। चारों ओर जलते दीप, फल्गु नदी का तट और श्रद्धालुओं की आस्था ने माहौल को बेहद भावुक और आध्यात्मिक बना दिया। एक दीप दूर करता है अंधकार गयापाल पंडा रंजीत शास्त्री ने बताया कि पितृपक्ष की त्रयोदशी पर पितरों के नाम दीप जलाने की विशेष धार्मिक मान्यता है। उन्होंने कहा कि जीवन में जिस प्रकार अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पूर्वजों की स्मृति और उनकी कृपा को जीवन में प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। पितृ कृपा का प्रतीक है दीपदान माता-पिता के बाद पूर्वजों का स्थान महत्वपूर्ण माना गया है और उनकी कृपा परिवार पर बनी रहे, इसी कामना से पितृ दीपावली पर दीपदान किया जाता है। उन्होंने बताया कि गयाजी की विशेषता यह है कि यहां आने वाला श्रद्धालु अपने पूर्वजों से जुड़ने और उनके निमित्त कर्म करने का अवसर प्राप्त करता है। पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और तर्पण के साथ त्रयोदशी का दीपदान भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का विषय है। प्रशासन की व्यवस्था की श्रद्धालुओं ने की सराहना छत्तीसगढ़ से आये तीर्थ यात्री गयाजी में प्रशासन की व्यवस्था की भी जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इतने दिनों तक यहां रहने के दौरान उन्हें कहीं भी अभद्र व्यवहार या बड़ी अव्यवस्था का सामना नहीं करना पड़ा। सफाई, आवागमन और अन्य व्यवस्थाएं अच्छी रहीं। उन्होंने प्रशासन का धन्यवाद करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने के बावजूद व्यवस्था संभालना बड़ी जिम्मेदारी है और उन्हें यहां प्रशासन का अच्छा सहयोग मिला। पितरों की स्मृति में रोशन हुआ देवघाट गुरुवार की शाम देवघाट पर पितृ दिवाली के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। किसी ने अपने माता-पिता के नाम दीप जलाया तो किसी ने दादा-दादी और अन्य पूर्वजों को याद किया। परिवार के लोग एक साथ दीप जलाते और पितरों की शांति एवं मोक्ष की कामना करते नजर आए। पितृपक्ष मेला महासंगम-2026 के बीच देवघाट पर मनाई गई पितृ दिवाली ने गयाजी की सदियों पुरानी पितृ परंपरा को जीवंत कर दिया। हजारों दीपों से जगमगाता फल्गु तट इस बात का साक्षी बना कि गयाजी में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पितृपक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति प्रेम, श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़ने का अवसर भी है।

