Kiara Advani Second Pregnancy: कियारा आडवाणी फिर से हैं प्रेग्नेंट, WHO और NCBI से जानें पहली डिलीवरी के बाद दोबारा प्रेग्नेंट होने में कितना गैप होना चाहिए

Kiara Advani Second Pregnancy: कियारा आडवाणी फिर से हैं प्रेग्नेंट, WHO और NCBI से जानें पहली डिलीवरी के बाद दोबारा प्रेग्नेंट होने में कितना गैप होना चाहिए

Kiara Advani Second Pregnancy: बॉलीवुड की चर्चित जोड़ी कियारा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने एक बार फिर फैंस के साथ खुशखबरी शेयर की है। कपल जल्द ही अपने दूसरे बच्चे का स्वागत करने वाला है। गौरतलब है कि कियारा ने पिछले साल (2025) ही अपनी बेटी को जन्म दिया था। इस खबर के सामने आते ही जहां फैंस खुश हैं, वहीं हेल्थ एक्सपर्ट्स और आम लोगों के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि पहली डिलीवरी के इतने कम समय के भीतर (Back-to-Back Pregnancy) दोबारा कंसीव करने का मां और बच्चे की सेहत पर क्या असर पड़ता है। मेडिकल साइंस में दो प्रेग्नेंसी के बीच के समय को ‘इंटर-प्रेग्नेंसी इंटरवल’ (Inter-pregnancy Interval – IPI) कहा जाता है।

WHO के अनुसार दो बच्चों के बीच कितना गैप होना चाहिए?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और NCBI के अनुसार, एक डिलीवरी के बाद दूसरी प्रेग्नेंसी के बीच कम से कम 18 से 24 महीनों का अंतर होना सही माना जाता है। आइए जानते हैं कि इतने कम अंतर में दोबारा कंसीव करने से महिला के शरीर और आने वाले बच्चे पर क्या स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं। गाइनकोलॉजिस्ट डॉ सीमा गोयल के मुताबिक, “दो प्रेग्नेंसी के बीच कम से कम 1.5 से 2 साल का अंतर (गैप) होना चाहिए, लेकिन सेलिब्रिटीज के मामले में उनकी हेल्थ कंडीशन बहुत अच्छी होती है, इसलिए उन्हें कोई खास परेशानी नहीं होती है। आम महिलाओं या सामान्य लोगों में खून की कमी (एनीमिया) या कमजोरी देखने को मिल सकती है।”

1. पोषक तत्वों की कमी (Maternal Depletion Syndrome)

महिला के शरीर को नौ महीने की प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के दौरान बहुत ज्यादा शारीरिक और पोषण संबंधी बदलावों से गुजरना पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान शरीर से फॉलिक एसिड, आयरन, कैल्शियम और अन्य जरूरी विटामिन्स की बड़ी खपत होती है। यदि पहला बच्चा होने के तुरंत बाद महिला दोबारा प्रेग्नेंट हो जाती है, तो शरीर को पुराने न्यूट्रिएंट्स की भरपाई करने का मौका नहीं मिल पाता। इसे डॉक्टरों की भाषा में ‘मेटरनल डिप्लीशन सिंड्रोम’ कहते हैं। इसके कारण मां में गंभीर एनीमिया (खून की कमी), कमजोरी और हड्डियों का कमजोर होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

2. समय से पहले डिलीवरी (Preterm Birth) का खतरा

Frontiers in Medicine में प्रकाशित रिसर्च में यह सामने आया है कि यदि दो प्रेग्नेंसी के बीच 6 से 12 महीने से कम का अंतर हो, तो दूसरी डिलीवरी समय से पहले यानी प्री-टर्म (Preterm Birth) होने की संभावना बढ़ जाती है। गर्भाशय (Uterus) और सर्विक्स को पूरी तरह से रिकवर होने का समय न मिलने के कारण यह खतरा बढ़ जाता है।

3. बच्चे का वजन कम होना (Low Birth Weight)

दो बच्चों के जन्म के बीच बहुत कम समय होने पर दूसरे बच्चे का जन्म के समय वजन कम (Low Birth Weight) रहने या गर्भ में बच्चे का विकास धीमा होने (Intrauterine Growth Restriction) की आशंका रहती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्लेसेंटा (Placenta) को मां के शरीर से पर्याप्त मात्रा में पोषण और ऑक्सीजन नहीं मिल पाता।

4. सिजेरियन (C-Section) के मामलों में गर्भाशय फटने का जोखिम

यदि किसी महिला की पहली डिलीवरी सिजेरियन (C-section) से हुई हो, तो डॉक्टरों की सख्त हिदायत होती है कि कम से कम 1.5 से 2 साल तक दोबारा कंसीव न करें। सिजेरियन के दौरान गर्भाशय पर जो टांके (Surgical Scars) आते हैं, उन्हें पूरी तरह से भरने और मजबूत होने में समय लगता है। अगर टांके पूरी तरह भरने से पहले ही पेट में दोबारा बच्चा बढ़ने लगे, तो गर्भाशय के फटने (Uterine Rupture) का गंभीर जोखिम बन जाता है, जो मां और बच्चे दोनों के लिए जानलेवा हो सकता है।

5. मानसिक और शारीरिक थकान (Postpartum Stress and Exhaustion)

पहला बच्चा अभी बहुत छोटा होता है और उसे 24 घंटे देखभाल, स्तनपान (Breastfeeding) और ध्यान की जरूरत होती है। नई प्रेग्नेंसी के शुरुआती लक्षणों जैसे उल्टी, मॉर्निंग सिकनेस, चक्कर आना और कमजोरी के साथ छोटे बच्चे को संभालना महिला के लिए अत्यधिक थकाऊ हो जाता है। इससे मां में नींद की कमी, तनाव और डिलीवरी के बाद होने वाले डिप्रेशन (Postpartum Depression) का खतरा बढ़ जाता है।

पहली डिलीवरी के 15 महीने बाद दोबारा प्रेग्नेंट कियारा आडवाणी, जानें डॉक्टरों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई महिला बैक-टू-बैक प्रेग्नेंट हो जाती है, तो उसे घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन बेहद सावधानी और नियमित डॉक्टर की देखरेख आवश्यक होती है;

  • स्पेशल डाइट और सप्लीमेंट्स।
  • समय-समय पर अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट करवाएं।
  • पर्याप्त आराम और सपोर्ट।

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