पूसा में डिजिटल खेती का रोडमैप तैयार होगा:150 से ज्यादा विशेषज्ञ जुटे; छोटे किसानों की लागत घटाने और डिजिटल बाजार से जोड़ने पर जोर

पूसा में डिजिटल खेती का रोडमैप तैयार होगा:150 से ज्यादा विशेषज्ञ जुटे; छोटे किसानों की लागत घटाने और डिजिटल बाजार से जोड़ने पर जोर

खेती अब सिर्फ हल, ट्रैक्टर और मौसम के भरोसे नहीं रहने वाली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), GIS और बिग डेटा जैसी तकनीकें खेती का तरीक बदलेंगी। इसी बदलाव को जमीन तक पहुंचाने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला सोमवार शाम से शुरू हुई है। विद्यापति सभागार में आयोजित इस कार्यशाला में ‘विकसित भारत @2047 के लिए डिजिटल कृषि का रणनीतिक रोडमैप’ तैयार करने पर मंथन हो रहा है। देशभर से आए 150 से अधिक कृषि वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, एग्री-स्टार्टअप प्रतिनिधि और छात्र इसमें हिस्सा ले रहे हैं। कुलपति बोले- डिजिटल कृषि अब विकल्प नहीं, जरूरत कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे आरपीसीएयू के कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि कृषि में डिजिटल क्रांति का समय आ चुका है। विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए खेती को स्मार्ट, टिकाऊ और तकनीक आधारित बनाना जरूरी है। AI, IoT, ड्रोन, GIS और बिग डेटा जैसी तकनीकों को ‘लैब टू लैंड’ के जरिए सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाना होगा। इससे खेती की लागत कम करने, उत्पादन बढ़ाने और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। डॉ. पांडेय ने कहा कि डिजिटल कृषि को बढ़ावा देते समय डिजिटल डिवाइड को खत्म करना भी जरूरी है। तकनीक का लाभ ग्रामीण और छोटे किसानों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना होगा। छोटे किसानों को डिजिटल बाजार से जोड़ने की तैयारी कार्यशाला में इस बात पर खास जोर दिया जा रहा है कि तकनीक केवल बड़े किसानों तक सीमित न रहे। AI आधारित सलाह, ड्रोन से फसल निगरानी, डेटा आधारित खेती और डिजिटल बाजार जैसी सुविधाओं को छोटे एवं सीमांत किसानों तक पहुंचाने की रणनीति पर चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही डेटा के इस्तेमाल से किसान फसल, सिंचाई, खाद और कीटनाशक के इस्तेमाल को अधिक सटीक तरीके से तय कर सकेंगे। इससे संसाधनों की बचत के साथ खेती की लागत कम करने में मदद मिल सकती है। पूर्णिया विवि के कुलपति ने आरपीसीएयू की सराहना की कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्णिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विवेकानंद सिंह ने कृषि में डिजिटल नवाचार को ग्रामीण भारत के आर्थिक विकास के लिए समय की जरूरत बताया। उन्होंने पूर्वी भारत में डिजिटल कृषि को बढ़ावा देने के लिए डॉ. पांडेय के नेतृत्व की सराहना की। प्रो. सिंह ने आरपीसीएयू की शिक्षा और अनुसंधान गतिविधियों को अन्य विश्वविद्यालयों के लिए प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि यहां की कई कार्यप्रणालियों को वे अपने विश्वविद्यालय में भी लागू करने का प्रयास करेंगे। जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी डिजिटल तकनीक कारगर अभियंत्रण महाविद्यालय के डीन डॉ. आर. सुबैया ने कहा कि कृषि विज्ञान और डिजिटल तकनीक को साथ लाकर किसानों की जमीनी समस्याओं का समाधान तलाशना होगा। अनुसंधान निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने डेटा आधारित खेती और सटीक कृषि को भविष्य की जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों के बीच तकनीक आधारित खेती किसानों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इन 4 क्षेत्रों पर हो रहा मंथन दो दिवसीय कार्यशाला में डिजिटल कृषि के चार प्रमुख क्षेत्रों पर विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं। 1. जलवायु अनुकूल खेती मौसम और जलवायु जोखिम के बीच बेहतर कृषि प्रबंधन। 2. संसाधन और फसल प्रबंधन पानी, खाद, बीज और अन्य संसाधनों का तकनीक आधारित बेहतर इस्तेमाल। 3. बागवानी उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार से जोड़ने के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल। 4. कृषि व्यवसाय और डिजिटल मार्ग किसानों को डिजिटल बाजार, एग्री-बिजनेस और नई तकनीकी सेवाओं से जोड़ना। कार्यशाला के संयोजक डॉ. एस.के. पटेल ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। डॉ. विशाल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया, जबकि मंच संचालन डॉ. श्रेया गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में कुलसचिव डॉ. पी.के. प्रणव, डीन फिशरीज डॉ. पी.पी. श्रीवास्तव, निदेशक एग्री-बिजनेस डॉ. रामदत्त, विश्वविद्यालय पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. राकेश मणि शर्मा, डॉ. महेश कुमार, डॉ. कुमार राज्यवर्धन, डॉ. आर. किरण, डॉ. रमनदीप सिंह समेत बड़ी संख्या में शिक्षक, वैज्ञानिक और पदाधिकारी मौजूद रहे। खेती अब सिर्फ हल, ट्रैक्टर और मौसम के भरोसे नहीं रहने वाली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), GIS और बिग डेटा जैसी तकनीकें खेती का तरीक बदलेंगी। इसी बदलाव को जमीन तक पहुंचाने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला सोमवार शाम से शुरू हुई है। विद्यापति सभागार में आयोजित इस कार्यशाला में ‘विकसित भारत @2047 के लिए डिजिटल कृषि का रणनीतिक रोडमैप’ तैयार करने पर मंथन हो रहा है। देशभर से आए 150 से अधिक कृषि वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, एग्री-स्टार्टअप प्रतिनिधि और छात्र इसमें हिस्सा ले रहे हैं। कुलपति बोले- डिजिटल कृषि अब विकल्प नहीं, जरूरत कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे आरपीसीएयू के कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि कृषि में डिजिटल क्रांति का समय आ चुका है। विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए खेती को स्मार्ट, टिकाऊ और तकनीक आधारित बनाना जरूरी है। AI, IoT, ड्रोन, GIS और बिग डेटा जैसी तकनीकों को ‘लैब टू लैंड’ के जरिए सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाना होगा। इससे खेती की लागत कम करने, उत्पादन बढ़ाने और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। डॉ. पांडेय ने कहा कि डिजिटल कृषि को बढ़ावा देते समय डिजिटल डिवाइड को खत्म करना भी जरूरी है। तकनीक का लाभ ग्रामीण और छोटे किसानों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना होगा। छोटे किसानों को डिजिटल बाजार से जोड़ने की तैयारी कार्यशाला में इस बात पर खास जोर दिया जा रहा है कि तकनीक केवल बड़े किसानों तक सीमित न रहे। AI आधारित सलाह, ड्रोन से फसल निगरानी, डेटा आधारित खेती और डिजिटल बाजार जैसी सुविधाओं को छोटे एवं सीमांत किसानों तक पहुंचाने की रणनीति पर चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही डेटा के इस्तेमाल से किसान फसल, सिंचाई, खाद और कीटनाशक के इस्तेमाल को अधिक सटीक तरीके से तय कर सकेंगे। इससे संसाधनों की बचत के साथ खेती की लागत कम करने में मदद मिल सकती है। पूर्णिया विवि के कुलपति ने आरपीसीएयू की सराहना की कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्णिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विवेकानंद सिंह ने कृषि में डिजिटल नवाचार को ग्रामीण भारत के आर्थिक विकास के लिए समय की जरूरत बताया। उन्होंने पूर्वी भारत में डिजिटल कृषि को बढ़ावा देने के लिए डॉ. पांडेय के नेतृत्व की सराहना की। प्रो. सिंह ने आरपीसीएयू की शिक्षा और अनुसंधान गतिविधियों को अन्य विश्वविद्यालयों के लिए प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि यहां की कई कार्यप्रणालियों को वे अपने विश्वविद्यालय में भी लागू करने का प्रयास करेंगे। जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी डिजिटल तकनीक कारगर अभियंत्रण महाविद्यालय के डीन डॉ. आर. सुबैया ने कहा कि कृषि विज्ञान और डिजिटल तकनीक को साथ लाकर किसानों की जमीनी समस्याओं का समाधान तलाशना होगा। अनुसंधान निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने डेटा आधारित खेती और सटीक कृषि को भविष्य की जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों के बीच तकनीक आधारित खेती किसानों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इन 4 क्षेत्रों पर हो रहा मंथन दो दिवसीय कार्यशाला में डिजिटल कृषि के चार प्रमुख क्षेत्रों पर विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं। 1. जलवायु अनुकूल खेती मौसम और जलवायु जोखिम के बीच बेहतर कृषि प्रबंधन। 2. संसाधन और फसल प्रबंधन पानी, खाद, बीज और अन्य संसाधनों का तकनीक आधारित बेहतर इस्तेमाल। 3. बागवानी उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार से जोड़ने के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल। 4. कृषि व्यवसाय और डिजिटल मार्ग किसानों को डिजिटल बाजार, एग्री-बिजनेस और नई तकनीकी सेवाओं से जोड़ना। कार्यशाला के संयोजक डॉ. एस.के. पटेल ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। डॉ. विशाल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया, जबकि मंच संचालन डॉ. श्रेया गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में कुलसचिव डॉ. पी.के. प्रणव, डीन फिशरीज डॉ. पी.पी. श्रीवास्तव, निदेशक एग्री-बिजनेस डॉ. रामदत्त, विश्वविद्यालय पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. राकेश मणि शर्मा, डॉ. महेश कुमार, डॉ. कुमार राज्यवर्धन, डॉ. आर. किरण, डॉ. रमनदीप सिंह समेत बड़ी संख्या में शिक्षक, वैज्ञानिक और पदाधिकारी मौजूद रहे।  

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