केजीएमयू के प्रोफेसर अशीष वाखलू को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने उनकी सेवा समाप्ति समेत अलग-अलग मामलों को लेकर दाखिल सभी रिट याचिकाओं के साथ अवमानना याचिका भी खारिज कर दी। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने सभी मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने अपने फैसले में प्रोफेसर वाखलू के मुकदमेबाजी के तरीके पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट के अनुसार, उन्होंने अपने खिलाफ लगाए गए मूल आरोपों और मुख्य सवालों का सामना करने के बजाय विभिन्न प्रक्रियाओं का सहारा लेकर न्यायिक प्रक्रिया को विफल करने का प्रयास किया। पीठ ने उनके इस आचरण को दुर्भावनापूर्ण माना। वित्तीय अनियमितताओं पर हुई थी कार्रवाई अवमानना याचिका पर कोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियों में अवमानना का कोई आधार नहीं बनता। अंतरिम आदेश को वापस लेने और याचिका को निष्प्रभावी मानकर खारिज करने के लिए आवेदन पहले ही दाखिल किए जा चुके थे, लेकिन उन पर फैसला नहीं हो पाया था। ऐसे में अवमानना की कार्रवाई का प्रश्न नहीं उठता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाला असाधारण न्यायिक उपचार प्रक्रियात्मक त्रुटियों को आधार बनाकर न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए नहीं है। यह अधिकार उन लोगों के लिए है, जो अपने वैधानिक या मौलिक अधिकारों के वास्तविक उल्लंघन की शिकायत लेकर अदालत पहुंचते हैं। केजीएमयू ने प्रो. वाखलू को 10 जून 2020 को विभागीय जांच के बाद सेवा से हटा दिया था। उन पर वित्तीय अनियमितता, वित्तीय एवं प्रशासनिक ईमानदारी के मानकों का पालन नहीं करने और धन के गबन से जुड़े आरोप थे।

