SIR मतदाता सूची से बाहर हुए लोग मुश्किल में, Bombay High Court ने Election Commission को घेरा

SIR मतदाता सूची से बाहर हुए लोग मुश्किल में, Bombay High Court ने Election Commission को घेरा

पणजी, पांच अक्टूबर मुंबई उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि एसआईआर के तहत तैयार की गई मसौदा मतदाता सूची से जो मतदाता बाहर रह गए हैं, वे एक ‘‘मुश्किल स्थिति’’ में फंस गए हैं, क्योंकि निर्वाचन आयोग पुरानी मतदाता सूचियों का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने कहा कि जब किसी मतदाता को निर्वाचन आयोग से नोटिस मिलता है, तो वह आयोग के समक्ष कहता है कि उसने अपना घर बदल लिया है और वह प्रपत्र-8 (घर बदलने/मौजूदा मतदाता सूची में जानकारी ठीक करने/मतदाता पहचान पत्र कार्ड बदलने के लिए आवेदन) जमा करेगा। पीठ ने एसआईआर के मुद्दे पर अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी को दोहराया कि निर्वाचन आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि सभी भारतीय नागरिक अंतिम मतदाता सूची में शामिल किये जाएं।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘आप उससे यह नहीं कह सकते कि मैं आपकी बात नहीं सुनूंगा, क्योंकि व्यवस्था इसकी इजाजत नहीं देता या आपका नाम मसौदा मतदाता सूची में नहीं है।’’
न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मतदाता सूची से कोई भी पात्र मतदाता बाहर नहीं होना चाहिए। पीठ ने यह टिप्पणी गोवा के रहने वाले परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए की। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान इन लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर रह गए थे।

न्यायाधीशों ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21 में जिस सूची का जिक्र है, वह वर्तमान में उपलब्ध सूची है, न कि मसौदा सूची। पीठ ने कहा, ‘‘वर्तमान मतदाता सूची के अनुरूप सब कुछ देखा जाना चाहिए, अन्यथा मतदाता के पास कोई उपाय नहीं है। यह उसके लिए पूरी तरह से मुश्किल वाली स्थिति है।’’
अदालत ने कहा कि मसौदा मतदाता सूची से किसी मतदाता का नाम हटाने का मतलब है कि आयोग ‘‘असल में उसे मौजूदा मतदाता सूची से प्रभावी रूप से हटा रहा है।’’
न्यायाधीशों ने कहा कि बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) की जिम्मेदारियों के अलावा, आदेश के पैरा-5 (एसआईआर से संबंधित) में दिये गए निर्देश के अनुसार, किसी भी नागरिक को सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर आप आदेश का पैरा-8 पढ़ें, तो उसमें कहा गया है कि आयोग की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि मतदाता सूची में केवल वही लोग शामिल हों, जो नागरिक हैं।’’
पीठ ने सवाल किया, ‘‘अगर इस प्रक्रिया से नागरिकों को (मतदाता सूची से) बाहर कर दिया जाता है, तो हम यह विषय कैसे उठाएं?’’
आयोग की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने कहा कि आयोग के दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एक पुरानी मतदाता सूची है, जो अब भी लागू है। सुनवाई के दौरान, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची से किसी को भी बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। न्यायाधीश ने कहा कि इन सभी बातों को दिशानिर्देशों में दिए गए निर्देशों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

अदालत ने कहा, ‘‘इन निर्देशों से पता चलता है कि अगर कोई मतदाता पात्र है, तो उसे (सूची से) बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।’’
वकील अग्नि ने दलील दी कि जब कोई व्यक्ति एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में जाता है, तो उसके पास फॉर्म-8 के साथ अपने मतदाता फोटो पहचान कार्ड (ईपीआईसी) को मौजूदा क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए आवेदन करने का विकल्प होता है। अदालत मंगलवार को भी मामले में दलीलें सुनना जारी रखेगी। सालगांवकर और उनके परिवार की याचिका के अनुसार, वे उत्तरी गोवा जिले के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र में ही एक नये घर में रहने चले गए थे और बीएलओ ने उन्हें पता बदलने के लिए फॉर्म-8 जमा करने का निर्देश दिया था।

इस प्रक्रिया के दौरान गड़बड़ियां सामने आईं और उनके ईपीआईसी का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला, जिसके कारण उनका फॉर्म-8 खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।

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