शरीर ही ब्रह्माण्ड: स्त्री – अन्न और मन

शरीर ही ब्रह्माण्ड: स्त्री – अन्न और मन

हमारी यह कहावत ‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन’ 24 कैरेट सोने जैसी खरी है। अन्न और मन दोनों का अधिष्ठाता चन्द्रमा ही है। जैसे अन्न की अनेक श्रेणियां हैं, वैसे ही मन के स्वरूप भी होते हैं। हमारे अध्यात्म के चार अंग हैं- शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। सबका अपना-अपना अन्न होता है। अन्न सौम्य होता है जिसकी भोक्ता अग्नि में आहुति होती है। इसी प्रक्रिया का नाम यज्ञ है। प्रत्येक यज्ञ से नया निर्माण होता है। पंचाग्नि का सिद्धांत यज्ञ प्रक्रिया का विस्तार समझाता है। आकाश से वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी भी यज्ञ से ही बनते हैं। ‘यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ के अनुसार अध्यात्म और सृष्टि के कार्यों के सिद्धान्त एक जैसे ही होते हैं।

सोम की आहुति से (अग्नि में) आठवें स्तर पर नया निर्माण नई सृष्टि होती है। जैसे जल से बुदबुद् फेन आदि से हिरण्य का निर्माण होता है। शुक्र से बिन्दु फेन-कलल शिशु शरीर पैदा होता है। बीज से पृथ्वी में भी अंकुरादि आठवें स्तर पर फल लगता है। अन्न की जब वैश्वानर में आहुति लगती है, तब रस बनता है। रक्त-मांसादि धातुएं निर्मित होती हैं। अन्त में सातवीं धातु शुक्र बनता है।

अर्द्धनारीश्वर के सिद्धान्त के अनुसार पुरुष बाहर आग्नेय है, भीतर सौम्य है। स्त्री बाहर सौम्या है, भीतर आग्नेय है। स्त्री जब पुरुष में आहुत होती है, तब भी निर्माण आठवें स्तर पर ही होगा। सर्वप्रथम तो सोम अग्नि में जलकर स्वयं अग्नि बन जाता है। फिर अन्न की तरह आठ ही स्तरों पर शरीर, मन, बुद्धि का निर्माण होगा। अन्त में भीतर सोम में समाहित हो जाएगी। अन्नमय प्राणमय मनोमय कोशों का निर्माण करेगी। पुरुष के भीतरी सोम की पूर्ति करेगी।

तब पुरुष के भीतर का (शुक्र) सोम, स्त्री के भीतर शोणिताग्नि में आहुत होगा। पुनः आठवें स्तर पर शिशु रूप लेगा। शरीर पंचकोशीय वस्तु है। आकृति के साथ प्रकृति और अहंकृति भी बनती है। गीता में जो अष्टधा अपरा प्रकृति है, उसी का निर्माण होता है-

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्त्रा प्रकृतिरष्टधा ॥ (7.4)

रसात्मक मन का निर्माण होता है। स्त्री-पुरुष दोनों के मन चन्द्रमा के सोम से बनते हैं। दोनों श्रद्धा सूत्र में एकाकार होकर आनन्द को उपलब्ध होते हैं। अन्न के भीतर ब्रह्म रहता है। इसमें देव और असुर प्राण दोनों साथ ही रहते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों के मन में जैसे विचार रहते हैं, वैसा ही अन्न का स्वरूप हो जाता है। वैसा ही नए मन का निर्माण होता है। वैसा ही सन्तान का मन बनता है। हम सब सूर्य की सन्तानें हैं। देव असुर प्राण भी यहीं से उत्पन्न होते हैं। अन्न में भी दोनों साथ रहते हैं। जिस प्राण की प्रबलता रहती है, वैसा ही मन बन जाता है।

सोम ही अन्न है। भृगु का विरल रूप सोम है। भृगु में शर्करा और स्नेहन रहते हैं। दोनों ही शुक्र के प्रधान घटक भी हैं। सोम में भी इनका अंश रहता है। स्त्री सौम्या है। उसका स्नेहन आकर्षण का कारण बनता है। वाणी का माधुर्य बन्धन कारक होता है। रूप चक्षुओं द्वारा मन में कामना पैदा करता है। यही इन्द्रिय मन रूप को सर्वेन्द्रिय मन तक भेजता है जहां से बुद्धि निर्णय करती है। रूप के साथ गुण (प्रकृति) भी प्रभाव के हेतु बनते हैं। चूंकि स्त्री विवाह संकल्पित हो जाती है, समर्पित हो जाती है, उसका ब्रह्मांश पति के ब्रह्मांश से युक्त हो जाता है, अतः वह पति के सम्पूर्ण शरीर में भावात्मक विचरण कर सकती है। वहां महन्मन में कामना उसका स्वागत करने को उतावली है। स्त्री का प्रथम लक्ष्य ब्रह्म का विवर्त – वंश वृद्धि – होता है।

पुरुष शरीर में उसका आत्मा सर्वत्र व्याप्त रहता है। उसके गुण-वर्ण-पित्रांश उसके वीर्य में प्रतिष्ठित रहते हैं। उसके रूप आकृति – के अंश प्रत्येक अंग से एकत्र करके मंथन प्रक्रिया से अपने शरीर में लेकर शोणिताग्नि में आहुत करती है। स्वयं का तथा पति का ब्रह्मांश अपने मायाभाव से आवरित करके लाती है। अतः वह अंश अग्नि में सुरक्षित रहकर स्त्री भ्रूण तक पहुंच जाता है। इसी में शुक्राणु का पुंभ्रूण रहता है जो स्त्री-भ्रूण से युक्त होकर बिन्दु भाव धारण करता है। इस प्रकार स्त्री भी पुरुषाग्नि में आहुत होकर आठवें स्तर पर वाक् रूप ले लेती है।

स्त्री की आहुति सम्पूर्ण अध्यात्म की होती है। शरीर-मन-बुद्धि और आत्मा चारों धरातल पुरुष के अध्यात्म में आहुत होते हैं। इनमें पिछले जन्मों के कर्म फल भी रहते हैं, जिन्हें दोनों को सुख- दुःख के रूप में भोगना है। स्त्री के संकल्प में पति का निर्माण, शिशु के पूर्ण अध्यात्म का निर्माण, संस्कार देना, पति को वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम से गुजारते हुए मोक्ष साक्षी बनाने (निवृत्ति) तक के कर्म शामिल रहते हैं। पुरुष पोषण सुरक्षा सम्मान का धारक होता है। जीवन मूलतः स्त्री ही संचालित करती है। उसका अन्तर्ज्ञान, परोक्ष भाव तथा बहुमुखी कर्म की क्षमता जैसे गुण दिव्यता के ही प्रतीक हैं।

पुरुष भीतर स्त्री है, निर्बल है। उसका वह स्त्रैण अंश दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि स्वयं पुरुष भी उसका पोषण नहीं करता। माता-पिता भी उसके पौरुष भाग का ही पोषण करते हैं। यह कार्य पत्नी ही पूरा करती है, यदि पुरुष सहयोग करे तो। वरना, पुरुष पूरी उम्र अधूरा मानव बनकर ही जीता है। पूर्णता के लिए पौरुष और स्त्रैण दोनों भावों की समन्वयात्मक पूर्णता अनिवार्य है। यह मन का क्षेत्र है। प्रेम से ही सींचा जा सकता है। स्त्री तो नीति में भी चतुर होती है। अतः श्रद्धा-स्नेह-वात्सल्य-प्रेम जैसे नीतिगत मार्गों से पुरुष का निर्माण करती रहती है। आखिर पुरुष उसके सपने की मूर्ति होता है ना।

कई बार पुरुष अहंकारवश स्त्री की नहीं सुनता। तब उसके निर्माण का परोक्ष मार्ग चुनती है। परिवर्तन पुरुष के मन में ही लाना है। मन का निर्माण अन्न से होता है। स्त्री का अन्न से गहरा नाता है। आज खाना बनाना श्रम साध्य-बेगार माना जाता है। अन्न को ब्रह्म न मानकर पेट भरने का साधन मान लिया। अन्न में ब्रह्मांश प्रवाहित रहता है, जीव रूप शरीर में पहुंचता है। यह सिद्धान्त रसोइये के हवाले हो गया। अलग-अलग प्रकार के भोजन के रूप में अन्न भी शरीर के लिए विदेशी होता जा रहा है।

अन्न में पृथ्वी-अन्तरिक्ष-द्यौ के गुणों के अलावा परमेष्ठी का अमृत तत्त्व भी आता है। ये ही जीवन के आधार भी हैं। स्त्री अन्न के साथ अपनी भाव-क्रिया (माया भाव) भी जोड़कर पति तक रूपान्तरण के सन्देश पहुंचाती जाती है, जो पति के हृदय पटल को छूकर मानस परिवर्तन करते जाते हैं। यह वही प्रक्रिया है जिससे मां गर्भस्थ शिशु को संस्कारित करती है। केवल स्पन्दन ही सारे बाधक पार कर सकते हैं। दाम्पत्य भाव में पत्नी आठवें स्तर पर पति के आत्मा के साथ ब्रह्म में लीन हो जाती हैं। यही वैवाहिक जीवन का परम लक्ष्य होता है जिसमें पत्नी की भूमिका सर्वोपरि रहती है।

क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com

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