बार-बार बीमार पड़ने की बात, जांच में नहीं मिलती बीमारी? क्लीवलैंड क्लिनिक से जानें क्या होता है Factitious Disorder

बार-बार बीमार पड़ने की बात, जांच में नहीं मिलती बीमारी? क्लीवलैंड क्लिनिक से जानें क्या होता है Factitious Disorder

Factitious Disorder Cause: क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जो बार-बार खुद को बीमार बताता रहता है, अस्पताल के चक्कर लगाता है, लेकिन डॉक्टर जब भी सारे ब्लड टेस्ट या स्कैन करवाते हैं, तो रिपोर्ट बिल्कुल नॉर्मल आती है? कई बार तो ऐसे लोग बीमार दिखने के लिए झूठे लक्षण गढ़ते हैं या खुद को चोट तक पहुंचा लेते हैं। अक्सर लोग इसे सिर्फ नाटक करना या ध्यान खींचने की नौटंकी मानकर डांट देते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस के अनुसार, यह कोई साधारण नाटक नहीं बल्कि एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसे फैक्टिशियस डिसऑर्डर (Factitious Disorder) कहा जाता है। आइए समझें कि फैक्टिशियस डिसऑर्डर क्या है, यह क्यों होता है और इसके मुख्य लक्षण क्या हैं।

फैक्टिशियस डिसऑर्डर (Factitious Disorder) क्या होता है?

मेयो क्लिनिक के अनुसार, फैक्टिशियस डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक बीमारी (Mental Health Condition) है, जिसमें व्यक्ति जानबूझकर बीमार होने या चोटिल होने का नाटक करता है। वह खुद में बीमारियों के लक्षण पैदा करता है या शारीरिक व मानसिक बीमारियों का झूठा दावा करता है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का मुख्य मकसद कोई आर्थिक फायदा पाना या जिम्मेदारी से भागना नहीं होता, बल्कि वह मरीज की भूमिका (Patient Role) में रहना चाहता है। उन्हें डॉक्टरों, नर्सों और परिजनों से सहानुभूति, देखभाल और ध्यान (Attention) पाने की एक अदम्य चाहत होती है। इसे पहले मंचहौसेन सिंड्रोम (Munchausen Syndrome) के नाम से भी जाना जाता था।

इसके दो मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?

क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, यह डिसऑर्डर मुख्य रूप से दो रूपों में देखा जाता है;

  • फैक्टिशियस डिसऑर्डर इम्पोज़्ड ऑन सेल्फ (Factitious Disorder Imposed on Self)।
  • फैक्टिशियस डिसऑर्डर इम्पोज़्ड ऑन अनदर (Munchausen Syndrome by Proxy)।

इसके मुख्य लक्षण और पहचान क्या हैं?

फैैक्टिशियस डिसऑर्डर से जूझ रहे लोग बीमारियों के बारे में बहुत ज्यादा पढ़ाई कर लेते हैं, इसलिए वे डॉक्टरों को आसानी से उलझा देते हैं। इसके मुख्य लक्षणों में शामिल हैं;

  • नाटकीय लेकिन उलझाने वाले लक्षण।
  • जांच रिपोर्ट और लक्षणों में अंतर।
  • कई डॉक्टरों और अस्पतालों में जाना।
  • मेडिकल जानकारी का भंडार।
  • जांच और सर्जरी कराने के लिए उत्सुक रहना।
  • लक्षणों को खुद पैदा करना।

यह मलिंगरिंग (Malingering) से कैसे अलग है?

अक्सर लोग फैैक्टिशियस डिसऑर्डर और ‘मलिंगरिंग’ को एक ही समझ लेते हैं। मलिंगरिंग (Malingering) में इंसान किसी साफ और सीधे फायदे के लिए बीमारी का नाटक करता है जैसे ऑफिस से छुट्टी लेना, इंश्योरेंस के पैसे ऐंठना, कोर्ट-कचहरी की सजा से बचना या नौकरी से भागना। फैैक्टिशियस डिसऑर्डर में कोई बाहरी या आर्थिक फायदा नहीं होता। मरीज का दिमाग अंदर से इतना बीमार होता है कि उसे सिर्फ मरीज बनकर दूसरों की सहानुभूति और ध्यान चाहिए होता है।

यह मानसिक बीमारी क्यों होती है?

  • बचपन का आघात या ट्रॉमा (Childhood Trauma)।
  • बचपन में गंभीर बीमारी होना।
  • पर्सनालिटी डिसऑर्डर।
  • अकेलापन और कम आत्मसम्मान।

फैैक्टिशियस डिसऑर्डर के इलाज के तरीके

  • साइकोथेरेपी (Psychotherapy)।
  • परिवार की काउंसिलिंग।
  • मरीज डिप्रेशन या एंग्जाइटी से जूझ रहा है, तो डॉक्टर एंटी-डिप्रेशन दवाएं दे सकते हैं।

कब सतर्क होना जरूरी है?

अगर आपके परिवार या पहचान में कोई व्यक्ति बार-बार अजीब बीमारियों के लक्षण बताता है, रिपोर्ट नॉर्मल आने के बावजूद अस्पताल बदलने की जिद करता है या खुद को नुकसान पहुँचाता है, तो उसे गुस्सा करने या डांटने के बजाय किसी अच्छे मनोचिकित्सक (Psychiatrist) के पास ले जाएं। यह कोई नौटंकी नहीं बल्कि मन की एक गहरी बीमारी है, जिसे सही काउंसलिंग और प्यार से ही ठीक किया जा सकता है।

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