इस्लामाबाद की जमीन पर भारत की मौजूदगी ने पाकिस्तान के लिए एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण तस्वीर पेश की है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार भारतीय विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान पहुंचा और शंघाई सहयोग संगठन यानि एससीओ की राष्ट्रीय समन्वयक बैठक में हिस्सा लिया। लेकिन इस यात्रा की सबसे ज्यादा चर्चा उस समय हुई, जब भारत के एससीओ राष्ट्रीय समन्वयक आलोक डिमरी ने पाकिस्तान के सरकारी टेलीविजन से बातचीत में कहा कि वह इस्लामाबाद के अलावा लाहौर, फैसलाबाद और सियालकोट भी देखना चाहते हैं। हालांकि डिमरी ने यह बात एससीओ की विभिन्न शहरों में होने वाली गतिविधियों और लाहौर को एससीओ का सांस्कृतिक शहर बनाए जाने के संदर्भ में कही, लेकिन इस बयान ने पाकिस्तान में हलचल जरूर पैदा कर दी है। वहां के टीवी चैनलों पर इस बात के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कोई इसे सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार बता रहा है, तो कोई इसे भारत की सोची-समझी कूटनीतिक चाल के तौर पर देख रहा है। असल बात यह है कि भारत ने पाकिस्तान की धरती पर रहते हुए भी यह दिखा दिया है कि वह दबाव में नहीं है। वह आतंकवाद के मुद्दे पर अपना कड़ा रुख कायम रखते हुए पाकिस्तान के ही मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकता है और जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान के दूसरे शहरों तक भी अपनी कूटनीतिक पहुंच बना सकता है।
खास बात यह है कि आलोक डिमरी का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और पाकिस्तान के रिश्ते आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर बेहद तनावपूर्ण हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए। भारत लगातार यह रुख रखता रहा है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संवाद साथ-साथ नहीं चल सकते। इसके बावजूद एससीओ जैसे बहुपक्षीय मंच पर भारत ने अपनी भागीदारी जारी रखी है।
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आलोक डिमरी की मौजूदगी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले पाकिस्तान की अध्यक्षता में हुई कुछ बैठकों में भारत का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत निचले स्तर पर रहा था। इस बार वरिष्ठ अधिकारी की अगुवाई में प्रतिनिधिमंडल का इस्लामाबाद पहुंचना बताता है कि भारत बहुपक्षीय मंचों पर अपने हितों और संदेशों को सीधे रखने से पीछे नहीं हट रहा। यहीं इस यात्रा का सामरिक महत्व सामने आता है। एससीओ में भारत, पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान, बेलारूस और मध्य एशिया के चार देश शामिल हैं। संगठन का एक प्रमुख क्षेत्रीय एजेंडा आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद से मुकाबला भी है। ऐसे मंच पर पाकिस्तान की मेजबानी में भारत की मौजूदगी उसे केवल पाकिस्तान से बातचीत का अवसर नहीं देती, बल्कि पूरे यूरेशियाई समूह के सामने भी अपनी प्राथमिकताएं रखने का अवसर देती है।
डिमरी ने क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और पारगमन को एससीओ के महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सभ्यतागत संवाद मंच के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया। उनका संदेश था कि एससीओ एशिया के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाला पुल बन सकता है। देखा जाये तो इस घटनाक्रम का दूसरा रणनीतिक पहलू पाकिस्तान की आगामी भूमिका है। पाकिस्तान 2026-27 में एससीओ की अध्यक्षता कर रहा है और अगस्त 2027 में इस्लामाबाद में राष्ट्राध्यक्षों का शिखर सम्मेलन प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित किया जाना है, हालांकि भारत ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह किस स्तर पर प्रतिनिधित्व करेगा।
बहरहाल, भारत ने पाकिस्तान की धरती पर बैठकर यह संदेश जरूर दिया कि आतंकवाद के मुद्दे पर उसका रुख बदला नहीं है, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर पाकिस्तान को उसके ही क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जवाब देने से भी वह पीछे नहीं हटेगा। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा रणनीतिक संदेश है।

