कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति की प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद का मामला उठाते हुए दावा किया कि सीईसी ने प्रजातंत्र पर प्राणघातक हमला किया है। कांग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा मोना और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभय दुबे ने पत्रकारों से बातचीत में सीईसी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाये। कांग्रेस नेताओं ने उच्चतम न्यायालय के दो मार्च, 2023 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस फैसले में कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सलाह पर करेंगे तथा इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) होंगे।
यह व्यवस्था तब तक लागू रहनी थी, जब तक संसद इस पर कानून न बना दे। कांग्रेस नेताओं ने बताया,‘‘सरकार का नया कानून दिसंबर 2023 में आया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 लाया गया।
इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधान न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया।’’
मिश्रा और दुबे ने कहा कि इस कानून के तहत पहली नियुक्तियां 14 मार्च 2024 को हुईं, जब ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू चुनाव आयुक्त बने। उन्होंने ज्ञानेश कुमार की सीईसी नियुक्ति और राहुल गांधी के असहमति नोट का जिक्र किया।
नेताओं ने कहा कि चयन समिति की बैठक 17 फरवरी 2025 को हुई और उसी रात ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति की अधिसूचना जारी हुई एवं उन्होंने 19 फरवरी 2025 को पदभार संभाला। उन्होंने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने असहमति नोट दर्ज किया और 18 फरवरी 2025 को उसे सार्वजनिक किया। दुबे ने बताया कि गांधी की मुख्य आपत्तियों में यह भी शामिल था कि सीजेआई को चयन समिति से हटाना उच्चतम न्यायालय के 2023 के फैसले की भावना के विपरीत है।
उन्होंने नियमों में तमाम विसंगतियों का उदाहरण दिया। कांग्रेस विधायक दल की नेता और प्रवक्ता ने कहा कि नियमों के अनुसार आयोग का सारा कामकाज, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से होगा, राय अलग होने पर मामला बहुमत की राय से तय होगा। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि असहमति की स्थिति में तीन सदस्यीय आयोग में 2-1 का बहुमत मान्य होता है क्योंकि सीईसी को केवल पद के आधार पर कोई अलग निर्णायक या सर्वोपरि मत देने का प्रावधान नहीं है।
नेताओं ने सवाल उठाते हुए दावा किया कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं जिनमें चार आपत्तियां एक ही दिन की थीं। उन्होंने कहा कि मई से अगस्त 2026 तक तीन सदस्यीय आयोग की कोई बैठक नहीं हुई। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह सवाल गंभीर है कि यदि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में दो चुनाव आयुक्त लगातार लिखित रूप से महत्वपूर्ण निर्णयों पर आपत्ति दर्ज कर रहे थे, तो उन आपत्तियों का निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
नेताओं ने एसआईआर प्रक्रिया में तमाम विसंगतियों का दावा करते हुए कहा कि आज का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि निर्वाचन आयोग के पास एसआईआर कराने की शक्ति है या नहीं। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि मतदाता सूची जैसे लोकतंत्र के मूल आधार से जुड़े निर्णय कितनी पारदर्शिता, वैधानिक प्रक्रिया और संस्थागत सहमति के साथ लिए जा रहे हैं।

