पूर्णिया जिले में अनंत चतुर्दशी आस्था और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। जिले के प्रमुख मंदिरों और पूजा पंडालों में वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और हरिनाम की गूंज सुनाई देती रही। सुबह से ही शहर के प्रसिद्ध माता स्थान मंदिर, लाइन बाजार स्थित शिव मंदिर और पंचमुखी हनुमान मंदिर सहित विभिन्न देवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रही। भगवान श्री हरि विष्णु के अनंत रूप की पूजा के लिए पंडितों और आचार्यों द्वारा विधि-विधान से संकल्प कराया गया। पूजन स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा और अनंत देव के अनंत डोरा को स्थापित कर विधि विधान से पूजा अर्चना की गई । इसके बाद आरती के दौरान बजते ढोल-नगाड़ों और शंख की ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। प्रसाद वितरण और श्रद्धालुओं में उत्साह इस अवसर पर विभिन्न देवालयों में प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया। प्रसाद के रूप में पंचामृत, खीर, फल और भुने हुए अनाज का भोग भक्तों में वितरित किया गया। प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों में खासा उत्साह और अटूट श्रद्धा देखने को मिली। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी भगवान का प्रसाद ग्रहण करने के लिए उत्साहित नजर आए ।
अनंत चतुर्दशी की पौराणिक एवं धार्मिक विशेषताएं जानकार बताते हैं कि अनंत चतुर्दशी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु की अनन्त शक्ति और अनुकंपा को स्मरण करने का पावन अवसर है। इस पर्व की एक अलग ही विशेषता है । इस दिन धारण किया जाने वाला रेशमी या सूती अनंत डोरा विशेष महत्व रखता है। इसमें लगाई जाने वाली 14 गांठें भगवान विष्णु द्वारा निर्मित 14 लोकों भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यः, अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल का प्रतीक मानी जाती हैं। पांडवों ने भी रखा था व्रत पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वन-वन भटक रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर युधिष्ठिर ने अपने परिजनों के साथ अनंत चतुर्दशी का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से पांडवों को उनका खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ था। गणेश विसर्जन का दिन भी होता है मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी का दिन गणेशोत्सव का अंतिम दिन भी होता है। दस दिनों तक चले गणेश जन्मोत्सव के बाद इसी दिन भक्त गाजे-बाजे के साथ गणेश भगवान की प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उत्साह पूर्णिया शहर के मुख्य क्षेत्रों के साथ-साथ धमदाहा, बनमनखी, कसबा और बायसी जैसे अनुमंडलीय व ग्रामीण क्षेत्रों के मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति दर्ज की गई। दूर-दराज के गांवों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने पवित्र जलाशयों में स्नान कर मंदिरों में जलाभिषेक किया और अनंत सूत्र धारण किया। सुरक्षा के चाक चौबंद इंतजाम सुरक्षा व्यवस्था और विधि-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियों के स्वयंसेवकों ने मुस्तैदी से अपनी सेवाएं दीं। श्रद्धालुओं के सुगम दर्शन-पूजन के लिए बैरिकेडिंग और कतारबद्ध प्रवेश की व्यवस्था की गई थी। पूर्णिया जिले में अनंत चतुर्दशी आस्था और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। जिले के प्रमुख मंदिरों और पूजा पंडालों में वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और हरिनाम की गूंज सुनाई देती रही। सुबह से ही शहर के प्रसिद्ध माता स्थान मंदिर, लाइन बाजार स्थित शिव मंदिर और पंचमुखी हनुमान मंदिर सहित विभिन्न देवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रही। भगवान श्री हरि विष्णु के अनंत रूप की पूजा के लिए पंडितों और आचार्यों द्वारा विधि-विधान से संकल्प कराया गया। पूजन स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा और अनंत देव के अनंत डोरा को स्थापित कर विधि विधान से पूजा अर्चना की गई । इसके बाद आरती के दौरान बजते ढोल-नगाड़ों और शंख की ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। प्रसाद वितरण और श्रद्धालुओं में उत्साह इस अवसर पर विभिन्न देवालयों में प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया। प्रसाद के रूप में पंचामृत, खीर, फल और भुने हुए अनाज का भोग भक्तों में वितरित किया गया। प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों में खासा उत्साह और अटूट श्रद्धा देखने को मिली। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी भगवान का प्रसाद ग्रहण करने के लिए उत्साहित नजर आए ।
अनंत चतुर्दशी की पौराणिक एवं धार्मिक विशेषताएं जानकार बताते हैं कि अनंत चतुर्दशी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु की अनन्त शक्ति और अनुकंपा को स्मरण करने का पावन अवसर है। इस पर्व की एक अलग ही विशेषता है । इस दिन धारण किया जाने वाला रेशमी या सूती अनंत डोरा विशेष महत्व रखता है। इसमें लगाई जाने वाली 14 गांठें भगवान विष्णु द्वारा निर्मित 14 लोकों भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यः, अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल का प्रतीक मानी जाती हैं। पांडवों ने भी रखा था व्रत पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वन-वन भटक रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर युधिष्ठिर ने अपने परिजनों के साथ अनंत चतुर्दशी का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से पांडवों को उनका खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ था। गणेश विसर्जन का दिन भी होता है मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी का दिन गणेशोत्सव का अंतिम दिन भी होता है। दस दिनों तक चले गणेश जन्मोत्सव के बाद इसी दिन भक्त गाजे-बाजे के साथ गणेश भगवान की प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उत्साह पूर्णिया शहर के मुख्य क्षेत्रों के साथ-साथ धमदाहा, बनमनखी, कसबा और बायसी जैसे अनुमंडलीय व ग्रामीण क्षेत्रों के मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति दर्ज की गई। दूर-दराज के गांवों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने पवित्र जलाशयों में स्नान कर मंदिरों में जलाभिषेक किया और अनंत सूत्र धारण किया। सुरक्षा के चाक चौबंद इंतजाम सुरक्षा व्यवस्था और विधि-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियों के स्वयंसेवकों ने मुस्तैदी से अपनी सेवाएं दीं। श्रद्धालुओं के सुगम दर्शन-पूजन के लिए बैरिकेडिंग और कतारबद्ध प्रवेश की व्यवस्था की गई थी।

