इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में नियमित नियुक्तियों की जगह संविदा और तदर्थ व्यवस्था के बढ़ते चलन पर कड़ी नाराजगी जताई है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने श्रीनिवासन गांधी की याचिका की सुनवाई की और राज्य सरकार को “उत्तर प्रदेश नर्सिंग कॉलेज शिक्षक सेवा नियमावली, 2026 (प्रारूप)” को प्राथमिकता पर मंजूरी देकर तत्काल अधिसूचित करने का अंतरिम आदेश दिया। कोर्ट ने क्या कहा जानिये महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण के हलफनामे को कोर्ट ने “दयनीय स्थिति” बताया। हलफनामे के अनुलग्नक-3 के अनुसार प्रदेश में 500 से अधिक पद संविदा पर हैं और केवल 2 से 3 प्रतिशत पद नियमित हैं। प्राचार्यों की सूची में भी करीब 25 प्रतिशत पदों पर कार्यवाहक प्राचार्य तैनात हैं। कोर्ट के माँगे जाने के बावजूद विभागाध्यक्षों का ब्योरा नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि नियमावली के लिए सरकार से केवल मार्गदर्शन माँगने से लगता है कि सरकार और विभाग के स्तर पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई है और गंभीर प्रयास नहीं हुए। कोर्ट ने 15.अप्रैल 2022 के शासनादेश का उल्लेख किया, जिसके अनुसार संविदा नियुक्ति तीन साल से अधिक नहीं चल सकती। कोर्ट ने कहा कि अस्थायी व्यवस्था को अनिश्चित काल तक खींचना न्याय के हित में नहीं है और इससे संविदा कर्मियों के शोषण की आशंका रहती है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें ऐसी प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना गया है। महानिदेशक से मांगा हलफनामा कोर्ट ने महानिदेशक से अगली सुनवाई पर नया व्यक्तिगत हलफनामा माँगा है, जिसमें ये बातें बतानी होंगी:- प्रोफेसर न होने से एसोसिएट/असिस्टेंट प्रोफेसर को विभागाध्यक्ष बनाए जाने का चार्ट, प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर के रिक्त पदों की संख्या, रिक्त पदों के लिए भेजे गए अधियाचन का ब्योरा, जारी विज्ञापन और उनकी वर्तमान स्थिति, तथा जिन पदों का विज्ञापन नहीं हुआ उसके कारण कार्यवाहक प्राचार्यों वाले पदों का विज्ञापन हुआ या नहीं मामले की अगली सुनवाई13 अक्तूबर 2026 को होगी।

