दरभंगा एयरपोर्ट के नए टर्मिनल का 71% काम पूरा:30 लाख यात्रियों की सालाना क्षमता, 40 चेक-इन काउंटर और 5 एयरोब्रिज बन रहे

दरभंगा एयरपोर्ट के नए टर्मिनल का 71% काम पूरा:30 लाख यात्रियों की सालाना क्षमता, 40 चेक-इन काउंटर और 5 एयरोब्रिज बन रहे

दरभंगा में मिथिलांचल और उत्तर बिहार में हवाई कनेक्टिविटी को बढ़ाने की दिशा में दरभंगा एयरपोर्ट के नए टर्मिनल भवन का निर्माण तेजी से चल रहा है। एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) के अनुसार, नए टर्मिनल का करीब 71.1% काम पूरा हो चुका है। करीब 642.43 करोड़ रुपए की लागत से 62,800 वर्गमीटर में बन रहे इस टर्मिनल के तैयार होने के बाद यात्रियों को मौजूदा व्यवस्था के मुकाबले ज्यादा सुविधाएं मिलेंगी। AAI के बजट दस्तावेज में दरभंगा के नए सिविल एन्क्लेव को चालू परियोजना के तौर पर दर्ज किया गया है। नए टर्मिनल की सालाना यात्री क्षमता करीब 30 लाख होगी। यहां 5 एयरोब्रिज और 40 चेक-इन काउंटर बनाए जा रहे हैं। टर्मिनल को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की योजना है। इसे पांच सितारा GRIHA रेटिंग वाला ग्रीन टर्मिनल बनाया जाना है। नए टर्मिनल भवन का उद्घाटन 20 नवंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होने की संभावना है। दूसरी मंजिल से चेक-इन, एयरोब्रिज से विमान तक पहुंचेंगे यात्री नए टर्मिनल में प्रस्थान करने वाले यात्री दूसरी मंजिल पर जाकर चेक-इन काउंटर से बोर्डिंग पास लेंगे। इसके बाद एयरोब्रिज के जरिए सीधे विमान तक पहुंच सकेंगे। इससे यात्रियों को खुले एप्रन से होकर विमान तक जाने की जरूरत कम होगी। वहीं विमान से उतरने वाले यात्रियों के लिए ग्राउंड फ्लोर से बाहर निकलने की व्यवस्था होगी। 40 चेक-इन काउंटर और 5 एयरोब्रिज से पीक आवर में यात्रियों की भीड़ को व्यवस्थित करने और विमान में चढ़ने-उतरने की प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिलेगी। रनवे विस्तार के लिए 90 एकड़ जमीन की प्रक्रिया अंतिम चरण में दरभंगा एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से जोड़ने के लिए रनवे विस्तार को भी अहम माना जा रहा है। डीएम कौशल कुमार के अनुसार, रनवे एक्सटेंशन के लिए करीब 90 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने बताया कि जमीन के लिए करीब 290 करोड़ रुपए का भुगतान किया जाना है। इसमें अधिकांश राशि का भुगतान हो चुका है और बाकी राशि जल्द देने का प्रयास किया जा रहा है। शेष भुगतान के बाद जमीन एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया को हस्तांतरित कर दी जाएगी। इसके बाद एएआई बाउंड्री वॉल सहित आगे की प्रक्रिया को पूरी करेगा। जनवरी 2026 की रिपोर्ट में भी करीब 90 एकड़ जमीन के अधिग्रहण और रनवे विस्तार का उल्लेख किया गया था। लॉजिस्टिक पार्क के लिए 50 एकड़ जमीन की तैयारी एयरपोर्ट के आसपास लॉजिस्टिक पार्क के लिए करीब 50 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। डीएम के अनुसार, कैबिनेट स्तर से मंजूरी मिलने के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। प्रशासन की ओर से जल्द भुगतान शुरू करने की बात कही गई है। लॉजिस्टिक पार्क और एयरपोर्ट के विस्तार से कृषि उत्पादों, कारोबार और माल ढुलाई को बढ़ावा मिलने की संभावना है। इसका फायदा दरभंगा के साथ पूरे मिथिला और उत्तर बिहार के व्यापारिक क्षेत्र को मिलने की उम्मीद है। कारोबार, पर्यटन और रोजगार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद नए टर्मिनल, रनवे विस्तार और प्रस्तावित लॉजिस्टिक पार्क को सिर्फ यात्री सुविधा के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। बेहतर हवाई संपर्क से मिथिलांचल और उत्तर बिहार में पर्यटन, कारोबार, निवेश, रोजगार और कृषि उत्पादों की आवाजाही को बढ़ावा मिलने की संभावना है। नए सिविल एन्क्लेव से जुड़ी सड़क कनेक्टिविटी के लिए एनएच-27 से नए एप्रोच रोड की परियोजना पर भी काम आगे बढ़ रहा है। टर्मिनल के साथ रनवे विस्तार, लॉजिस्टिक पार्क और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं पर काम आगे बढ़ने से दरभंगा एयरपोर्ट के विस्तार की राह भी खुल रही है। महाराजा के निजी एयरपोर्ट से आम यात्रियों तक पहुंची हवाई सेवा आज जिस दरभंगा एयरपोर्ट से यात्री दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और अहमदाबाद जैसे शहरों के लिए हवाई सफर कर रहे हैं, उसकी कहानी करीब एक सदी से ज्यादा पुरानी है। एयरपोर्ट का इतिहास दरभंगा राज परिवार और महाराजा की विमानन गतिविधियों से भी जुड़ा रहा है। एक समय दरभंगा राज के पास अपने विमान थे और यहां से यात्रियों के साथ कार्गो सेवा भी संचालित होती थी। महाराजा रामेश्वर सिंह के समय से शुरू हुई विमानन की कहानी मिथिला में विमानन गतिविधियों की शुरुआत महाराजा रामेश्वर सिंह के समय से मानी जाती है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, प्रथम विश्वयुद्ध के दौर में ही दरभंगा राज ने विमानन क्षेत्र में रुचि दिखाई थी। बाद में महाराजा कामेश्वर सिंह के समय दरभंगा राज ने विमानन को व्यावसायिक रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने बड़ी संख्या में सैन्य विमानों की नीलामी की थी। इसी दौरान दरभंगा राज ने डगलस डीसी-3/सी-47 श्रेणी के विमान खरीदे। राज परिवार के पास चार डकोटा विमानों का बेड़ा था। इनमें वीटी-डीईएम, वीटी-एवायजी, वीटी-एएक्सजेड और वीटी-सीएमई जैसे रजिस्ट्रेशन वाले विमान शामिल बताए जाते हैं। ‘दरभंगा एविएशन’ ने शुरू की व्यावसायिक उड़ान महाराजा कामेश्वर सिंह ने इन विमानों के जरिए ‘दरभंगा एविएशन’ नाम से विमानन कंपनी शुरू की। इसके विमान दरभंगा सहित विभिन्न मार्गों पर उड़ान भरते थे। कोलकाता और ढाका के बीच कार्गो सेवा भी संचालित होती थी। राज परिवार के ब्रिटिश अधिकारियों, राजनेताओं और अन्य विशिष्ट अतिथियों के लिए भी इन विमानों का इस्तेमाल किया जाता था। दरभंगा एविएशन का मुख्यालय कोलकाता में था और विमानन संचालन के लिए जरूरी लाइसेंस लंदन से लिया गया था। तीन विमान हादसों का शिकार हुए दरभंगा एविएशन के इतिहास में विमान दुर्घटनाओं का भी जिक्र मिलता है। 1 मार्च 1954 को वीटी-डीईएम रजिस्ट्रेशन वाला विमान कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट से उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान को बालुरघाट जाना था। हादसे में यात्रियों और क्रू के कई सदस्यों की मौत हुई। इसके बाद 30 अगस्त 1955 को एक अन्य विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। वहीं वीटी-एवायजी रजिस्ट्रेशन वाले विमान के 24 मई 1962 को तत्कालीन राजशाही क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त होने का उल्लेख मिलता है। लगातार दुर्घटनाओं और अन्य परिस्थितियों के बीच दरभंगा एविएशन का संचालन बंद हो गया। एक विमान महाराजा के लिए रखा गया था राज परिवार के विमानों में वीटी-सीएमई को महाराजा कामेश्वर सिंह के लिए विशेष रूप से रखा गया था। इसे देश के शुरुआती लक्जरी एयरक्राफ्ट में गिना जाता है। इसका इस्तेमाल महाराजा के अतिथियों और विशेष यात्राओं के लिए भी होता था। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उल्लेख मिलता है कि 4 जुलाई 1962 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने महाराजा कामेश्वर सिंह को पत्र भेजकर पटना से हैदराबाद की यात्रा के लिए विमान उपलब्ध कराने पर आभार व्यक्त किया था। 1962 में वायुसेना के उपयोग में आया एयरफील्ड भारत-चीन युद्ध के दौरान वर्ष 1962 में दरभंगा एयरफील्ड को भारतीय वायुसेना के उपयोग में लिया गया। इसके बाद यहां वायुसेना का बेस और एयरोड्रोम विकसित हुआ। राज परिवार से जुड़ी विमानन परिसंपत्तियां भी बाद में भारत सरकार को सौंपे जाने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के बाद उनके निजी विमान का पंजीकरण समाप्त हो गया और बाद में यह भी सरकारी नियंत्रण में चला गया। राज परिवार के विमानों में से एक विमान आज भी भारतीय वायुसेना से जुड़े संग्रहालय में संरक्षित होने की जानकारी मिलती है। 2020 में आम यात्रियों के लिए फिर शुरू हुई उड़ान लंबे अंतराल के बाद मिथिलांचल में नागरिक विमान सेवा शुरू करने की मांग तेज हुई। आंदोलन और लगातार मांग के बाद केंद्र की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना UDAN के तहत दरभंगा एयरपोर्ट को नागरिक उड़ानों के लिए विकसित किया गया। 24 दिसंबर 2018 को दरभंगा एयरपोर्ट के सिविल एन्क्लेव का शिलान्यास तत्कालीन केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था। इसके करीब दो साल बाद 8 नवंबर 2020 को यहां से नियमित वाणिज्यिक विमान सेवा शुरू हुई। कोरोना संक्रमण के दौर में शुरू हुई इस सेवा ने मिथिलांचल और उत्तर बिहार को दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु समेत देश के प्रमुख शहरों से जोड़ दिया। बाद में उड़ानों का दायरा बढ़ता गया और दरभंगा एयरपोर्ट उत्तर बिहार के महत्वपूर्ण हवाई संपर्क केंद्र के रूप में उभरा। शाही लीची, मखाना और मालदह आम तक पहुंची हवाई कनेक्टिविटी दरभंगा एयरपोर्ट शुरू होने से यात्री परिवहन के साथ उत्तर बिहार के कृषि और कारोबारी उत्पादों के लिए भी नए बाजार की संभावनाएं बनी हैं। मिथिलांचल की शाही लीची, मखाना और मालदह आम जैसे उत्पादों की हवाई खेप भेजे जाने से एयर कार्गो की संभावनाएं भी सामने आई हैं। विरासत से आधुनिक विकास तक दरभंगा की विमानन विरासत बताती है कि करीब सात दशक पहले ही इस क्षेत्र में निजी विमानन और कार्गो सेवा जैसी सुविधाएं मौजूद थीं। आज उसी एयरफील्ड से आम यात्री टिकट लेकर देश के बड़े शहरों तक सफर कर रहे हैं। नए टर्मिनल, रनवे विस्तार और लॉजिस्टिक पार्क जैसी योजनाओं के साथ अब इस पुरानी विमानन विरासत को आधुनिक ढांचे से जोड़ने की दिशा में काम चल रहा है। बेहतर हवाई संपर्क, रेल और सड़क नेटवर्क तथा उद्योगों के विकास से उत्तर बिहार में कारोबार और रोजगार के नए अवसरों की संभावना बढ़ सकती है। दरभंगा एयरपोर्ट की कहानी इस बदलाव को भी दिखाती है कि जिस जमीन से कभी राज परिवार के निजी विमान उड़ते थे, उसी एयरफील्ड से आज आम यात्री देश के बड़े शहरों तक हवाई सफर कर रहे हैं। दरभंगा में मिथिलांचल और उत्तर बिहार में हवाई कनेक्टिविटी को बढ़ाने की दिशा में दरभंगा एयरपोर्ट के नए टर्मिनल भवन का निर्माण तेजी से चल रहा है। एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) के अनुसार, नए टर्मिनल का करीब 71.1% काम पूरा हो चुका है। करीब 642.43 करोड़ रुपए की लागत से 62,800 वर्गमीटर में बन रहे इस टर्मिनल के तैयार होने के बाद यात्रियों को मौजूदा व्यवस्था के मुकाबले ज्यादा सुविधाएं मिलेंगी। AAI के बजट दस्तावेज में दरभंगा के नए सिविल एन्क्लेव को चालू परियोजना के तौर पर दर्ज किया गया है। नए टर्मिनल की सालाना यात्री क्षमता करीब 30 लाख होगी। यहां 5 एयरोब्रिज और 40 चेक-इन काउंटर बनाए जा रहे हैं। टर्मिनल को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की योजना है। इसे पांच सितारा GRIHA रेटिंग वाला ग्रीन टर्मिनल बनाया जाना है। नए टर्मिनल भवन का उद्घाटन 20 नवंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होने की संभावना है। दूसरी मंजिल से चेक-इन, एयरोब्रिज से विमान तक पहुंचेंगे यात्री नए टर्मिनल में प्रस्थान करने वाले यात्री दूसरी मंजिल पर जाकर चेक-इन काउंटर से बोर्डिंग पास लेंगे। इसके बाद एयरोब्रिज के जरिए सीधे विमान तक पहुंच सकेंगे। इससे यात्रियों को खुले एप्रन से होकर विमान तक जाने की जरूरत कम होगी। वहीं विमान से उतरने वाले यात्रियों के लिए ग्राउंड फ्लोर से बाहर निकलने की व्यवस्था होगी। 40 चेक-इन काउंटर और 5 एयरोब्रिज से पीक आवर में यात्रियों की भीड़ को व्यवस्थित करने और विमान में चढ़ने-उतरने की प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिलेगी। रनवे विस्तार के लिए 90 एकड़ जमीन की प्रक्रिया अंतिम चरण में दरभंगा एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से जोड़ने के लिए रनवे विस्तार को भी अहम माना जा रहा है। डीएम कौशल कुमार के अनुसार, रनवे एक्सटेंशन के लिए करीब 90 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने बताया कि जमीन के लिए करीब 290 करोड़ रुपए का भुगतान किया जाना है। इसमें अधिकांश राशि का भुगतान हो चुका है और बाकी राशि जल्द देने का प्रयास किया जा रहा है। शेष भुगतान के बाद जमीन एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया को हस्तांतरित कर दी जाएगी। इसके बाद एएआई बाउंड्री वॉल सहित आगे की प्रक्रिया को पूरी करेगा। जनवरी 2026 की रिपोर्ट में भी करीब 90 एकड़ जमीन के अधिग्रहण और रनवे विस्तार का उल्लेख किया गया था। लॉजिस्टिक पार्क के लिए 50 एकड़ जमीन की तैयारी एयरपोर्ट के आसपास लॉजिस्टिक पार्क के लिए करीब 50 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। डीएम के अनुसार, कैबिनेट स्तर से मंजूरी मिलने के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। प्रशासन की ओर से जल्द भुगतान शुरू करने की बात कही गई है। लॉजिस्टिक पार्क और एयरपोर्ट के विस्तार से कृषि उत्पादों, कारोबार और माल ढुलाई को बढ़ावा मिलने की संभावना है। इसका फायदा दरभंगा के साथ पूरे मिथिला और उत्तर बिहार के व्यापारिक क्षेत्र को मिलने की उम्मीद है। कारोबार, पर्यटन और रोजगार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद नए टर्मिनल, रनवे विस्तार और प्रस्तावित लॉजिस्टिक पार्क को सिर्फ यात्री सुविधा के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। बेहतर हवाई संपर्क से मिथिलांचल और उत्तर बिहार में पर्यटन, कारोबार, निवेश, रोजगार और कृषि उत्पादों की आवाजाही को बढ़ावा मिलने की संभावना है। नए सिविल एन्क्लेव से जुड़ी सड़क कनेक्टिविटी के लिए एनएच-27 से नए एप्रोच रोड की परियोजना पर भी काम आगे बढ़ रहा है। टर्मिनल के साथ रनवे विस्तार, लॉजिस्टिक पार्क और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं पर काम आगे बढ़ने से दरभंगा एयरपोर्ट के विस्तार की राह भी खुल रही है। महाराजा के निजी एयरपोर्ट से आम यात्रियों तक पहुंची हवाई सेवा आज जिस दरभंगा एयरपोर्ट से यात्री दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और अहमदाबाद जैसे शहरों के लिए हवाई सफर कर रहे हैं, उसकी कहानी करीब एक सदी से ज्यादा पुरानी है। एयरपोर्ट का इतिहास दरभंगा राज परिवार और महाराजा की विमानन गतिविधियों से भी जुड़ा रहा है। एक समय दरभंगा राज के पास अपने विमान थे और यहां से यात्रियों के साथ कार्गो सेवा भी संचालित होती थी। महाराजा रामेश्वर सिंह के समय से शुरू हुई विमानन की कहानी मिथिला में विमानन गतिविधियों की शुरुआत महाराजा रामेश्वर सिंह के समय से मानी जाती है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, प्रथम विश्वयुद्ध के दौर में ही दरभंगा राज ने विमानन क्षेत्र में रुचि दिखाई थी। बाद में महाराजा कामेश्वर सिंह के समय दरभंगा राज ने विमानन को व्यावसायिक रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने बड़ी संख्या में सैन्य विमानों की नीलामी की थी। इसी दौरान दरभंगा राज ने डगलस डीसी-3/सी-47 श्रेणी के विमान खरीदे। राज परिवार के पास चार डकोटा विमानों का बेड़ा था। इनमें वीटी-डीईएम, वीटी-एवायजी, वीटी-एएक्सजेड और वीटी-सीएमई जैसे रजिस्ट्रेशन वाले विमान शामिल बताए जाते हैं। ‘दरभंगा एविएशन’ ने शुरू की व्यावसायिक उड़ान महाराजा कामेश्वर सिंह ने इन विमानों के जरिए ‘दरभंगा एविएशन’ नाम से विमानन कंपनी शुरू की। इसके विमान दरभंगा सहित विभिन्न मार्गों पर उड़ान भरते थे। कोलकाता और ढाका के बीच कार्गो सेवा भी संचालित होती थी। राज परिवार के ब्रिटिश अधिकारियों, राजनेताओं और अन्य विशिष्ट अतिथियों के लिए भी इन विमानों का इस्तेमाल किया जाता था। दरभंगा एविएशन का मुख्यालय कोलकाता में था और विमानन संचालन के लिए जरूरी लाइसेंस लंदन से लिया गया था। तीन विमान हादसों का शिकार हुए दरभंगा एविएशन के इतिहास में विमान दुर्घटनाओं का भी जिक्र मिलता है। 1 मार्च 1954 को वीटी-डीईएम रजिस्ट्रेशन वाला विमान कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट से उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान को बालुरघाट जाना था। हादसे में यात्रियों और क्रू के कई सदस्यों की मौत हुई। इसके बाद 30 अगस्त 1955 को एक अन्य विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। वहीं वीटी-एवायजी रजिस्ट्रेशन वाले विमान के 24 मई 1962 को तत्कालीन राजशाही क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त होने का उल्लेख मिलता है। लगातार दुर्घटनाओं और अन्य परिस्थितियों के बीच दरभंगा एविएशन का संचालन बंद हो गया। एक विमान महाराजा के लिए रखा गया था राज परिवार के विमानों में वीटी-सीएमई को महाराजा कामेश्वर सिंह के लिए विशेष रूप से रखा गया था। इसे देश के शुरुआती लक्जरी एयरक्राफ्ट में गिना जाता है। इसका इस्तेमाल महाराजा के अतिथियों और विशेष यात्राओं के लिए भी होता था। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उल्लेख मिलता है कि 4 जुलाई 1962 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने महाराजा कामेश्वर सिंह को पत्र भेजकर पटना से हैदराबाद की यात्रा के लिए विमान उपलब्ध कराने पर आभार व्यक्त किया था। 1962 में वायुसेना के उपयोग में आया एयरफील्ड भारत-चीन युद्ध के दौरान वर्ष 1962 में दरभंगा एयरफील्ड को भारतीय वायुसेना के उपयोग में लिया गया। इसके बाद यहां वायुसेना का बेस और एयरोड्रोम विकसित हुआ। राज परिवार से जुड़ी विमानन परिसंपत्तियां भी बाद में भारत सरकार को सौंपे जाने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के बाद उनके निजी विमान का पंजीकरण समाप्त हो गया और बाद में यह भी सरकारी नियंत्रण में चला गया। राज परिवार के विमानों में से एक विमान आज भी भारतीय वायुसेना से जुड़े संग्रहालय में संरक्षित होने की जानकारी मिलती है। 2020 में आम यात्रियों के लिए फिर शुरू हुई उड़ान लंबे अंतराल के बाद मिथिलांचल में नागरिक विमान सेवा शुरू करने की मांग तेज हुई। आंदोलन और लगातार मांग के बाद केंद्र की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना UDAN के तहत दरभंगा एयरपोर्ट को नागरिक उड़ानों के लिए विकसित किया गया। 24 दिसंबर 2018 को दरभंगा एयरपोर्ट के सिविल एन्क्लेव का शिलान्यास तत्कालीन केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था। इसके करीब दो साल बाद 8 नवंबर 2020 को यहां से नियमित वाणिज्यिक विमान सेवा शुरू हुई। कोरोना संक्रमण के दौर में शुरू हुई इस सेवा ने मिथिलांचल और उत्तर बिहार को दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु समेत देश के प्रमुख शहरों से जोड़ दिया। बाद में उड़ानों का दायरा बढ़ता गया और दरभंगा एयरपोर्ट उत्तर बिहार के महत्वपूर्ण हवाई संपर्क केंद्र के रूप में उभरा। शाही लीची, मखाना और मालदह आम तक पहुंची हवाई कनेक्टिविटी दरभंगा एयरपोर्ट शुरू होने से यात्री परिवहन के साथ उत्तर बिहार के कृषि और कारोबारी उत्पादों के लिए भी नए बाजार की संभावनाएं बनी हैं। मिथिलांचल की शाही लीची, मखाना और मालदह आम जैसे उत्पादों की हवाई खेप भेजे जाने से एयर कार्गो की संभावनाएं भी सामने आई हैं। विरासत से आधुनिक विकास तक दरभंगा की विमानन विरासत बताती है कि करीब सात दशक पहले ही इस क्षेत्र में निजी विमानन और कार्गो सेवा जैसी सुविधाएं मौजूद थीं। आज उसी एयरफील्ड से आम यात्री टिकट लेकर देश के बड़े शहरों तक सफर कर रहे हैं। नए टर्मिनल, रनवे विस्तार और लॉजिस्टिक पार्क जैसी योजनाओं के साथ अब इस पुरानी विमानन विरासत को आधुनिक ढांचे से जोड़ने की दिशा में काम चल रहा है। बेहतर हवाई संपर्क, रेल और सड़क नेटवर्क तथा उद्योगों के विकास से उत्तर बिहार में कारोबार और रोजगार के नए अवसरों की संभावना बढ़ सकती है। दरभंगा एयरपोर्ट की कहानी इस बदलाव को भी दिखाती है कि जिस जमीन से कभी राज परिवार के निजी विमान उड़ते थे, उसी एयरफील्ड से आज आम यात्री देश के बड़े शहरों तक हवाई सफर कर रहे हैं।  

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