ओबरा प्रखंड क्षेत्र में मंगलवार को प्रकृति, कृषि और भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक करमा पर्व पूरे उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस दौरान विभिन्न गांवों में महिलाओं और युवतियों ने विधि-विधान से करम देवता की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और भाइयों की लंबी उम्र की कामना की। करमा पर्व को बिहार के प्रमुख लोक और प्रकृति पर्वों में से एक माना जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। मान्यता है कि करम वृक्ष की हरी डाल को कर्म देवता का प्रतीक मानकर इसकी पूजा की जाती है। पर्व से पहले सात प्रकार के अनाजों को टोकरी में उगाया जाता है, जिसे ‘जावा’ कहते हैं। जावा को नई फसल, उर्वरता और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। गांवों में महिलाएं और युवतियां व्रत रखकर करम डाल को पूजा स्थल पर स्थापित करती हैं। इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। कई जगहों पर करमा-धरमा की लोककथा सुनाने के साथ पारंपरिक गीत और नृत्य भी प्रस्तुत किए गए। ढोल-मांदर और लोकगीतों की गूंज से ग्रामीण माहौल उत्सवमय बना रहा। महुआ बिगहा गांव में भी करमा पूजा को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला। गांव की नीतू कुमारी, मंजू कुमारी, निशु कुमारी, मंशू कुमारी, निधि कुमारी, बिंदु देवी, संध्या देवी सहित अन्य महिलाओं ने उत्साहपूर्वक करमा पूजा में भाग लिया। ग्रामीणों ने बताया कि करमा पर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति संरक्षण, कृषि संस्कृति और भाई-बहन के प्रेम का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण लोकपर्व है। हरी-भरी करम डाल के माध्यम से प्रकृति की रक्षा और समृद्ध जीवन की कामना की जाती है। ओबरा प्रखंड क्षेत्र में मंगलवार को प्रकृति, कृषि और भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक करमा पर्व पूरे उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस दौरान विभिन्न गांवों में महिलाओं और युवतियों ने विधि-विधान से करम देवता की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और भाइयों की लंबी उम्र की कामना की। करमा पर्व को बिहार के प्रमुख लोक और प्रकृति पर्वों में से एक माना जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। मान्यता है कि करम वृक्ष की हरी डाल को कर्म देवता का प्रतीक मानकर इसकी पूजा की जाती है। पर्व से पहले सात प्रकार के अनाजों को टोकरी में उगाया जाता है, जिसे ‘जावा’ कहते हैं। जावा को नई फसल, उर्वरता और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। गांवों में महिलाएं और युवतियां व्रत रखकर करम डाल को पूजा स्थल पर स्थापित करती हैं। इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। कई जगहों पर करमा-धरमा की लोककथा सुनाने के साथ पारंपरिक गीत और नृत्य भी प्रस्तुत किए गए। ढोल-मांदर और लोकगीतों की गूंज से ग्रामीण माहौल उत्सवमय बना रहा। महुआ बिगहा गांव में भी करमा पूजा को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला। गांव की नीतू कुमारी, मंजू कुमारी, निशु कुमारी, मंशू कुमारी, निधि कुमारी, बिंदु देवी, संध्या देवी सहित अन्य महिलाओं ने उत्साहपूर्वक करमा पूजा में भाग लिया। ग्रामीणों ने बताया कि करमा पर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति संरक्षण, कृषि संस्कृति और भाई-बहन के प्रेम का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण लोकपर्व है। हरी-भरी करम डाल के माध्यम से प्रकृति की रक्षा और समृद्ध जीवन की कामना की जाती है।

