जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज सरकारी छुट्टियों को लेकर सियासत अचानक गरमा गई। नेशनल कॉन्फ्रेंस और भाजपा के विधायक आमने-सामने आ गए और सदन में करीब 15 मिनट तक जमकर हंगामा हुआ। विवाद शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और महाराजा हरि सिंह से जुड़ी छुट्टियों को लेकर था। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने शेख अब्दुल्ला की जयंती और पुण्यतिथि पर छुट्टी बहाल करने की मांग उठाई, जबकि इस मुद्दे ने जम्मू-कश्मीर के इतिहास और राजनीतिक विरासत को लेकर दोनों दलों के पुराने मतभेद फिर सामने ला दिए।
हंगामे की शुरुआत नेशनल कॉन्फ्रेंस विधायक अब्दुल मजीद लार्मी की मांग से हुई। उन्होंने शेख अब्दुल्ला की जयंती 5 दिसंबर को फिर से सरकारी अवकाश घोषित करने की मांग की। इतना ही नहीं, उन्होंने 8 सितंबर को शेख अब्दुल्ला की पुण्यतिथि पर भी सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग रख दी। इसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्य नारेबाजी करते हुए शेख अब्दुल्ला को ‘शेर-ए-कश्मीर’ बताते नजर आए। उनके समर्थन में लगाए गए ‘शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला जिंदाबाद’ के नारों ने सदन का माहौल पूरी तरह गर्म कर दिया। एनसी विधायकों ने शेख अब्दुल्ला को स्वतंत्रता सेनानी और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बताया।
इसे भी पढ़ें: Jammu and Kashmir Assembly में जबरदस्त हंगामा, विधानसभा अध्यक्ष भी बोले पड़े, ‘गुंडागर्दी नहीं चलेगी’
जाहिर है, इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की प्रतिक्रिया भी तीखी रही। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई और विधानसभा की कार्यवाही बाधित हुई। अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि न तो अध्यक्ष और न ही विधानसभा के पास सरकारी अवकाश घोषित करने या रद्द करने का अधिकार है।
हम आपको बता दें कि इस पूरे विवाद की असली जड़ 2019 के बाद बदले जम्मू-कश्मीर के सरकारी अवकाश कैलेंडर में छिपी है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने और तत्कालीन राज्य के पुनर्गठन के बाद तत्कालीन उपराज्यपाल प्रशासन ने कई छुट्टियां समाप्त कर दी थीं। इनमें शेख अब्दुल्ला की जयंती और कश्मीर शहीद दिवस जैसी तारीखें भी शामिल थीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने उस समय इन फैसलों का विरोध किया था।
सबसे ज्यादा विवाद 13 जुलाई को लेकर रहा। 1931 में इसी दिन श्रीनगर की केंद्रीय जेल के बाहर डोगरा सेना की गोलीबारी में 22 कश्मीरी मुसलमान मारे गए थे। यह घटना अब्दुल कादिर खान के खिलाफ चल रहे मामले के दौरान हुई थी। अब्दुल कादिर, एक ब्रिटिश आगंतुक के यहां काम करते थे और महाराजा हरि सिंह के शासन की आलोचना करने वाले भाषण के बाद उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला था। बाद में 13 जुलाई को जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
दूसरी तरफ, सरकार ने महाराजा हरि सिंह से जुड़ी तारीखों को सरकारी कैलेंडर में जगह दी। 26 अक्टूबर को 1947 में भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए जाने की स्मृति में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया। इसके बाद जम्मू क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों की मांग पर 23 सितंबर यानी महाराजा हरि सिंह की जयंती को भी सरकारी अवकाश बना दिया गया। दोनों तारीखें 2026 के जम्मू-कश्मीर सरकारी अवकाश कैलेंडर में परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के तहत शामिल हैं।
यही स्थिति उमर अब्दुल्ला सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन गई है। 2024 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक इतिहास से जुड़ी कुछ छुट्टियां, विशेष रूप से 13 जुलाई और 5 दिसंबर, बहाल करने का वादा किया था। लेकिन अब तक इन छुट्टियों की बहाली नहीं हुई है। साथ ही, एनसी नेतृत्व ने चुनाव के दौरान यह भी संकेत दिया था कि महाराजा हरि सिंह की जयंती की छुट्टी वापस लेने की मांग नहीं की जाएगी।
आज का हंगामा इसी विरोधाभास को सामने ले आया। बाद में भाजपा के लगभग सभी विधायक सदन से बाहर चले गए और उमर सरकार पर जनता की समस्याओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। हालांकि भाजपा विधायक युधवीर सेठी सदन में ही रुके रहे। वैसे उनके पास इसकी वजह थी। दरअसल उन्हें प्रश्नकाल में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से अपने सवाल का जवाब सुनना था। उमर अब्दुल्ला ने सेठी के सदन में रुकने की सराहना की और उन्हें जनता का ‘सच्चा प्रतिनिधि’ बताया। इसके साथ ही उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “असली और नकली विधायकों में यही अंतर है।”
बहरहाल, जम्मू-कश्मीर विधानसभा का यह टकराव दिखाता है कि यहां सरकारी छुट्टियों का कैलेंडर महज तारीखों की सूची नहीं है। इसके पीछे इतिहास, पहचान, जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक विरासत और 2019 के बाद बदले राजनीतिक विमर्श की गहरी परतें हैं। शेख अब्दुल्ला और महाराजा हरि सिंह को लेकर अलग-अलग राजनीतिक धारणाएं अब भी सदन के भीतर टकरा रही हैं और आज का हंगामा उसी जारी संघर्ष की एक तीखी तस्वीर बनकर सामने आया।

