कक्षा में शिक्षक ही कम तो कैसे बनेंगे नम्बर-1

कक्षा में शिक्षक ही कम तो कैसे बनेंगे नम्बर-1

उदयपुर. जिलों की शैक्षणिक स्थिति सुधारने और उनकी रैंकिंग तय करने के लिए शिक्षा विभाग ने 12 मानकों को समेटकर छह प्रमुख मानक निर्धारित किए हैं। इनमें विद्यार्थियों की उपस्थिति को सबसे अधिक 25 प्रतिशत, शिक्षक की ऐप सक्रियता को 15 प्रतिशत और बैठकों को 10 प्रतिशत वेटेज दिया है। विभाग इन मानकों के आधार पर जिलों की शैक्षणिक स्थिति का आकलन करेगा। हालांकि, शिक्षकों के बीच रैंकिंग की इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहा है कि जब स्कूल में पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं तो केवल विद्यार्थियों की उपस्थिति और डिजिटल गतिविधियों के आंकड़े शिक्षा की वास्तविक तस्वीर कैसे बताएंगे?

शिक्षकों का कहना है कि स्कूलों की मॉनिटरिंग और आंकड़ों का संकलन जरूरी है, लेकिन रैंकिंग में स्कूल की जमीनी स्थिति भी शामिल होनी चाहिए। कई स्कूलों में स्वीकृत पदों के मुकाबले शिक्षक कम हैं। उपलब्ध शिक्षकों को ही अतिरिक्त कक्षाओं, कई विषयों और विभागीय कार्यों का जिम्मा संभालना पड़ रहा है। ऐसे में विद्यार्थियों की उपस्थिति बढ़ना सकारात्मक है, लेकिन उनके लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध होना भी शिक्षा की गुणवत्ता का उतना ही महत्वपूर्ण आधार है।

बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक कितने?

विद्यार्थियों की उपस्थिति को रैंकिंग में 25 प्रतिशत वेटेज दिया गया है। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों का नियमित स्कूल आना शिक्षा व्यवस्था की पहली जरूरत है, लेकिन इसके बाद कक्षा में पर्याप्त शिक्षक होना भी जरूरी है। यदि किसी स्कूल में पद रिक्त हैं और एक शिक्षक को एक साथ कई कक्षाओं या विषयों का भार संभालना पड़ रहा है तो केवल उपस्थिति के आंकड़े से शिक्षण व्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ सकती। शिक्षकों के अनुसार रैंकिंग में स्वीकृत पदों के मुकाबले कार्यरत शिक्षकों की संख्या और शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात को भी महत्वपूर्ण मानक बनाया जाना चाहिए। इससे यह पता चल सकेगा कि जिस स्कूल में बच्चों की उपस्थिति अच्छी है, वहां उन्हें पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक भी उपलब्ध हैं या नहीं।

डिजिटल रिपोर्टिंग से मॉनिटरिंग होगी मजबूत

शिक्षक की ऐप सक्रियता को 15 प्रतिशत और बैठकों को 10 प्रतिशत वेटेज दिया गया है। डिजिटल रिपोर्टिंग और विभागीय बैठकों के जरिए मॉनिटरिंग व्यवस्था मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन शिक्षकों का सवाल है कि रैंकिंग में शिक्षक के वास्तविक शिक्षण समय का आकलन कौन करेगा? शिक्षकों का कहना है कि ऐप पर सूचनाएं दर्ज करने, फोटो अपलोड करने, रिपोर्ट तैयार करने, सर्वे, विभिन्न अभियानों और दूसरे विभागीय कार्यों में भी समय जाता है। यदि ऐसे गैर-शैक्षणिक कार्यों का भार लगातार बढ़ता है तो उसका असर कक्षा में मिलने वाले शिक्षण समय पर पड़ना स्वाभाविक है।

रिक्त पद और अतिरिक्त कार्यभार भी बने रैंकिंग का हिस्सा

शिक्षकों का कहना है कि स्कूलों में उपलब्ध शिक्षक लंबे समय से रिक्त पदों का अतिरिक्त भार संभाल रहे हैं। इसके साथ तबादले, पदोन्नति, बकाया भुगतान और अन्य सेवा संबंधी मामलों को लेकर भी शिक्षक परेशान रहते हैं। ऐसे में केवल ऐप पर गतिविधियां पूरी होने या बैठकों में उपस्थिति के आधार पर शिक्षक की कार्यक्षमता का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। शिक्षकों का सुझाव है कि छह प्रमुख मानकों के साथ शिक्षक उपलब्धता और कार्य-संतुष्टि को भी रैंकिंग में शामिल किया जाए। इसमें रिक्त पदों की स्थिति, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, अतिरिक्त कार्यभार, गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगने वाला समय और शिक्षकों की कार्य-संतुष्टि जैसे बिंदुओं को शामिल किया जा सकता है।

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