चुप्पी तोड़ने की हिम्मत कैसे आती, ट्रिपल आईटी नवा Raipur के रिसर्च में बड़ा खुलासा

चुप्पी तोड़ने की हिम्मत कैसे आती, ट्रिपल आईटी नवा Raipur के रिसर्च में बड़ा खुलासा

Raipur: दफ्तर में किसी सहकर्मी को गलत काम करते देखकर चुप रहना आसान होता है, लेकिन उसके खिलाफ आवाज उठाना बहुत मुश्किल। खासकर सरकारी संस्थानों में जहां वरिष्ठों का दबाव, रिश्ते बिगड़ने और बदले की कार्रवाई का डर लगातार बना रहता है, वहां कर्मचारी अक्सर खामोशी ही चुनते हैं। लेकिन आखिर कुछ लोग इस चुप्पी को तोड़कर आवाज उठाने की हिम्मत कैसे जुटा लेते हैं।

ट्रिपल आईटी नवा रायपुर के प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार अग्रवाल और छात्रा ऋषिका बघेल ने एक नए शोध में इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के 243 सरकारी कर्मचारियों के अध्ययन पर आधारित इस रिसर्च में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शोध के अनुसार सिर्फ यह जान लेना कि सामने वाला गलत काम कर रहा है, किसी कर्मचारी को शिकायत करने के लिए प्रेरित नहीं करता। इसके उलट, गलत काम देखने के बाद जब व्यक्ति के भीतर मानसिक बेचैनी और ग्लानि का भाव पैदा होता है, तब वह चुप्पी तोड़ने की ओर कदम बढ़ाता है। यानी गलत काम के खिलाफ आवाज उठाने की शुरुआत सिर्फ दिमाग से नहीं, बल्कि मन की बेचैनी से होती है।

इन पर हुआ अध्ययन: रिसर्च में भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के 243 कर्मचारियों को शामिल किया गया। इनमें 131 पुरुष (53.9 फीसदी) और 112 महिलाएं (46.1 फीसदी) थीं। अध्ययन में सबसे बड़ा आयुवर्ग 26 से 35 वर्ष का रहा, जिसमें 113 कर्मचारी (46.5 फीसदी) शामिल थे। इसके अलावा 18-25 वर्ष के 50 (20.6 फीसदी), 36-45 वर्ष के 42 (17.3 फीसदी), 46-55 वर्ष के 29 (11.9 फीसदी) और 56 वर्ष से अधिक आयु के 9 कर्मचारी (3.7 फीसदी) अध्ययन का हिस्सा रहे।

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प्रो. अमित अग्रवाल

संस्थानों के लिए सीख: शोधकर्ताओं का मानना है कि सरकारी संस्थानों में पदानुक्रम और कार्रवाई के डर के कारण हर कर्मचारी अपनी इस बेचैनी के बावजूद आवाज नहीं उठा पाता। इसलिए सिर्फ नियम बनाना काफी नहीं है। सरकारी संस्थानों को ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार करना होगा, जहां शिकायत करने वाले कर्मचारियों को नुकसान न पहुंचे। पारदर्शी व्यवस्था और नैतिक प्रशिक्षण से कर्मचारी निडर होकर गलत काम का विरोध कर सकेंगे।

अंदरूनी खींचतान और भावनात्मक दबाव: प्रो. अमित अग्रवाल ने बताया कि यह शोध मोरल सेल्फ-रेगुलेशन थ्योरी पर आधारित है। इसके तहत हर व्यक्ति अपने नैतिक मूल्यों और आचरण के बीच संतुलन बनाकर रखना चाहता है। जब कोई सहकर्मी गलत काम करता है, तो देखने वाले कर्मचारी के अंदर दो तरह का असंतुलन पैदा होता है। दिमागी तौर पर यह समझना कि काम गलत है, और दूसरा अंदर से परेशान होकर भी दफ्तर में सामान्य दिखने की कोशिश करना।

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ऋषिका बघेल

भावनात्मक असंतुलन का असर ज्यादा: ऋषिका बघेल के अनुसार दिमागी असंतुलन की तुलना में भावनात्मक असंतुलन ज्यादा गहरा और मजबूत होता है। जब कर्मी को महसूस होता है कि गलत होते देखकर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा, तो यह आत्मग्लानि उसे शिकायत करने या आवाज उठाने के लिए मजबूर कर देती है।

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