भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर अब सरकार और वायुसेना, दोनों की बेचैनी खुलकर सामने आ गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तेजस की आपूर्ति में हो रही देरी को लेकर कड़ी नाराजगी जताते हुए साफ चेताया है कि स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं में देरी लागत बढ़ाने के साथ-साथ तकनीक के अप्रचलित होने का खतरा भी पैदा करती है। लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब इस देरी पर सवाल उठा हो। इससे पहले वायुसेना अध्यक्ष अमरप्रीत सिंह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि रक्षा क्षेत्र में समयसीमा सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है और ऐसा वादा ही क्यों किया जाए जिसे पूरा नहीं किया जा सकता। मई 2025 में उन्होंने यहां तक कहा था कि उन्हें ऐसी एक भी रक्षा परियोजना याद नहीं आती जो तय समयसीमा में पूरी हुई हो। तेजस एमके-1ए को लेकर फरवरी 2025 में उनकी नाराजगी और भी स्पष्ट थी, जब उन्होंने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के काम करने के तरीके पर भरोसे की कमी जताते हुए कहा था कि संस्था अपेक्षित ‘अभियान मोड’ में काम करती दिखाई नहीं दे रही।
वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा है कि स्वदेशी रक्षा मंचों की समयसीमा में होने वाली देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। इससे परियोजनाओं की लागत बढ़ती है और विकसित की गई तकनीक के अप्रचलित हो जाने का खतरा भी पैदा होता है। उन्होंने चल रही तकनीकी परियोजनाओं के लिए यथार्थवादी समयसीमा तय करने पर जोर दिया। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब वायुसेना के लिए 180 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों की आपूर्ति अभी भी समय से पीछे चल रही है। इनमें 2021 में 83 विमानों और 2025 में 97 विमानों के लिए हुए दो समझौते शामिल हैं, जिनकी कुल कीमत एक लाख दस हजार करोड़ रुपये से अधिक है।
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हम आपको बता दें कि तेजस एमके-1ए की आपूर्ति में मिसाइल और रडार के एकीकरण से जुड़ी समस्याएं बाधा बनी हुई हैं। इसका सीधा असर वायुसेना की परिचालन क्षमता पर पड़ रहा है। वायुसेना के लड़ाकू विमान स्क्वाड्रनों की संख्या घटकर 29 रह गई है, जबकि स्वीकृत आदर्श संख्या 42.5 मानी जाती है। ऐसे समय में नए लड़ाकू विमानों की आपूर्ति में देरी महज उत्पादन संबंधी अड़चन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक तैयारी का प्रश्न बन जाती है। चीन और पाकिस्तान जैसे दो मोर्चों वाले सुरक्षा वातावरण में लड़ाकू विमान क्षमता की कमी भारत के लिए ऐसी कमजोरी है जिसे लंबा खिंचने देना जोखिम भरा हो सकता है।
इसके बावजूद शुक्रवार को मिली उपलब्धियां कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। दो प्रारंभिक परिचालन मानक प्रशिक्षक तेजस सौंपे जाने के साथ ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने 2006 और 2010 में हुए दो चरणों के समझौतों के तहत तय सभी 40 तेजस एमके-1 विमानों की आपूर्ति पूरी कर ली। वहीं एचटीटी-40 प्रशिक्षण विमान की आपूर्ति की शुरुआत उस 70 विमानों के समझौते के क्रियान्वयन का आरंभ है, जिसका लंबे समय से इंतजार था। इसे अब आधिकारिक रूप से ‘अंकुर’ नाम दिया गया है।
देखा जाये तो एचटीटी-40 का सामरिक महत्व विशेष रूप से बड़ा है। भारत वर्षों तक अपने शुरुआती प्रशिक्षण विमान की जरूरतों के लिए विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहा। अब पहली बार देश के भीतर विकसित और निर्मित प्रशिक्षण विमान के माध्यम से वायुसेना के नए पायलटों को प्रशिक्षित करने की क्षमता विकसित हो रही है। इसका अर्थ केवल आयात में कमी नहीं है, बल्कि प्रशिक्षण से लेकर लड़ाकू विमान संचालन तक एक स्वदेशी विमानन पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना है। राजनाथ सिंह ने इसके अंतरराष्ट्रीय बाजार में संभावित मांग की भी उम्मीद जताई है।
वहीं ध्रुव एनजी इस तस्वीर का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर का नागरिक प्रमाणित रूप है और इसके माध्यम से भारत ने सैन्य विमानन में विकसित तकनीक को नागरिक विमानन क्षेत्र तक ले जाने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। राजनाथ सिंह ने इसी बढ़ते तालमेल को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत की विमानन क्षमता केवल रक्षा जरूरतों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। लक्ष्य ऐसा मजबूत औद्योगिक तंत्र बनाना होना चाहिए जो सैन्य और नागरिक, दोनों क्षेत्रों की जरूरतें पूरी कर सके।
इसके अलावा, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक रवि के ने भी इसे कंपनी के लिए बड़ा पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि परीक्षण पायलटों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में इन स्वदेशी विमानों और हेलीकॉप्टरों का परीक्षण किया, ताकि उन्हें प्रमाणन के योग्य बनाया जा सके। यानी यह उपलब्धि केवल कारखाने में उत्पादन की नहीं, बल्कि डिजाइन, परीक्षण, प्रमाणन और परिचालन उपयोग तक पहुंचने की पूरी स्वदेशी क्षमता का प्रदर्शन है।
रक्षा मंत्री ने युवा वैज्ञानिकों, अभियंताओं, डिजाइनरों, परीक्षण पायलटों और तकनीशियनों से ऐसी तकनीक विकसित करने की चुनौती स्वीकार करने का आह्वान किया जो आज भारत के पास मौजूद ही नहीं है। लक्ष्य अगले दशक में वैश्विक विमानन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को अग्रणी स्थान दिलाना है।
यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा रणनीतिक संदेश छिपा है। विमानन आत्मनिर्भरता किसी एक विमान, एक कंपनी या एक सरकारी आदेश से हासिल नहीं होगी। यह इंजन, रडार, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों, सेंसर, परीक्षण क्षमता, सामग्री, डिजाइन और निजी उद्योग, सभी को जोड़कर बनने वाली लंबी श्रृंखला है। राजनाथ सिंह ने भी कहा कि इस क्षेत्र में अचानक कोई बड़ा चमत्कार नहीं हो सकता; हर उपलब्धि एक लंबी सीढ़ी की एक पायदान है।
लेकिन इस सीढ़ी पर चढ़ते समय गति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल स्वदेशी उत्पाद बनाना नहीं, बल्कि उन्हें समय पर, विश्वसनीय तकनीक के साथ और पर्याप्त संख्या में उपलब्ध कराना भी है। एचटीटी-40, तेजस प्रशिक्षक और ध्रुव एनजी की उपलब्धियां इस दिशा में आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, लेकिन तेजस एमके-1ए की देरी यह कठोर याद दिलाती है कि रक्षा क्षेत्र में देर का मतलब केवल बढ़ी हुई लागत नहीं होता, कभी-कभी देर सीधे सामरिक अवसरों की कीमत भी वसूलती है।
बहरहाल, भारत के सामने अब चुनौती स्पष्ट है। स्वदेशीकरण की यात्रा को उपलब्धियों की सुर्खियों से आगे ले जाकर समयबद्ध उत्पादन, अत्याधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर आपूर्ति की क्षमता में बदलना होगा। क्योंकि भविष्य के युद्ध केवल बेहतर हथियारों से नहीं, बल्कि सही समय पर उपलब्ध सही संख्या में हथियारों से तय होंगे।

