बेगूसराय में गंगा नदी का रौद्र रूप अब धीरे-धीरे शांत हो रहा है और जलस्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। गंगा का जलस्तर अपने उच्चतम स्तर से करीब 1.22 मीटर नीचे आ चुका है, जिससे लोगों ने राहत की सांस ली है। हालांकि खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है, क्योंकि नदी अभी भी खतरे के निशान 41.76 मीटर से 54 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है। जलस्तर घटने के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि प्रभावित लोगों की दुश्वारियां कम होने के बजाय और बढ़ गई हैं। जिले के 80 प्रतिशत से अधिक घरों से पानी निकल चुका है, लेकिन करीब 15 प्रतिशत घरों में अभी भी जलजमाव बना हुआ है। ये ऐसे इलाके हैं, जहां पानी की निकासी का कोई सीधा रास्ता नहीं है। पानी उतरने के साथ ही अब मलबे, दलदल, दुर्गंध और संक्रामक बीमारियों का खौफ फैल गया है। बेगूसराय नगर निगम क्षेत्र के कैलाशपुर गांव की सड़क पर अभी भी घुटने तक पानी भरा हुआ है। घरों के निचले हिस्से रहने लायक नहीं बचे हैं, जिसके कारण अधिकांश लोग छतों पर रहने को मजबूर है। इंसान तो इंसान, बेजुबान मवेशियों को भी छतों पर ही शरण दी गई है। बेगूसराय नगर निगम क्षेत्र के कैलाशपुर गांव की 3 तस्वीरें देखिए बाढ़ पीड़ित बोले- घर में चार से पांच फीट तक घुसा पानी कैलाशपुर गांव के निवासी मुकेश शर्मा ने बताया कि घर में चार से पांच फीट तक पानी घुस गया था। नीचे मवेशियों को रखते तो वे डूबकर मर जाते। किसी तरह लकड़ी का जुगाड़ करके और सीढ़ियों से ठेल-ठालकर गाय को छत पर चढ़ाया गया। पिछले साल बाढ़ के समय उनकी 3-4 गायें पानी और बीमारी की वजह से मर गई थीं, इसलिए इस बार बाढ़ आने से पहले ही कर्ज लेकर जैसे-तैसे छत पर ढलाई और एसबेस्टस डालकर रहने का इंतजाम किया गया। शारीरिक रूप से दिव्यांग मुकेश शर्मा ने बताया कि सरकार की तरफ से अंदर गांव में कोई देखने वाला नहीं है। जो लोग मुख्य सड़क पर हैं, उन्हें राहत सामग्री मिल भी रही है, लेकिन अंदर फंसे दिव्यांग और निसहाय लोग सड़क तक नहीं जा पा रहे हैं। बाढ़ से सबसे अधिक पशुपालक और किसान प्रभावित बाढ़ के कारण सबसे अधिक मार पशुपालकों और किसानों पर पड़ी है। दियारा क्षेत्रों में खेत में लगी हरे चारे की फसल पूरी तरह पानी में डूबकर सड़ चुकी है। खेतों में हरा चारा नहीं बचने के कारण पशुपालकों को मवेशियों के लिए ऊंचे दामों पर सूखा चारा खरीदना पड़ रहा है। घर के नीचे दलदल और जहरीले जीव-जंतुओं के खतरे के कारण लोग पानी घटने के बाद भी पशुओं को नीचे उतारने का जोखिम नहीं ले रहे हैं। चारे की कमी और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन भी बुरी तरह गिर गया है। महिलाएं बोलीं- छत पर ही खाना बनता है, यहीं सोना घर के निचले कमरों में पानी और नमी होने के कारण मिट्टी के चूल्हे पूरी तरह गलकर नष्ट हो चुके हैं। महिलाओं के सामने परिवार के लिए भोजन का इंतजाम करना बड़ी चुनौती है। महिलाओं ने बताया कि पानी थोड़ा घटने के बाद जब वे घर लौटीं, तो नीचे हर तरफ कीचड़ और पानी था। नीचे चूल्हा जलाने की जगह न होने के कारण अब छत पर ही ईंटें जोड़कर चूल्हा बनाया गया है। बाढ़ का पानी कम होने के बाद सड़े हुए चारे, ठहरे हुए पानी और मलबे के कारण मच्छर व जहरीले कीट पनप रहे हैं, जिससे महामारी का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि बिना निकासी वाले घरों और गलियों से पंप लगाकर पानी निकाला जाए, महामारी से बचाव के लिए गांव-गांव में चूना और ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव किया जाए। पानी बढ़ा तो ऊंचे इलाकों में गए, लौटे तो घर में कींचड़ पानी भरा गांव की एक महिला सीता देवी ने बताया कि जब बाढ़ का पानी बढ़ा तो हम बाल-बच्चों और सामान के साथ जान बचाकर गांव के बाहर स्कूल और ऊंचे स्थानों पर चले गए थे। पानी थोड़ा घटा तो घर लौटे, लेकिन नीचे हर तरफ कीचड़ और पानी है। नीचे चूल्हा जलाने की जगह नहीं बची है। इसलिए अब छत पर ही ईंटें जोड़कर चूल्हा बनाया है और जैसे-तैसे खाना बनाकर बच्चों का पेट भर रहे हैं। छत पर खाना बना रही सविता देवी ने कहा कि जब भी बाढ़ आती है, नीचे का सब कुछ बह जाता है। नीचे रहने की कोई व्यवस्था नहीं है। हम लोग हर साल इसी तरह छतों पर ही चूल्हा-चौका सेट करते हैं और जैसे-तैसे जिंदगी काटते हैं। यह कोई एक साल की परेशानी नहीं है। हर साल बाढ़ आता है तो ऐसी ही जलालत झेलनी पड़ती है। क्या करें मजबूरी ही ऐसी है। बेगूसराय में गंगा नदी का रौद्र रूप अब धीरे-धीरे शांत हो रहा है और जलस्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। गंगा का जलस्तर अपने उच्चतम स्तर से करीब 1.22 मीटर नीचे आ चुका है, जिससे लोगों ने राहत की सांस ली है। हालांकि खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है, क्योंकि नदी अभी भी खतरे के निशान 41.76 मीटर से 54 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है। जलस्तर घटने के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि प्रभावित लोगों की दुश्वारियां कम होने के बजाय और बढ़ गई हैं। जिले के 80 प्रतिशत से अधिक घरों से पानी निकल चुका है, लेकिन करीब 15 प्रतिशत घरों में अभी भी जलजमाव बना हुआ है। ये ऐसे इलाके हैं, जहां पानी की निकासी का कोई सीधा रास्ता नहीं है। पानी उतरने के साथ ही अब मलबे, दलदल, दुर्गंध और संक्रामक बीमारियों का खौफ फैल गया है। बेगूसराय नगर निगम क्षेत्र के कैलाशपुर गांव की सड़क पर अभी भी घुटने तक पानी भरा हुआ है। घरों के निचले हिस्से रहने लायक नहीं बचे हैं, जिसके कारण अधिकांश लोग छतों पर रहने को मजबूर है। इंसान तो इंसान, बेजुबान मवेशियों को भी छतों पर ही शरण दी गई है। बेगूसराय नगर निगम क्षेत्र के कैलाशपुर गांव की 3 तस्वीरें देखिए बाढ़ पीड़ित बोले- घर में चार से पांच फीट तक घुसा पानी कैलाशपुर गांव के निवासी मुकेश शर्मा ने बताया कि घर में चार से पांच फीट तक पानी घुस गया था। नीचे मवेशियों को रखते तो वे डूबकर मर जाते। किसी तरह लकड़ी का जुगाड़ करके और सीढ़ियों से ठेल-ठालकर गाय को छत पर चढ़ाया गया। पिछले साल बाढ़ के समय उनकी 3-4 गायें पानी और बीमारी की वजह से मर गई थीं, इसलिए इस बार बाढ़ आने से पहले ही कर्ज लेकर जैसे-तैसे छत पर ढलाई और एसबेस्टस डालकर रहने का इंतजाम किया गया। शारीरिक रूप से दिव्यांग मुकेश शर्मा ने बताया कि सरकार की तरफ से अंदर गांव में कोई देखने वाला नहीं है। जो लोग मुख्य सड़क पर हैं, उन्हें राहत सामग्री मिल भी रही है, लेकिन अंदर फंसे दिव्यांग और निसहाय लोग सड़क तक नहीं जा पा रहे हैं। बाढ़ से सबसे अधिक पशुपालक और किसान प्रभावित बाढ़ के कारण सबसे अधिक मार पशुपालकों और किसानों पर पड़ी है। दियारा क्षेत्रों में खेत में लगी हरे चारे की फसल पूरी तरह पानी में डूबकर सड़ चुकी है। खेतों में हरा चारा नहीं बचने के कारण पशुपालकों को मवेशियों के लिए ऊंचे दामों पर सूखा चारा खरीदना पड़ रहा है। घर के नीचे दलदल और जहरीले जीव-जंतुओं के खतरे के कारण लोग पानी घटने के बाद भी पशुओं को नीचे उतारने का जोखिम नहीं ले रहे हैं। चारे की कमी और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन भी बुरी तरह गिर गया है। महिलाएं बोलीं- छत पर ही खाना बनता है, यहीं सोना घर के निचले कमरों में पानी और नमी होने के कारण मिट्टी के चूल्हे पूरी तरह गलकर नष्ट हो चुके हैं। महिलाओं के सामने परिवार के लिए भोजन का इंतजाम करना बड़ी चुनौती है। महिलाओं ने बताया कि पानी थोड़ा घटने के बाद जब वे घर लौटीं, तो नीचे हर तरफ कीचड़ और पानी था। नीचे चूल्हा जलाने की जगह न होने के कारण अब छत पर ही ईंटें जोड़कर चूल्हा बनाया गया है। बाढ़ का पानी कम होने के बाद सड़े हुए चारे, ठहरे हुए पानी और मलबे के कारण मच्छर व जहरीले कीट पनप रहे हैं, जिससे महामारी का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि बिना निकासी वाले घरों और गलियों से पंप लगाकर पानी निकाला जाए, महामारी से बचाव के लिए गांव-गांव में चूना और ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव किया जाए। पानी बढ़ा तो ऊंचे इलाकों में गए, लौटे तो घर में कींचड़ पानी भरा गांव की एक महिला सीता देवी ने बताया कि जब बाढ़ का पानी बढ़ा तो हम बाल-बच्चों और सामान के साथ जान बचाकर गांव के बाहर स्कूल और ऊंचे स्थानों पर चले गए थे। पानी थोड़ा घटा तो घर लौटे, लेकिन नीचे हर तरफ कीचड़ और पानी है। नीचे चूल्हा जलाने की जगह नहीं बची है। इसलिए अब छत पर ही ईंटें जोड़कर चूल्हा बनाया है और जैसे-तैसे खाना बनाकर बच्चों का पेट भर रहे हैं। छत पर खाना बना रही सविता देवी ने कहा कि जब भी बाढ़ आती है, नीचे का सब कुछ बह जाता है। नीचे रहने की कोई व्यवस्था नहीं है। हम लोग हर साल इसी तरह छतों पर ही चूल्हा-चौका सेट करते हैं और जैसे-तैसे जिंदगी काटते हैं। यह कोई एक साल की परेशानी नहीं है। हर साल बाढ़ आता है तो ऐसी ही जलालत झेलनी पड़ती है। क्या करें मजबूरी ही ऐसी है।

