नालंदा के बिहार थाना क्षेत्र स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल से तीन साल पहले नवजात बच्चे के गायब होने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने बिहार थाना के थानाध्यक्ष सम्राट दीपक को तत्काल एसआईटी से हटाने और उनका तबादला जिले से बाहर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान नालंदा एसपी हृदय कांत और एसी टू महाधिवक्ता शाश्वत अग्रवाल भी कोर्ट में मौजूद थे। एसपी ने अदालत को भरोसा दिया कि थानाध्यक्ष का तुरंत तबादला किया जाएगा और उनकी जगह निष्पक्ष छवि वाले योग्य अधिकारी को एसआईटी में शामिल किया जाएगा। दो महीने तक FIR नहीं हुई, कोर्ट ने जताई नाराजगी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मामले में शुरू से हुई पुलिस और प्रशासनिक लापरवाही पर नाराजगी जताई। अदालत के सामने यह बात आई कि बच्चे के गायब होने की शिकायत के बाद करीब दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पीड़ित पिता अविनाश कुमार ने कोर्ट को बताया कि वह बच्चे के गायब होने के तुरंत बाद बिहार थाना पहुंचे थे, लेकिन तत्कालीन थानाध्यक्ष नीरज कुमार ने करीब दो महीने तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्हें लगातार थाने और अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। कोर्ट ने निर्देश दिया कि शुरुआत में एफआईआर दर्ज नहीं करने और जांच में लापरवाही बरतने वाले तत्कालीन अधिकारियों की पहचान की जाए। अगर कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। पिता ने थानाध्यक्ष पर धमकी देने का लगाया आरोप सुनवाई के दौरान पीड़ित पिता और उनके भाई से कोर्ट ने सीधे बातचीत की। अविनाश कुमार ने मौजूदा बिहार थाना थानाध्यक्ष सम्राट दीपक पर मानसिक रूप से परेशान करने और दबाव बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बच्चे की पहचान के लिए डीएनए जांच की प्रक्रिया के दौरान उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर वह पीछे नहीं हटे तो अगले दस साल तक मुकदमे में फंसाकर बर्बाद कर दिया जाएगा। कोर्ट ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया और नालंदा एसपी को पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला, ‘गोल्डन ऑवर’ पर जोर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे के गायब होने की सूचना मिलने पर पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बचपन बचाओ आंदोलन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर पुलिस शुरुआती घंटों में कार्रवाई नहीं करती है तो बच्चे को खोजने और मानव तस्करी जैसे मामलों की कड़ियां पकड़ने में मुश्किल बढ़ जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं करना और उसके बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच में समय लगना गंभीर लापरवाही का मामला है। थानों में संवेदनशील अफसरों की तैनाती की बात सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बच्चों के गायब होने के मामलों को लेकर पुलिस की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाए। अदालत ने हाल में हुए किशोर न्याय से जुड़े राज्य स्तरीय सम्मेलन का जिक्र करते हुए कहा कि बिहार में एक साल में 14,500 से ज्यादा बच्चों के गायब होने की बात पुलिस महानिदेशक की ओर से बताई गई थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को देखते हुए थानों की कमान संवेदनशील और सजग अधिकारियों को दी जानी चाहिए। अदालत ने अधिकारियों की तैनाती से पहले उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए ‘एटीट्यूडनल टेस्ट’ जैसे उपाय पर भी विचार करने की बात कही। सीलबंद लिफाफे में केस डायरी और जांच रिपोर्ट पेश पिछली सुनवाई के आदेश के तहत नालंदा एसपी हृदय कांत खुद कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने केस डायरी और जांच की प्रगति रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने रखी। दोनों पक्षों के वकीलों की मौजूदगी में कोर्ट ने रिपोर्ट देखी। जांच के संवेदनशील तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया गया और रिपोर्ट को दोबारा सीलबंद कर हाईकोर्ट के महानिबंधक के संरक्षण में रखने का आदेश दिया गया। सुनवाई में यह भी बताया गया कि पटना स्थित एफएसएल से महत्वपूर्ण जांच रिपोर्ट मिल चुकी है। इसके आधार पर नवजीवन शिशु अस्पताल का निबंधन रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू की गई है। 36 नवजात भर्ती हुए थे, 34 परिवारों का सत्यापन नालंदा एसपी ने कोर्ट को बताया कि 23 मार्च 2023 से 11 अप्रैल 2023 के बीच नवजीवन शिशु अस्पताल में कुल 36 नवजात बच्चों को भर्ती कराया गया था। पुलिस अब तक इनमें से 34 बच्चों के परिजनों का भौतिक सत्यापन कर चुकी है। बाकी परिवारों का सत्यापन भी किया जा रहा है। पुलिस का उद्देश्य यह पता लगाना है कि इस दौरान किसी बच्चे के साथ अवैध लेनदेन या अदला-बदली तो नहीं हुई। दस्तावेज में ‘मेल’ से ‘फीमेल’ करने का दावा याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव कुमार सक्सेना ने कोर्ट में जांच से जुड़े फोरेंसिक तथ्यों की जानकारी दी। उनके अनुसार अस्पताल से जब्त दस्तावेजों की एफएसएल जांच में रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की बात सामने आई है। अधिवक्ता के मुताबिक, एक बच्चे के रिकॉर्ड में जहां ‘मेल’ लिखा था, उसके आगे ‘FE’ जोड़कर उसे ‘फीमेल’ बनाने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि एफएसएल रिपोर्ट में दस्तावेजों में हुई इस तरह की छेड़छाड़ की पुष्टि हुई है। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि आरोपी डॉक्टर और अस्पताल के कर्मचारियों के पॉलीग्राफ टेस्ट में उनके बयानों को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। इन दावों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही सामने आएगा। डॉक्टर की पत्नी के सेंटर की भी जांच नालंदा एसपी ने कोर्ट को बताया कि जांच का दायरा बढ़ाया गया है। उस समय दूसरे निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में भर्ती हुए नवजातों का भी रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है। मुख्य आरोपी डॉ. ब्रजेश कुमार की पत्नी के मैटरनिटी सेंटर में भर्ती बच्चों का भी सत्यापन कराया जा रहा है। पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है कि अस्पताल पर कार्रवाई की जानकारी मिलने के बाद कोई उपकरण या सामग्री वहां से दूसरे सेंटर में तो नहीं ले जाई गई। एसपी ने यह भी कहा कि नवजातों की चोरी या खरीद-बिक्री में अंतर-जिला या अंतरराज्यीय गिरोह की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। इस दिशा में भी जांच की जा रही है। अग्रिम जमानत पर बाहर डॉक्टर से जांच में सहयोग मांगा आरोपी डॉक्टर डॉ. ब्रजेश कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर सिंह ने कोर्ट में कहा कि अस्पताल सील किए जाने के बाद भी उन्हें जांच रिपोर्ट की प्रति नहीं मिली है। कोर्ट ने रिपोर्ट की एक प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। वहीं, नालंदा एसपी ने कहा कि डॉक्टर को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली हुई है, लेकिन वह पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। डॉक्टर के वकील ने इस आरोप से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि अगर जांच में सहयोग नहीं किया जाता या महत्वपूर्ण तथ्य अथवा साक्ष्य छिपाने की कोशिश सामने आती है तो पुलिस कानून के तहत जमानत रद्द कराने समेत जरूरी कार्रवाई कर सकती है। केस वापस लेने के दबाव का आरोप, सुरक्षा देने का आदेश पीड़ित पिता अविनाश कुमार ने कोर्ट में यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोगों की ओर से उन पर केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने छबीलापुर थाना क्षेत्र के जुगेश गोप उर्फ मास्टर और सिलाव थाना क्षेत्र के सुतील यादव के नाम बताए। कोर्ट ने नालंदा एसपी को दोनों के बारे में आरोपों का सत्यापन कराने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि अगर जांच में यह सामने आता है कि उन्होंने पीड़ित परिवार को धमकाया या केस वापस लेने का दबाव बनाया, तो उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को पर्याप्त सुरक्षा देने का भी निर्देश दिया है। 2023 में अस्पताल से गायब हुआ था नवजात मामला मार्च-अप्रैल 2023 का है। अविनाश कुमार का नवजात बच्चा इलाज के लिए बिहार शरीफ के नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती था। परिवार का आरोप है कि अस्पताल में भर्ती कराने के कुछ दिन बाद बच्चा गायब हो गया। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर पर बच्चे को गायब करने का आरोप लगाया। उनका यह भी आरोप है कि बाद में अस्पताल के रिकॉर्ड में हेरफेर की गई। बच्चे के गायब होने के बाद एफआईआर दर्ज कराने के लिए परिवार ने बिहार थाना का रुख किया, लेकिन करीब दो महीने तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई। बाद में प्रशासनिक स्तर पर शिकायत और जांच के बाद मामला आगे बढ़ा। इसके बाद पीड़ित पिता ने बच्चे की बरामदगी और मामले की जांच की मांग को लेकर पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 6 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर 2026 को तय की है। नालंदा एसपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में उपस्थित होकर जांच की प्रगति बतानी होगी। अदालत ने थानाध्यक्ष को एसआईटी से हटाने और उनका तबादला करने, पीड़ित परिवार की सुरक्षा, केस वापस लेने के दबाव के आरोपों की जांच, लापरवाह अधिकारियों की पहचान और पूरे अनुसंधान की प्रगति की अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। नालंदा के बिहार थाना क्षेत्र स्थित नवजीवन शिशु अस्पताल से तीन साल पहले नवजात बच्चे के गायब होने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ ने बिहार थाना के थानाध्यक्ष सम्राट दीपक को तत्काल एसआईटी से हटाने और उनका तबादला जिले से बाहर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान नालंदा एसपी हृदय कांत और एसी टू महाधिवक्ता शाश्वत अग्रवाल भी कोर्ट में मौजूद थे। एसपी ने अदालत को भरोसा दिया कि थानाध्यक्ष का तुरंत तबादला किया जाएगा और उनकी जगह निष्पक्ष छवि वाले योग्य अधिकारी को एसआईटी में शामिल किया जाएगा। दो महीने तक FIR नहीं हुई, कोर्ट ने जताई नाराजगी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मामले में शुरू से हुई पुलिस और प्रशासनिक लापरवाही पर नाराजगी जताई। अदालत के सामने यह बात आई कि बच्चे के गायब होने की शिकायत के बाद करीब दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पीड़ित पिता अविनाश कुमार ने कोर्ट को बताया कि वह बच्चे के गायब होने के तुरंत बाद बिहार थाना पहुंचे थे, लेकिन तत्कालीन थानाध्यक्ष नीरज कुमार ने करीब दो महीने तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्हें लगातार थाने और अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। कोर्ट ने निर्देश दिया कि शुरुआत में एफआईआर दर्ज नहीं करने और जांच में लापरवाही बरतने वाले तत्कालीन अधिकारियों की पहचान की जाए। अगर कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। पिता ने थानाध्यक्ष पर धमकी देने का लगाया आरोप सुनवाई के दौरान पीड़ित पिता और उनके भाई से कोर्ट ने सीधे बातचीत की। अविनाश कुमार ने मौजूदा बिहार थाना थानाध्यक्ष सम्राट दीपक पर मानसिक रूप से परेशान करने और दबाव बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बच्चे की पहचान के लिए डीएनए जांच की प्रक्रिया के दौरान उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर वह पीछे नहीं हटे तो अगले दस साल तक मुकदमे में फंसाकर बर्बाद कर दिया जाएगा। कोर्ट ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया और नालंदा एसपी को पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला, ‘गोल्डन ऑवर’ पर जोर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे के गायब होने की सूचना मिलने पर पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बचपन बचाओ आंदोलन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर पुलिस शुरुआती घंटों में कार्रवाई नहीं करती है तो बच्चे को खोजने और मानव तस्करी जैसे मामलों की कड़ियां पकड़ने में मुश्किल बढ़ जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दो महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं करना और उसके बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच में समय लगना गंभीर लापरवाही का मामला है। थानों में संवेदनशील अफसरों की तैनाती की बात सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बच्चों के गायब होने के मामलों को लेकर पुलिस की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाए। अदालत ने हाल में हुए किशोर न्याय से जुड़े राज्य स्तरीय सम्मेलन का जिक्र करते हुए कहा कि बिहार में एक साल में 14,500 से ज्यादा बच्चों के गायब होने की बात पुलिस महानिदेशक की ओर से बताई गई थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को देखते हुए थानों की कमान संवेदनशील और सजग अधिकारियों को दी जानी चाहिए। अदालत ने अधिकारियों की तैनाती से पहले उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए ‘एटीट्यूडनल टेस्ट’ जैसे उपाय पर भी विचार करने की बात कही। सीलबंद लिफाफे में केस डायरी और जांच रिपोर्ट पेश पिछली सुनवाई के आदेश के तहत नालंदा एसपी हृदय कांत खुद कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने केस डायरी और जांच की प्रगति रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने रखी। दोनों पक्षों के वकीलों की मौजूदगी में कोर्ट ने रिपोर्ट देखी। जांच के संवेदनशील तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया गया और रिपोर्ट को दोबारा सीलबंद कर हाईकोर्ट के महानिबंधक के संरक्षण में रखने का आदेश दिया गया। सुनवाई में यह भी बताया गया कि पटना स्थित एफएसएल से महत्वपूर्ण जांच रिपोर्ट मिल चुकी है। इसके आधार पर नवजीवन शिशु अस्पताल का निबंधन रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू की गई है। 36 नवजात भर्ती हुए थे, 34 परिवारों का सत्यापन नालंदा एसपी ने कोर्ट को बताया कि 23 मार्च 2023 से 11 अप्रैल 2023 के बीच नवजीवन शिशु अस्पताल में कुल 36 नवजात बच्चों को भर्ती कराया गया था। पुलिस अब तक इनमें से 34 बच्चों के परिजनों का भौतिक सत्यापन कर चुकी है। बाकी परिवारों का सत्यापन भी किया जा रहा है। पुलिस का उद्देश्य यह पता लगाना है कि इस दौरान किसी बच्चे के साथ अवैध लेनदेन या अदला-बदली तो नहीं हुई। दस्तावेज में ‘मेल’ से ‘फीमेल’ करने का दावा याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव कुमार सक्सेना ने कोर्ट में जांच से जुड़े फोरेंसिक तथ्यों की जानकारी दी। उनके अनुसार अस्पताल से जब्त दस्तावेजों की एफएसएल जांच में रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की बात सामने आई है। अधिवक्ता के मुताबिक, एक बच्चे के रिकॉर्ड में जहां ‘मेल’ लिखा था, उसके आगे ‘FE’ जोड़कर उसे ‘फीमेल’ बनाने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि एफएसएल रिपोर्ट में दस्तावेजों में हुई इस तरह की छेड़छाड़ की पुष्टि हुई है। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि आरोपी डॉक्टर और अस्पताल के कर्मचारियों के पॉलीग्राफ टेस्ट में उनके बयानों को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। इन दावों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही सामने आएगा। डॉक्टर की पत्नी के सेंटर की भी जांच नालंदा एसपी ने कोर्ट को बताया कि जांच का दायरा बढ़ाया गया है। उस समय दूसरे निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में भर्ती हुए नवजातों का भी रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है। मुख्य आरोपी डॉ. ब्रजेश कुमार की पत्नी के मैटरनिटी सेंटर में भर्ती बच्चों का भी सत्यापन कराया जा रहा है। पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है कि अस्पताल पर कार्रवाई की जानकारी मिलने के बाद कोई उपकरण या सामग्री वहां से दूसरे सेंटर में तो नहीं ले जाई गई। एसपी ने यह भी कहा कि नवजातों की चोरी या खरीद-बिक्री में अंतर-जिला या अंतरराज्यीय गिरोह की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। इस दिशा में भी जांच की जा रही है। अग्रिम जमानत पर बाहर डॉक्टर से जांच में सहयोग मांगा आरोपी डॉक्टर डॉ. ब्रजेश कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर सिंह ने कोर्ट में कहा कि अस्पताल सील किए जाने के बाद भी उन्हें जांच रिपोर्ट की प्रति नहीं मिली है। कोर्ट ने रिपोर्ट की एक प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। वहीं, नालंदा एसपी ने कहा कि डॉक्टर को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली हुई है, लेकिन वह पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। डॉक्टर के वकील ने इस आरोप से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि अगर जांच में सहयोग नहीं किया जाता या महत्वपूर्ण तथ्य अथवा साक्ष्य छिपाने की कोशिश सामने आती है तो पुलिस कानून के तहत जमानत रद्द कराने समेत जरूरी कार्रवाई कर सकती है। केस वापस लेने के दबाव का आरोप, सुरक्षा देने का आदेश पीड़ित पिता अविनाश कुमार ने कोर्ट में यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोगों की ओर से उन पर केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने छबीलापुर थाना क्षेत्र के जुगेश गोप उर्फ मास्टर और सिलाव थाना क्षेत्र के सुतील यादव के नाम बताए। कोर्ट ने नालंदा एसपी को दोनों के बारे में आरोपों का सत्यापन कराने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि अगर जांच में यह सामने आता है कि उन्होंने पीड़ित परिवार को धमकाया या केस वापस लेने का दबाव बनाया, तो उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को पर्याप्त सुरक्षा देने का भी निर्देश दिया है। 2023 में अस्पताल से गायब हुआ था नवजात मामला मार्च-अप्रैल 2023 का है। अविनाश कुमार का नवजात बच्चा इलाज के लिए बिहार शरीफ के नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती था। परिवार का आरोप है कि अस्पताल में भर्ती कराने के कुछ दिन बाद बच्चा गायब हो गया। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर पर बच्चे को गायब करने का आरोप लगाया। उनका यह भी आरोप है कि बाद में अस्पताल के रिकॉर्ड में हेरफेर की गई। बच्चे के गायब होने के बाद एफआईआर दर्ज कराने के लिए परिवार ने बिहार थाना का रुख किया, लेकिन करीब दो महीने तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई। बाद में प्रशासनिक स्तर पर शिकायत और जांच के बाद मामला आगे बढ़ा। इसके बाद पीड़ित पिता ने बच्चे की बरामदगी और मामले की जांच की मांग को लेकर पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 6 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर 2026 को तय की है। नालंदा एसपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में उपस्थित होकर जांच की प्रगति बतानी होगी। अदालत ने थानाध्यक्ष को एसआईटी से हटाने और उनका तबादला करने, पीड़ित परिवार की सुरक्षा, केस वापस लेने के दबाव के आरोपों की जांच, लापरवाह अधिकारियों की पहचान और पूरे अनुसंधान की प्रगति की अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

