जब बैलगाड़ियों में भरकर लाई जाती थी फिल्म की कमाई, ‘हनुमान अंश’ ही नहीं आस्था पर बनी हैं कई मूवीज, एक को अंग्रेजों ने किया था बैन

जब बैलगाड़ियों में भरकर लाई जाती थी फिल्म की कमाई, ‘हनुमान अंश’ ही नहीं आस्था पर बनी हैं कई मूवीज, एक को अंग्रेजों ने किया था बैन

Films on faith in Indian Cinema: इस समय बॉक्स ऑफिस पर नीम करौली बाबा के आध्यात्मिक जीवन पर बनी फिल्म हनुमान अंश’ को रिलीज हुए 35 दिन हो गए हैं और ये 200 करोड़ के क्लब में एंट्री मारने वाली है। फिल्म का बजट महज 1.8 करोड़ है और ये हर रोज सफलता का परचम लहरा रही है। लेकिन ये पहली फिल्म नहीं है जो आस्था पर बनी है और जिसे लोगों ने खूब पसंद किया है। आइये जानते हैं कुछ ऐसी ही फिल्मों के बारे में…

हनुमान अंश के अलावा आस्था पर बनी है ये फिल्में

आस्था पर आधारित फिल्मों की अपार सफलता ने भारतीय सिनेमा के उस सबसे पुराने और ऐतिहासिक जॉनर (Genre) को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है, जिसे आधुनिक दौर में लगभग भुला दिया गया था। भारत में भक्ति और आस्था पर आधारित फिल्मों का इतिहास 1920 के दशक की ‘साइलेंट’ फिल्मों के दौर से ही बेहद समृद्ध और प्रभावकारी रहा है। एक दौर था जब इन फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़े थे बल्कि देश के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को भी गहराई से प्रभावित किया था।

बैलगाड़ियों से लाई जाती थी इस फिल्म की कमाई

भारतीय सिनेमा के धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से जाना जाता था। उनकी फिल्म लंका दहन जो साल 1917 में आई थी उसे लेकर ‘माधुरी’ मैगजीन ने एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि मद्रास में इस फिल्म की कमाई के पैसों को पुलिस सुरक्षा के बीच बैलगाड़ियों में भरकर लाया जाता था।

इतना ही नहीं, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी इन भक्ति-प्रधान फिल्मों का जमकर इस्तेमाल हुआ। 1921 में बनी फिल्म ‘भक्त विदुर’ में महाभारत के बुद्धिमान मंत्री विदुर को गांधी टोपी पहने दिखाया गया था, जिससे घबराकर अंग्रेज सरकार ने इस फिल्म पर बैन लगा दिया था। वहीं, विजय भट्ट की 1943 में आई ‘राम राज्य’ एकमात्र ऐसी भारतीय फिल्म बनी, जिसे महात्मा गांधी ने देखा था।

‘जय संतोषी मां’ का ऐतिहासिक चमत्कार और संतों की गाथा

1931 से 1991 के बीच भारतीय सिनेमा में पौराणिक और भक्ति फिल्मों की बाढ़ सी आ गई। इस दौरान कम से कम 25 फिल्मों के नाम में ‘सती’ शब्द शामिल था, जबकि 10 से ज्यादा फिल्में भारत के महान संतों के जीवन पर बनाई गईं थीं।

साल 1975 में रिलीज हुई ‘जय संतोषी मां’ ने जो सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति रची, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। उसी साल रिलीज हुई ‘शोले’ जैसी मेगा-बजट फिल्म के साथ ‘जय संतोषी मां’ की अप्रत्याशित सफलता ने पूरे देश को चकित कर दिया था। इस फिल्म के बाद भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी संतोषी माता के हजारों मंदिर बन गए थे।

संस्कृत फिल्म ‘आदि शंकराचार्य’ से लेकर ‘रामायण’ का युग

साल 1980 के दशक में जी.वी. अय्यर ने ‘आदि शंकराचार्य’ (1983) के रूप में देश की पहली संस्कृत फिल्म बनाई, जिसने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म सहित 4 नेशनल पुरस्कार अपने नाम किए। हालांकि, 80 के दशक में बनी लगभग 25 हिंदी भक्ति फिल्में सिनेमाघरों में खास जादू नहीं चला सकीं।

लेकिन जब सिनेमाघरों में यह जॉनर सुस्त पड़ा, तब छोटे पर्दे (टेलीविजन) ने इतिहास रच दिया। 1980 के दशक के अंत में दूरदर्शन पर प्रसारित रामानंद सागर की ‘रामायण’ (1987-88) और बी.आर. चोपड़ा की ‘महाभारत’ (1988-90) ने पूरे देश को टीवी स्क्रीन के सामने ला खड़ा किया और यह देशवासियों की रविवार की राष्ट्रीय आदत बन गई थी। अब वही दौर एक बार फिर हनुमान अंश के रुप में देखने को मिल रहा है।

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