बोकारो के कसमार प्रखंड के बगियारी इलाके में स्थित मां मंगलचंडी मंदिर करीब 200 साल पुराना है। यह मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां मंगलवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि महिलाएं अंदर प्रवेश नहीं करतीं। वे बाहर से ही मां के दर्शन और पूजा करती हैं। यह मंदिर कसमार-खैराचातर मुख्य मार्ग के पास है और बोकारो जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर है। मां से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं आज भी चल रही स्थानीय लोगों के अनुसार, लगभग 200 साल पहले मां मंगलचंडी माता के शिलापट की पूजा खैर क्षेत्र के बागदा स्थित झा टोला में बेल के पेड़ के नीचे होती थी। समय के साथ पूजा स्थल बदला, लेकिन मां से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं आज भी चल रही हैं। मंदिर से जुड़ी एक और अलग परंपरा बलि की है। यहां सिर्फ काले बकरे की बलि दी जाती है। बलि के बाद बकरे के सिर को मंदिर परिसर की जमीन में ही गाड़ दिया जाता है। मान्यता है कि उस सिर को कोई नहीं खाता। ग्रामीणों का यह भी मानना है कि ऐसा करने से व्यक्ति बहरा हो सकता है। बलि के समय महिलाओं को हटा दिया जाता है
बलि के समय पास में माता वैष्णवो मंदिर है, उस मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और महिलाओं को वहां से हटा दिया जाता है। महिलाओं के जाने के बाद ही बलि की प्रक्रिया होती है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालुओं के परिवार, रिश्तेदार और परिचित पुरुष प्रसाद के रूप में बकरे के मांस का सेवन करते हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार इस प्रसाद को मंदिर परिसर से बाहर नहीं ले जाया जाता। साथ ही बलि के दौरान शराब का सेवन भी वर्जित माना जाता है।
मंगलवार को मंदिर में पूजा के साथ मुंडन संस्कार भी कराया जाता है। दूर-दराज के गांवों से परिवार बच्चों को लेकर यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां मंगलचंडी शक्ति का स्वरूप है और यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है।
मंदिर निर्माण की कोशिशें भी रहीं अधूरी
ग्रामीणों के अनुसार, वर्षों से मंदिर के भव्य निर्माण के प्रयास होते रहे हैं। करीब 10 हजार लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों से आकर आर्थिक सहयोग भी किया। कुछ ग्रामीणों ने मिलकर एक मंदिर का निर्माण कराया और उसमें मां मंगलचंडी की स्थापना करने की योजना थी, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। बाद में वहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर मंदिर का नाम वैष्णो मंदिर रखा गया। यह मंदिर मां मंगलचंडी के पूजा स्थल से करीब 10 कदम दूर बना है। मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के बावजूद बिजली, मुख्य सड़क से मंदिर तक रोशनी, सोलर हाईमास्ट, पेयजल और बैठने जैसी सुविधाओं की जरूरत महसूस की जाती है। दो सदियों से चली आ रही मान्यताओं और परंपराओं के कारण मां मंगलचंडी मंदिर आज भी कसमार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। बोकारो के कसमार प्रखंड के बगियारी इलाके में स्थित मां मंगलचंडी मंदिर करीब 200 साल पुराना है। यह मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां मंगलवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि महिलाएं अंदर प्रवेश नहीं करतीं। वे बाहर से ही मां के दर्शन और पूजा करती हैं। यह मंदिर कसमार-खैराचातर मुख्य मार्ग के पास है और बोकारो जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर है। मां से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं आज भी चल रही स्थानीय लोगों के अनुसार, लगभग 200 साल पहले मां मंगलचंडी माता के शिलापट की पूजा खैर क्षेत्र के बागदा स्थित झा टोला में बेल के पेड़ के नीचे होती थी। समय के साथ पूजा स्थल बदला, लेकिन मां से जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं आज भी चल रही हैं। मंदिर से जुड़ी एक और अलग परंपरा बलि की है। यहां सिर्फ काले बकरे की बलि दी जाती है। बलि के बाद बकरे के सिर को मंदिर परिसर की जमीन में ही गाड़ दिया जाता है। मान्यता है कि उस सिर को कोई नहीं खाता। ग्रामीणों का यह भी मानना है कि ऐसा करने से व्यक्ति बहरा हो सकता है। बलि के समय महिलाओं को हटा दिया जाता है
बलि के समय पास में माता वैष्णवो मंदिर है, उस मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और महिलाओं को वहां से हटा दिया जाता है। महिलाओं के जाने के बाद ही बलि की प्रक्रिया होती है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालुओं के परिवार, रिश्तेदार और परिचित पुरुष प्रसाद के रूप में बकरे के मांस का सेवन करते हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार इस प्रसाद को मंदिर परिसर से बाहर नहीं ले जाया जाता। साथ ही बलि के दौरान शराब का सेवन भी वर्जित माना जाता है।
मंगलवार को मंदिर में पूजा के साथ मुंडन संस्कार भी कराया जाता है। दूर-दराज के गांवों से परिवार बच्चों को लेकर यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां मंगलचंडी शक्ति का स्वरूप है और यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है।
मंदिर निर्माण की कोशिशें भी रहीं अधूरी
ग्रामीणों के अनुसार, वर्षों से मंदिर के भव्य निर्माण के प्रयास होते रहे हैं। करीब 10 हजार लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों से आकर आर्थिक सहयोग भी किया। कुछ ग्रामीणों ने मिलकर एक मंदिर का निर्माण कराया और उसमें मां मंगलचंडी की स्थापना करने की योजना थी, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। बाद में वहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर मंदिर का नाम वैष्णो मंदिर रखा गया। यह मंदिर मां मंगलचंडी के पूजा स्थल से करीब 10 कदम दूर बना है। मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के बावजूद बिजली, मुख्य सड़क से मंदिर तक रोशनी, सोलर हाईमास्ट, पेयजल और बैठने जैसी सुविधाओं की जरूरत महसूस की जाती है। दो सदियों से चली आ रही मान्यताओं और परंपराओं के कारण मां मंगलचंडी मंदिर आज भी कसमार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

