Mumbai Vile Parle Case Acquittal: मुंबई के विले पार्ले में करीब एक दशक पहले हुई 24 वर्षीय फिजियोथेरेपिस्ट से दुष्कर्म और हत्या के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने इस मामले में दोषी ठहराए गए सुनार देबाशीष धारा को सुनाई गई मौत की सजा को रद्द कर दिया है। हालांकि, अदालत के विस्तृत फैसले की प्रति सोमवार को उपलब्ध नहीं हो सकी।
यह फैसला न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने सुनाया। पीठ दोषी की ओर से दायर उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने अपनी दोषसिद्धि और मौत की सजा को चुनौती दी थी। इसके साथ ही सत्र अदालत ने मौत की सजा की पुष्टि के लिए जो संदर्भ हाईकोर्ट को भेजा था, उस पर भी सुनवाई हो रही थी।
2016 में विले पार्ले में हुई थी वारदात
यह दिल दहला देने वाली घटना 5 दिसंबर 2016 की तड़के करीब 3 बजे विले पार्ले ईस्ट के श्रद्धानंद रोड स्थित एक चॉल में हुई थी। पीड़िता अपने घर के एक कमरे में सो रही थी। उसी दौरान एक पड़ोसी ने कमरे से धुआं निकलते देखा और उसके पिता को इसकी जानकारी दी।
पिता तुरंत कमरे में पहुंचे। कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था। दरवाजा खोलने पर अंदर धुआं भरा हुआ था और कपड़े तथा किताबें जल रही थीं। उनकी बेटी नग्न अवस्था में पड़ी थी और उसके गले में जींस बंधी हुई थी। यह दृश्य देखकर पिता ने पुलिस को सूचना दी।
CCTV फुटेज से आरोपी तक पहुंची पुलिस, पश्चिम बंगाल से किया गिरफ्तार
जांच के दौरान पुलिस ने इलाके में लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली। जांच एजेंसी के मुताबिक, फुटेज के आधार पर पास की एक आभूषण निर्माण इकाई में काम करने वाले सुनार देबाशीष धारा की पहचान हुई।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपी ने महिला को अकेले सोते हुए देखा था और इसके बाद उसके कमरे में घुस गया। आरोप था कि उसने महिला के साथ दुष्कर्म किया और उसे प्रताड़ित करने के बाद गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद कमरे में मौजूद कपड़ों और किताबों में आग लगा दी गई।
2019 में सत्र अदालत ने सुनाई थी मौत की सजा
4 अक्टूबर 2019 को दिंडोशी सत्र अदालत ने देबाशीष धारा को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ए. डी. देव ने अपने फैसले में अपराध की गंभीरता पर कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि आरोपी ने युवती के साथ दुष्कर्म करने के साथ उसकी हत्या से पहले उसे बुरी तरह प्रताड़ित किया। अदालत ने पीड़िता को पहुंचाई गई चोटों को आरोपी के बेहद क्रूर व्यवहार का प्रमाण माना था।
सत्र अदालत ने इस अपराध को समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देने वाला बताया था और इसे ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी का मामला मानते हुए मौत की सजा सुनाई। सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ देबाशीष ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील दाखिल की थी। हाई कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के बाद मौत की सजा को रद्द कर दिया। फिलहाल इस मामले का विस्तृत आदेश आना बाकि है।

