‘धुरंधर’ की पॉलिटिकल सोच पर छिड़ी बहस, PM मोदी के सलाहकार बोले- ‘फिल्ममेकर्स को आइडिया रखने की आजादी होनी चाहिए’

‘धुरंधर’ की पॉलिटिकल सोच पर छिड़ी बहस, PM मोदी के सलाहकार बोले- ‘फिल्ममेकर्स को आइडिया रखने की आजादी होनी चाहिए’

Dhurandhar Propaganda Film: रणवीर सिंह स्टारर ‘धुरंधर’ बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी हासिल करने के साथ अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर भी चर्चा में रही है। फिल्म को कुछ लोगों ने ‘प्रोपेगैंडा’ बताया। अब PM की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य और अर्थशास्त्री-लेखक संजीव सान्याल ने इस बहस पर अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि फिल्ममेकर्स को अपनी पसंद की कहानियां और विचार दर्शकों के सामने रखने की पूरी आजादी होनी चाहिए, वहीं दर्शकों के पास उन्हें देखने या न देखने का अधिकार है।

सान्याल ने एक इंटरव्यू में कहा कि वह इस मामले में वही सिद्धांत अपनाना पसंद करते हैं, जो उन्हें अक्सर किसी फिल्म की विचारधारा पसंद न आने पर बताया जाता था अगर पसंद नहीं है तो मत देखिए।

‘अगर धुरंधर पसंद नहीं है तो मत देखिए’

‘धुरंधर’ को प्रोपेगैंडा कहे जाने के सवाल पर सान्याल ने कहा, “सौ फूल खिलने दो।” उन्होंने कहा कि पहले उन्हें ऐसी फिल्में देखने को मिलती थीं, जिन्हें वह ‘अल्ट्रा-लेफ्ट विंग’ मानते थे। उस समय भी उनका मानना था कि अगर किसी फिल्म की विचारधारा पसंद नहीं है तो उसे न देखने का विकल्प मौजूद है।

‘मैंने धुरंधर की दोनों फिल्में देखीं और मुझे पसंद आईं’

सान्याल ने यह भी बताया कि उन्होंने ‘धुरंधर’ फ्रेंचाइजी की दोनों फिल्में देखी हैं। अपने आसपास के लोगों से फिल्म को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद उन्होंने दोनों फिल्में देखने का फैसला किया।

उन्होंने कहा कि फिल्म देखने से पहले वह उसके कई कलाकारों को नहीं जानते थे, लेकिन फिल्म की वजह से अब वह उन्हें पहचानते हैं। सान्याल ने साफ कहा कि उन्हें ‘धुरंधर’ की दोनों फिल्में वास्तव में पसंद आईं।

‘द रेवोल्यूशनरीज’ पर भी बोले सान्याल

इसी बातचीत में संजीव सान्याल ने अपने प्रोजेक्ट ‘द रेवोल्यूशनरीज’ के बारे में भी जानकारी दी। यह उनकी इसी नाम की किताब पर आधारित सीरीज है, जिसे प्राइम वीडियो पर रिलीज किया जाएगा। इसका प्रीमियर 11 सितंबर को होगा।

सान्याल का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक खास हिस्से यानी सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन पर केंद्रित है। उनका मानना है कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों की कहानियां अलग-अलग किताबों, फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री में दिखाई गई हैं, लेकिन इन सभी को जोड़ने वाले बड़े आंदोलन पर उतनी चर्चा नहीं हुई।

‘इन सभी लोगों को जोड़ने वाला एक धागा है’

सान्याल ने समझाया कि अक्सर इन ऐतिहासिक किरदारों को अलग-अलग ‘हीरो’ के तौर पर दिखाया जाता है, जबकि उनके बीच विचारों, घटनाओं और आंदोलनों के जरिए गहरा संबंध था।

उनके मुताबिक‘द रेवोल्यूशनरीज’ इसी कड़ी को सामने लाने की कोशिश करती है। वह पूरी स्वतंत्रता की लड़ाई की कहानी बताने के बजाय उसके एक खास सशस्त्र क्रांतिकारी पक्ष पर फोकस करती है। सान्याल ने कहा कि सीरीज का फॉर्मेट इस तरह की लंबी और जटिल कहानी को विस्तार से दिखाने के लिए ज्यादा उपयुक्त है। जरूरत के मुताबिक इसे आगे के सीजन में भी बढ़ाया जा सकता है।

‘स्वतंत्रता संग्राम की कई धाराएं थीं’

सान्याल ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘द रेवोल्यूशनरीज’भारत के पूरे स्वतंत्रता संग्राम को समेटने का दावा नहीं करती। उनका कहना है कि आजादी की लड़ाई में कई धाराएं थीं और उनकी सीरीज उनमें से एक, यानी सशस्त्र क्रांतिकारी धारा पर केंद्रित है। इस तरह ‘धुरंधर’ को लेकर चल रही प्रोपेगैंडा बहस के बीच सान्याल ने अलग-अलग विचारधाराओं वाली फिल्मों और कहानियों को जगह देने की बात कही है।

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