लखनऊ उर्दू अकादमी ‘परवाज़ एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी’ कि तरफ से ऑल इंडिया मुशायरे का आयोजन किया गया। अध्यक्षता शायर वासिफ फारुकी ने किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ‘अंदाज-ए-बयां और’ के फाउंडर रेहान सिद्दीकी और शाजिया किदवई शामिल हुईं। इस दौरान उन्हें साहित्यिक सेवाओं के लिए शायर सलमान जफर की ओर से ‘सिपास-नामा’ पेश किया गया। रेहान सिद्दीकी ने कहा कि उर्दू मोहब्बत कि जुबान है। मुशायरा के मंचों से इस जुबान को बेशुमार मोहब्बत मिली और घर-घर तक पहुंची। आज पूरी दुनिया में मुशायरे होते हैं और उर्दू जबान में पढ़े जाते हैं। हमारी यही कोशिश है कि जो जुबान को धर्म और सरहदों में कैद करके देखा जाता है उसे बंधन को तोड़ दिया जाए। साहित्यकारों और कलाकारों को जुबान धर्म सरहदों से परे होना चाहिए। लखनऊ शहर से उर्दू को बहुत मोहब्बत मिली है। समय-समय पर होने वाले मुशायरे मोहब्बत-भाईचारा को और बढ़ावा देते हैं। मुशायरे में पढ़े गए शेर… यहां के दश्त भी गुलज़ार कर दिए हमने, वो बेवक़ूफ़ मुहाजिर समझ रहा है हमें। – वासिफ़ फ़ारूक़ी ख़ुद आंख से आंसू बहते हैं और दर्द में हलचल होती है, जिस वक़्त मुसव्विर रोता है तस्वीर मुकम्मल होती है। – अज़्म शाकिरी हर एक शख़्स है पीछे पड़ा हुआ उसके, हर एक शख़्स के पीछे पड़ी हुई दुनिया। – अमीर इमाम हमारे नर्म लहजे का ज़माना अब भी क़ायम है, हम अहल-ए-लखनऊ हैं, हम अलग पहचान रखते हैं। – रुबीना अयाज़ तारीकियां मिटाने में मेरा भी हाथ है, जुग्नू के ख़ानदान से आया हुआ हूँ मैं – सलमान ज़फ़र रहने लगे अकेले तकब्बुर के साथ हम, पहुंचे बुलंदियों पे तो संगत बिगड़ गई। – मोहन मुंतज़िर उसके गम मिल गए, ये बात कोई कम तो नहीं, हम अली बाबा नहीं थे जो खज़ाना मिलता। – राशिद राहत मुहब्बत अब सयानी हो रही है, किसी की मेहरबानी हो रही है। – गीता गीत बहुत महंगी सवारी है जनाज़ा, अदा होती है क़ीमत जान देकर। – सत्यम रोशन इसको शिकस्त बोलें या नुसरत कहें इसे, दस्तार बच गई है मगर सर नहीं रहे। – दावर रज़ा

